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Climate Change: बढ़ती गर्मी से बदला मधुमक्खियों का जीवन चक्र, खाद्य सुरक्षा पर संकट; घट रही प्रजनन क्षमता

Sun, 26 Apr 2026 04:26 AM IST
अमन तिवारी अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: अमन तिवारी Updated Sun, 26 Apr 2026 04:26 AM IST
सार

जलवायु परिवर्तन के कारण मधुमक्खियां समय से पहले शीतनिद्रा से जाग रही हैं। भोजन की कमी और ऊर्जा की हानि से उनकी प्रजनन क्षमता घट रही है। इसका सबसे बुरा असर मादा कीटों पर पड़ रहा है। परागणकर्ताओं की यह कमजोरी भविष्य में फसलों की पैदावार और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

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मधुमक्खी - फोटो : ANI

विस्तार

जलवायु परिवर्तन अब केवल मौसम के चक्र को ही नहीं बदल रहा है। यह प्रकृति की मूल संरचना को भी प्रभावित कर रहा है। मधुमक्खियों और ततैयों जैसे महत्वपूर्ण परागणकर्ताओं पर इसका असर बहुत तेजी से सामने आ रहा है। प्रतिष्ठित जर्नल 'फंक्शनल इकोलॉजी' में छपे एक अध्ययन के अनुसार, बढ़ते तापमान के कारण ये कीट अपने तय समय से पहले ही शीतनिद्रा से बाहर आ रहे हैं। इस वजह से उन्हें न तो पर्याप्त भोजन मिल पा रहा है और न ही उनके शरीर में जरूरी ऊर्जा बची रहती है। इसके नतीजे में ये कीट कमजोर पड़ रहे हैं। उनकी प्रजनन क्षमता घट रही है और उनके अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है।
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आमतौर पर ज्यादातर मधुमक्खियां सर्दियों में जमीन, लकड़ी या अन्य सुरक्षित जगहों पर कोकून के अंदर शीतनिद्रा में रहती हैं। शीतनिद्रा का मतलब है सर्द मौसम में शरीर की गतिविधियों को बहुत धीमा करके ऊर्जा बचाना। कुछ प्रजातियां वसंत की शुरुआत में बाहर आती हैं और वे कोकून में ही पूरी तरह विकसित हो चुकी होती हैं। वहीं कुछ प्रजातियां गर्मियों में सक्रिय होती हैं। उन्हें वसंत में बाहर आने से पहले अपना विकास पूरा करना पड़ता है। लेकिन जलवायु परिवर्तन इस प्राकृतिक चक्र को बिगाड़ रहा है। बढ़ती गर्मी के कारण ये कीट समय से पहले बाहर निकल रहे हैं। इससे उनके सामने जीवित रहने की नई चुनौतियां खड़ी हो रही हैं।
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अध्ययन बताता है कि जब मधुमक्खियां और ततैये समय से पहले बाहर आते हैं, तब उनके लिए जरूरी फूल अभी खिले नहीं होते। इसका मतलब है कि उन्हें पर्याप्त पराग और अमृत नहीं मिल पाता, जो उनका मुख्य भोजन है। साथ ही, ज्यादा तापमान की वजह से उनके शरीर में जमा वसा (फैट) तेजी से खत्म होने लगती है। इससे उनके पास जीवित रहने, उड़ने और प्रजनन करने के लिए पर्याप्त ताकत नहीं बचती।


मादा कीटों पर सबसे ज्यादा असर
अध्ययन की सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसका सबसे अधिक प्रभाव मादा कीटों पर देखा गया है। कुछ प्रजातियों में मादा कीटों के शरीर का वजन 34 फीसदी तक कम पाया गया। यह केवल शारीरिक कमजोरी की बात नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर प्रजनन पर पड़ सकता है। मादा कीटों की यह कमजोरी अगली पीढ़ियों की संख्या और गुणवत्ता दोनों को प्रभावित कर सकती है। इससे भविष्य में इन प्रजातियों की आबादी में भारी गिरावट का खतरा बढ़ गया है।

परागण और फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण
मधुमक्खियां और ततैये केवल छोटे कीट नहीं हैं। ये पूरी कृषि व्यवस्था और पारिस्थितिकी तंत्र के महत्वपूर्ण आधार हैं। ये परागण की प्रक्रिया में सबसे मुख्य भूमिका निभाते हैं। परागण वह प्रक्रिया है जिससे फल, बीज और नई फसलें तैयार होती हैं। यदि ये परागणकर्ता कमजोर होते हैं, तो इसका सीधा असर फसलों की पैदावार और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसका प्रभाव खेतों से लेकर आम लोगों की थाली तक साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है।

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