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जलवायु परिवर्तन का असर: पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी, दिन हो रहे लंबे
Sat, 14 Mar 2026 03:52 AM IST
Devesh Tripathi
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Sat, 14 Mar 2026 03:52 AM IST
सार
अध्ययन से पता चला कि क्वाटरनेरी काल, जो लगभग 26 लाख वर्ष पहले शुरू हुआ था, के दौरान कई बार बड़े पैमाने पर ग्लेशियर पिघले और समुद्र स्तर में बदलाव हुआ। हालांकि उन घटनाओं का पृथ्वी की घूर्णन गति पर असर पड़ा था, लेकिन वह आज की तरह तेजी से दिन की लंबाई बढ़ाने वाला नहीं था।
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पृथ्वी पर दिन हो रहे लंबे
- फोटो : Freepik
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विस्तार
वैज्ञानिकों के एक नए अध्ययन में सामने आया है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल तापमान और समुद्र स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पृथ्वी की मूलभूत भौतिक प्रक्रियाओं को भी प्रभावित कर रहा है।
ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और समुद्र स्तर में वृद्धि के कारण पृथ्वी के द्रव्यमान का वितरण बदल रहा है, जिससे उसकी घूर्णन गति धीरे-धीरे कम हो रही है। इसका परिणाम यह है कि पृथ्वी पर एक दिन की लंबाई बढ़ रही है। शोध के अनुसार 2000 से 2020 के बीच दिन की लंबाई बढ़ने की दर 1.33 मिलीसेकंड प्रति सदी रही, जो पिछले लगभग 36 लाख वर्षों में सबसे तेज मानी जा रही है।
ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ी चिंता
हम सामान्यतः मानते हैं कि पृथ्वी पर एक दिन हमेशा 24 घंटे का होता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से दिन की लंबाई स्थिर नहीं होती। पृथ्वी की घूर्णन गति कई प्राकृतिक कारकों से प्रभावित होती है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर ज्वारीय बल पैदा करता है, जो धीरे-धीरे पृथ्वी की गति को कम करता है। इसके अलावा पृथ्वी पर द्रव्यमान के वितरण में बदलाव जैसे ग्लेशियरों की बर्फ, महासागरों का पानी और वायुमंडलीय जल भी घूर्णन गति को प्रभावित करते हैं।
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जलवायु परिवर्तन बना बड़ी वजह
पृथ्वी के अंदर होने वाली भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाएं, जैसे प्लेटों की हलचल और भूकंप भी इस गति में सूक्ष्म बदलाव ला सकते हैं। इन सभी कारणों से दिन की लंबाई में मिलीसेकंड स्तर का अंतर आता रहता है। जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार 21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की घूर्णन गति को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन गया है।
अतीत की तुलना में आज की स्थिति अलग
अध्ययन से पता चला कि क्वाटरनेरी काल, जो लगभग 26 लाख वर्ष पहले शुरू हुआ था, के दौरान कई बार बड़े पैमाने पर ग्लेशियर पिघले और समुद्र स्तर में बदलाव हुआ। हालांकि उन घटनाओं का पृथ्वी की घूर्णन गति पर असर पड़ा था, लेकिन वह आज की तरह तेजी से दिन की लंबाई बढ़ाने वाला नहीं था। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान समय में दर्ज बदलाव पिछले 36 लाख वर्षों में सबसे तेज हैं।केवल लगभग 20 लाख वर्ष पहले कुछ अवधि में इसका स्तर आंशिक रूप से मिलता-जुलता हो सकता है।
तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों पर संभावित असर
हालांकि दिन की लंबाई में बदलाव केवल मिलीसेकंड के स्तर पर है, लेकिन इसके प्रभाव कई अत्यंत संवेदनशील प्रणालियों पर पड़ सकते हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति का सटीक ज्ञान सैटेलाइट संचालन, अंतरिक्ष यान की नेविगेशन प्रणाली, जीपीएस समय मापन और खगोलशास्त्रीय अनुसंधानों के लिए बेहद आवश्यक होता है। यदि पृथ्वी की गति में बदलाव आता है तो इन प्रणालियों में समय और स्थिति की गणना को भी समायोजित करना पड़ता है।
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ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने और समुद्र स्तर में वृद्धि के कारण पृथ्वी के द्रव्यमान का वितरण बदल रहा है, जिससे उसकी घूर्णन गति धीरे-धीरे कम हो रही है। इसका परिणाम यह है कि पृथ्वी पर एक दिन की लंबाई बढ़ रही है। शोध के अनुसार 2000 से 2020 के बीच दिन की लंबाई बढ़ने की दर 1.33 मिलीसेकंड प्रति सदी रही, जो पिछले लगभग 36 लाख वर्षों में सबसे तेज मानी जा रही है।
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ग्लेशियरों के पिघलने से बढ़ी चिंता
हम सामान्यतः मानते हैं कि पृथ्वी पर एक दिन हमेशा 24 घंटे का होता है, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से दिन की लंबाई स्थिर नहीं होती। पृथ्वी की घूर्णन गति कई प्राकृतिक कारकों से प्रभावित होती है। चंद्रमा का गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर ज्वारीय बल पैदा करता है, जो धीरे-धीरे पृथ्वी की गति को कम करता है। इसके अलावा पृथ्वी पर द्रव्यमान के वितरण में बदलाव जैसे ग्लेशियरों की बर्फ, महासागरों का पानी और वायुमंडलीय जल भी घूर्णन गति को प्रभावित करते हैं।
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जलवायु परिवर्तन बना बड़ी वजह
पृथ्वी के अंदर होने वाली भू-वैज्ञानिक प्रक्रियाएं, जैसे प्लेटों की हलचल और भूकंप भी इस गति में सूक्ष्म बदलाव ला सकते हैं। इन सभी कारणों से दिन की लंबाई में मिलीसेकंड स्तर का अंतर आता रहता है। जर्नल ऑफ जियोफिजिकल रिसर्च में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार 21वीं सदी में जलवायु परिवर्तन पृथ्वी की घूर्णन गति को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक बन गया है।
अतीत की तुलना में आज की स्थिति अलग
अध्ययन से पता चला कि क्वाटरनेरी काल, जो लगभग 26 लाख वर्ष पहले शुरू हुआ था, के दौरान कई बार बड़े पैमाने पर ग्लेशियर पिघले और समुद्र स्तर में बदलाव हुआ। हालांकि उन घटनाओं का पृथ्वी की घूर्णन गति पर असर पड़ा था, लेकिन वह आज की तरह तेजी से दिन की लंबाई बढ़ाने वाला नहीं था। वैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान समय में दर्ज बदलाव पिछले 36 लाख वर्षों में सबसे तेज हैं।केवल लगभग 20 लाख वर्ष पहले कुछ अवधि में इसका स्तर आंशिक रूप से मिलता-जुलता हो सकता है।
तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों पर संभावित असर
हालांकि दिन की लंबाई में बदलाव केवल मिलीसेकंड के स्तर पर है, लेकिन इसके प्रभाव कई अत्यंत संवेदनशील प्रणालियों पर पड़ सकते हैं। पृथ्वी की घूर्णन गति का सटीक ज्ञान सैटेलाइट संचालन, अंतरिक्ष यान की नेविगेशन प्रणाली, जीपीएस समय मापन और खगोलशास्त्रीय अनुसंधानों के लिए बेहद आवश्यक होता है। यदि पृथ्वी की गति में बदलाव आता है तो इन प्रणालियों में समय और स्थिति की गणना को भी समायोजित करना पड़ता है।
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