फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Conditions of forest improved American Journal claims reduction in harvesting rate

Deforestation: आदिवासियों की सियासी शक्ति बढ़ी तो सुधरे जंगल, अमेरिकन जर्नल का दावा- कटाई दर में आई कमी

Wed, 19 Jul 2023 06:25 AM IST
जलज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जलज मिश्रा Updated Wed, 19 Jul 2023 06:25 AM IST
सार

एक नए शोध के अनुसार, अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम (पीईएसए-पेसा) और अन्य नियम जो अनुसूचित क्षेत्रों को मान्यता देते हैं, वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, गैर-अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थानों ने एसटी प्रतिनिधित्व को अनिवार्य कर दिया है।

विज्ञापन
Conditions of forest improved American Journal claims reduction in harvesting rate
jungle

विस्तार

अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के औपचारिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वृद्धि से औसत वृक्ष उगाने में बढ़ोतरी हुई और वनों की कटाई की दर में कमी आई है।

विज्ञापन

एक नए शोध के अनुसार, अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम (पीईएसए-पेसा) और अन्य नियम जो अनुसूचित क्षेत्रों को मान्यता देते हैं, वन संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, गैर-अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायती राज संस्थानों ने एसटी प्रतिनिधित्व को अनिवार्य कर दिया है, जिसका संरक्षण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अमेरिकन पॉलिटिकल साइंस रिव्यू जर्नल में प्रकाशित प्रतिनिधित्व और वन संरक्षण-भारत के अनुसूचित क्षेत्रों से साक्ष्य शीर्षक वाले शोध में उल्लेख किया गया है कि अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम (एफआरए) 2006 के कार्यान्वयन का ‘पेसा’ के लाभों से परे कोई स्पष्ट प्रभाव नहीं पड़ा। इसमें कहा गया है कि भारत में कुल आबादी का लगभग 66 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में रहता है, जिनमें से 275 मिलियन लोग आजीविका के लिए वन संसाधनों पर निर्भर हैं। इनमें से 100 मिलियन अनुसूचित जनजातियां हैं। ये समुदाय आर्थिक रूप से कमजोर है और घने जंगलों वाले क्षेत्रों के पास रहते हैं, लेकिन राजनीति में दखल बढ़ने के कारण धीरे-धीरे इनकी परिस्थिति में सकारात्मक सुधार दिखाई दे रहा है।

छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड में ज्यादा बदलाव
अध्ययन में कहा गया है कि छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल और मध्य प्रदेश में जंगल क्षेत्र में वृद्धि देखी गई है। विश्लेषण से पता चला कि पेसा की शुरुआत के बाद पेड़ों में तीन प्रतिशत की वृद्धि हुई। लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच (2022) के डाटा का उपयोग करते हुए बताया गया है। पेसा की शुरुआत से खनन के आसपास संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर ये नतीजे बताते हैं कि बदलाव का प्राथमिक माध्यम बड़े पैमाने पर खनन कार्यों के खिलाफ संगठित विरोध प्रदर्शन है।

विज्ञापन

पेसा से हुए सशक्त
शोधकर्ताओं ने कहा कि पेसा ने समुदायों को जंगल कटाई और खनन जैसे प्रयासों को विफल करने के लिए सशक्त बनाया है। ओडिशा की कोडिंगमाली पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन को रोकने के लिए हाथ मिलाया। महाराष्ट्र में गोंड जनजातियों ने गढ़चिरौली जिले के जेंडेपर गांव में लौह अयस्क खनन का विरोध किया, क्योंकि इसमें शामिल इकाई ग्राम सभा से अनुमोदन प्राप्त करने में विफल रही। शोधकर्ताओं के अनुसार, आदिवासी समुदाय में जागरूकता से उनकी आजीविका के अवसरों में भी वृद्धि हुई है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed