फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Climate displacement has become a global crisis, many countries including India are in its grip

चिंताजनक: जलवायु विस्थापन बना वैश्विक संकट, भारत समेत कई देश चपेट में; पर अब भी नहीं दिया जा रहा जरूरी ध्यान

Sat, 21 Jun 2025 06:18 AM IST
शुभम कुमार अमर उजाला नेटवर्क
अमर उजाला नेटवर्क Published by: शुभम कुमार Updated Sat, 21 Jun 2025 06:18 AM IST
सार

जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में 2020 में 1.4 करोड़ लोग बाढ़, सूखा और तूफानों से बेघर हुए। ये लोग शरणार्थी का दर्जा नहीं पा सकते, और अस्थायी शिविरों में मुश्किल हालात में जीने को मजबूर हैं। यह संकट अब मानवाधिकार और नीति का मुद्दा बन गया है।

विज्ञापन
Climate displacement has become a global crisis, many countries including India are in its grip
Climate Change - फोटो : Istock

विस्तार

दुनिया युद्ध और भू-राजनीति पर निगाहें जमाए बैठी है, वहीं एक अदृश्य लेकिन भयावह मानवीय संकट तेजी से आकार ले रहा है और वह है जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित होती आबादी। यह संकट अब केवल एक पर्यावरणीय चुनौती नहीं बल्कि मानवाधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा और नीति निर्माण के लिए गंभीर रूप ले चुका है। भारत सहित कई देश इस उभरते विस्थापन संकट के केंद्र में हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अब भी इसे शरणार्थी के दर्जे से वंचित रखा गया है।
विज्ञापन


आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र (आईडीएमसी) के अनुसार साल 2020 में चरम मौसम की घटनाओं के चलते भारत में लगभग 1.4 करोड़ लोग अपने घरों से उजड़ने पर मजबूर हुए। इनमें बाढ़, चक्रवात, लंबा सूखा और जमीन के बंजर पड़ने जैसी घटनाएं प्रमुख थीं। यह आंकड़ा भारत को जलवायु-जनित आपदाओं के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में शामिल करता है। जलवायु से विस्थापित लोग अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत शरणार्थी की श्रेणी में नहीं आते।
विज्ञापन


ये भी पढ़ें:- चेतावनी: तापमान 1.5 डिग्री रखने का बजट तीन वर्ष में हो सकता है खत्म, मुश्किल होगा ग्लोबल वार्मिंग रोकना
विज्ञापन
विज्ञापन


समुदायों व विस्थापितों के बीच भी होता है टकराव
संयुक्त राष्ट्र ने भी कहा है, भारत समेत दुनिया भर के जलवायु विस्थापितों की तकलीफ यह है कि उन्हें घर-गांव, आजीविका और सामाजिक पहचान अचानक छोड़ना पड़ता है। बाढ़, सूखा, समुद्र का बढ़ता स्तर, जंगलों की आग और तूफान जैसी चरम मौसमी घटनाएं जब जीवन को असुरक्षित कर देती हैं, तो लाखों लोग विस्थापित हो जाते हैं। ये लोग अक्सर अस्थायी शिविरों, झुग्गियों या भीड़भाड़ वाले इलाकों में रहने को मजबूर होते हैं, जहां न पीने का साफ पानी होता है, न स्वच्छता की सुविधा और न ही पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं। बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है, बुजुर्गों की देखभाल मुश्किल हो जाती है और महिलाओं को यौन हिंसा तक का सामना करना पड़ता है।


2050 तक 14.3 करोड़ हो सकती है जलवायु प्रवासियों की संख्या
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक, उप-सहारा अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका में 2050 तक 14.3 करोड़ लोग जलवायु के कारण आंतरिक प्रवास के लिए मजबूर हो सकते हैं। भारत की विशाल और जलवायु-संवेदनशील आबादी के कारण यह देश इस अनुमानित आंकड़े में सबसे बड़ा भागीदार बन सकता है।

ये भी पढ़ें:- Weather Update: दिल्ली में दस्तक देने को तैयार मानसून; पूरे भारत में बारिश का दौर; आईएमडी ने जारी किया अलर्ट

महिलाएं और बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित  
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएच ओ) के अनुसार विस्थापितों में 4.7 करोड़ से अधिक बच्चे हैं, जिन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा सेवाओं तक समुचित पहुंच नहीं मिल पाती। खासकर गर्भवती महिलाएं और नवजात शिशु बाधित स्वास्थ्य सेवाओं के चलते सबसे ज्यादा खतरे में हैं। यह संकट न केवल मानवीय है, बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातस्थिति जैसा रूप लेता जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed