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Congress Vs BJP: भाजपा के हाथ लगी कांग्रेस की ये 'कमजोरी', 177 नेताओं का भरोसा क्यों नहीं जीत पाए राहुल गांधी?

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Mon, 29 Aug 2022 09:33 PM IST
सार

Congress Vs BJP: राजनीतिक विश्लेषक डॉ. राघव शरण शर्मा के अनुसार, भाजपा उन दलों के नेताओं को जांच एजेंसियों के फेर में ले रही है, जो देर-सवेर उसकी सत्ता की राह में चुनौती बन सकते हैं। विपक्ष के डर और कमजोरी को देखकर कहा जा सकता है कि 2024 में पीएम भाजपा से ही होगा...

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Congress Vs BJP: BJP knows the weakness of Congress party and other political parties
Congress Vs BJP: Ghulam Nabi Azad with PM Modi - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

कांग्रेस को नया अध्यक्ष मिलेगा या नहीं, अगर मिलेगा तो वह क्या गांधी परिवार से होगा या कोई दूसरा नेता पार्टी की कमान संभालेगा, यही चर्चा हो रही है। देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल से दूरी बनाने का सिलसिला खत्म नहीं हुआ है। केवल वरिष्ठ ही नहीं, बल्कि जूनियर नेता भी पार्टी छोड़ रहे हैं। पार्टी में बना जी-23 समूह तो पहले से ही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को चुभन दे रहा है। राहुल गांधी न तो जूनियर और न ही सीनियर नेताओं का भरोसा जीत पा रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है, ऐसा भी नहीं है कि देश में भाजपा ही भाजपा है। जनता का एक बड़ा वर्ग इस पार्टी को पसंद नहीं कर रहा, मगर विपक्षी दल उसे घेरने के लिए तैयार नहीं। दूसरी ओर, विपक्षी दलों की एक कमजोरी, भाजपा के हाथ लग गई है। राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दलों पर एक ही 'हथियार' से वार किया जा रहा है। मौजूदा समय में इस हथियार की काट किसी के पास नजर नहीं आ रही। 2024 से पहले यह कमजोरी, विपक्षी नेताओं को खूब परेशान करेगी।

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कौन है भाजपा का 'भीतरघात'

प्रसिद्ध चिंतक, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक डॉ. राघव शरण शर्मा का कहना है, जैसा पुराने समय में होता था कि किसी राजा की मजबूत सेना को परास्त करना है, तो उसकी कोई एक कमजोरी पकड़ लो। उसके बाद किसी भीतरघाती की मदद से सेना पर वार शुरू कर दो। अंग्रेजी राज में ऐसा अनेकों बार हुआ था। कुछ वैसा ही आज देश में हो रहा है। कम से कम एक कमजोरी तो सभी पार्टियों में है। नेताओं ने सत्ता में रहते हुए खूब धन कमाया है। चाहे राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का नेता हो या क्षेत्रीय, रुपये पैसे के फेर में उसके फंसने की संभावना बनी रहती है। मौजूदा राजनीतिक हालात में अधिकांश दलों के प्रभावशाली नेताओं के साथ यही सब घटित हो रहा है। भाजपा के खिलाफ खड़े लोगों को नेतृत्व नहीं मिल पा रहा। विरोधी दल इस भूमिका के लिए खुद को तैयार करने में असफल साबित हो रहे हैं।

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डॉ. राघव शरण शर्मा के अनुसार, दूसरी ओर भाजपा उन दलों के नेताओं को जांच एजेंसियों के फेर में ले रही है, जो देर-सवेर उसकी सत्ता की राह में चुनौती बन सकते हैं। ईडी, इसका एक बड़ा उदाहरण है। विपक्ष के डर और कमजोरी को देखकर कहा जा सकता है कि 2024 में पीएम भाजपा से ही होगा। दरअसल ये पार्टियों के अंदर का संकट है। कांग्रेस के जूनियर और सीनियर नेता, पार्टी छोड़ रहे हैं। राहुल गांधी, उन पर भरोसा नहीं कर पा रहे। कांग्रेस का नेतृत्व संकट, इस कमजोरी ने पार्टी को धरातल पर ला दिया है। भाजपा तो अब यह मान चुकी है कि भारत कांग्रेस मुक्त हो रहा है। रही बात क्षेत्रीय दलों की तो उसके लिए भाजपा ने वही हथियार इस्तेमाल किया है।
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नेताओं ने पैसा तो कमाया ही है। अब उसका हिसाब किताब मांगा जा रहा है। जिसके पास भी फाइलों से बाहर का पैसा है, वह जांच एजेंसी के शिकंजे में फंस रहा है। लालू यादव की पार्टी, आज नीतीश कुमार के साथ सत्ता में आ गई है। अभी यह किसी को नहीं मालूम कि 2024 से पहले क्या खेल हो जाए। बतौर शर्मा, संभव है कि भाजपा नीतीश या लालू यादव में से किसी एक के दल को हाशिये पर ले आए। जांच तो लालू परिवार के खिलाफ भी चल रही है। ये संभावना भी बन सकती है कि अपने मकसद को हासिल करने के लिए भाजपा, तेजस्वी यादव को सीएम बना दे। इससे नीतीश कुमार की पार्टी को बड़ा धक्का दिया जा सकता है। हर प्रांत में ऐसी क्षेत्रीय दल हैं। वे मजबूत हैं, लेकिन उनके बड़े नेताओं की 'पैसे' वाली कमजोरी भी है। भाजपा, ऐसे नेताओं को ढूंढ ढूंढ कर बाहर ला रही है।

यूं ही आजाद की प्रशंसा नहीं की थी मोदी ने

गुलाम नबी आजाद को भाजपा ने इन्हें समझ लिया, मगर कांग्रेस नहीं समझ पाई। पीएम मोदी की प्रशंसा कर रहे आजाद के जरिए भाजपा, जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव में सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बना लेगी। देश के किसी भी हिस्से में अगर कोई जन नेता है तो वह देर सवेर टारगेट पर आ सकता है। राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, वजह खुले मैदान में इनसे टकराने के लिए भाजपा के पास चेहरा नहीं है। चूंकि वे नेता पैसे के चक्कर में फंसे हैं तो उनके पास दो ही विकल्प बचते हैं। एक भाजपा ज्वाइन करें या अपनी पार्टी में मौन साध कर बैठ जाएं।



एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की रिपोर्ट बताती है कि पिछले आठ साल में लगभग सवा दो सौ चुनावी उम्मीदवारों ने कांग्रेस पार्टी को अलविदा कह दिया। 177 सांसदों और विधायकों ने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया। चार-पांच साल में जिन नेताओं ने पार्टी छोड़ी है, उनमें से 45 फीसदी नेताओं ने भाजपा ज्वाइन की है। कांग्रेस पार्टी छोड़ने वाले प्रमुख नेताओं में गुलाम नबी आजाद, जयवीर शेरगिल, ज्योतिरादित्या सिंधिया, सुनील जाखड़, हार्दिक पटेल, कपिल सिब्बल, अश्विनी कुमार, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव, कीर्ति आजाद, अदिति सिंह, कैप्टन अमरिंदर सिंह, उर्मिला मातोंडकर, हरक सिंह रावत, जयंती नटराजन, हिमंत बिस्व सरमा, एन बिरेन सिंह और अजित जोगी आदि शामिल हैं।

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