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Aravalli: कांग्रेस ने सरकार पर अरावली के अस्तित्व से खिलवाड़ का लगाया आरोप, कहा- जनता को गुमराह कर रहा केंद्र

Tue, 23 Dec 2025 06:50 PM IST
राहुल कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: राहुल कुमार Updated Tue, 23 Dec 2025 06:50 PM IST
सार

अरावली को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच जुबानी जंग तेज हो गई है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मोदी सरकार पर अरावली की परिभाषा बदलकर इसके अस्तित्व से खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है।

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Congress MP Jairam Ramesh On Environment Minister Bhupender Yadav's statement regarding Aravalli Hills row
जयराम रमेश, नेता, कांग्रेस - फोटो : ANI

विस्तार

कांग्रेस ने अरावली के मुद्दे को लेकर मंगलवार को मोदी सरकार पर फिर निशाना साधा और सवाल किया कि वह इस पर्वतमाला को पुनः परिभाषित करने को लेकर इतनी आमादा क्यों है? पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी कहा कि इस मामले पर पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के ‘स्पष्टीकरण’ ने और भी सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने सवाल किया कि सरकार अरावली को नए सिरे से परिभाषित करने पर क्यों तुली है और इसका असली फायदा किसे पहुंचाया जा रहा है?

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सरकार पर लगाए गंभीर आरोप
पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि सरकार खनन के लिए सिर्फ 0.19% क्षेत्र का हवाला देकर जनता को गुमराह कर रही है। उनके अनुसार सरकार ने 34 जिलों के कुल क्षेत्रफल को आधार बनाया है, जबकि गणना केवल अरावली क्षेत्र के आधार पर होनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि नई परिभाषा (100 मीटर से ऊंचे पहाड़) से दिल्ली-एनसीआर के कई पहाड़ी इलाके सुरक्षा घेरे से बाहर हो जाएंगे, जिससे भू-माफिया और रियल एस्टेट को बढ़ावा मिलेगा।
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जयराम रमेश ने कहा कि अरावली को हरा-भरा बनाया जाना चाहिए और उसकी रक्षा की जानी चाहिए, लेकिन वे वहां माइनिंग को बढ़ावा क्यों दे रहे हैं? अरावली के पूरे इकोसिस्टम का संतुलन बदल जाएगा। मुझे एक ऐसे मंत्री से यह उम्मीद नहीं थी जिसने 2010 में पर्यावरण की रक्षा पर एक किताब लिखी थी। उन्होंने कल जिस तरह का स्पष्टीकरण दिया, उससे और सवाल खड़े हो गए हैं। बहुत चालाकी से उन्होंने कहा कि वे अरावली की रक्षा करना चाहते हैं, लेकिन सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है... उन्होंने अरावली पहाड़ियों का 0.19% किस आधार पर तय किया है? अरावली पहाड़ियों का वह 0.19% यानी 68,000 एकड़ ज़मीन... यह आंकड़ों का खेल है। पर्यावरण को आंकड़ों का खेल नहीं बनाना चाहिए... ऐसी क्या मजबूरी थी कि आपको अरावली की यह परिभाषा बदलनी पड़ी?
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अरावली मुद्दे पर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा हाल में दिया गया स्पष्टीकरण और भी अधिक सवाल और शंकाएं खड़ी करता है। मंत्री का कहना है कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में से केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र ही वर्तमान में खनन पट्टों के अंतर्गत है। लेकिन यह भी लगभग 68,000 एकड़ भूमि बनती है, जो अपने आप में बहुत बड़ा क्षेत्र है। उन्होंने दावा किया कि 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर का यह आंकड़ा भी भ्रामक है।

रमेश का कहना है, इसमें चार राज्यों के 34 जिलों का पूरा भौगोलिक क्षेत्र शामिल कर लिया गया है, जिन्हें मंत्रालय ने अरावली जिले माना है। यह गलत आधार है। कांग्रेस नेता के मुताबिक, सही आधार तो उन जिलों के भीतर वास्तविक अरावली पर्वत शृंखला के अंतर्गत आने वाला क्षेत्र होना चाहिए। रमेश ने कहा कि यदि वास्तविक अरावली क्षेत्र को आधार बनाया जाए, तो 0.19 प्रतिशत का आंकड़ा बहुत कम आकलन साबित होगा।

उन्होंने यह भी कहा, जिन 34 जिलों में से 15 जिलों के आंकड़े सत्यापित किए जा सकते हैं, उनमें अरावली क्षेत्र कुल भूमि का लगभग 33 प्रतिशत है। इस बारे में बिल्कुल भी स्पष्टता नहीं है कि नई परिभाषा के तहत इन अरावली क्षेत्रों में से कितना हिस्सा संरक्षण से बाहर कर दिया जाएगा और खनन व अन्य विकास कार्यों के लिए खोल दिया जाएगा।रमेश का कहना है, यदि मंत्री के सुझाव के अनुसार स्थानीय स्थितियों को आधार बनाया जाता है, तो 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली कई पहाड़ियां भी संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी।

अधिकांश पहाड़ी पट्टियां रियल एस्टेट विकास के लिए खोल दी जाएंगी- कांग्रेस
उन्होंने कहा कि संशोधित परिभाषा के कारण दिल्ली-एनसीआर में अरावली की अधिकांश पहाड़ी पट्टियां रियल एस्टेट विकास के लिए खोल दी जाएंगी, जिससे पर्यावरणीय दबाव और अधिक बढ़ेगा।रमेश ने कहा, मंत्री, जो खनन को अनुमति देने के लिए सरिस्का टाइगर रिज़र्व की सीमाओं को पुनः परिभाषित करने की पहल कर रहे हैं, इस बुनियादी तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि एक परस्पर जुड़े हुए पारिस्थितिकी तंत्र के विखंडन से उसका पारिस्थितिक दायरा गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है। अन्य स्थानों पर ऐसा विखंडन पहले ही भारी तबाही मचा रहा है।

 
जयराम रमेश ने कहा, मैं यह साफ करना चाहता हूं कि मोदी सरकार अरावली पहाड़ियों को बचाने में नहीं, बल्कि उन्हें बेचने में लगी है। उनका इरादा अरावली को बेचना है, जबकि समय की जरूरत और मांग इसे बचाने की है। बचाने और बेचने में जमीन-आसमान का फर्क है।  अरावली दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात तक फैली हुई है। लगभग 34 ऐसे जिले हैं जिन्हें अरावली में शामिल किया गया है और इसकी परिभाषा बदली जा रही है। इसका मतलब है कि और अधिक माइनिंग होगी और दिल्ली में रियल एस्टेट को बढ़ावा दिया जाएगा। अरावली हमारी प्राकृतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक विरासत है, इसलिए अगर इतना खतरा है, तो किसे प्राथमिकता मिलनी चाहिए? अरावली को बचाने के बजाय, वे इसे बेचने में लगे हैं।

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