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CJI DY Chandrachud: सीजेआई बोले- कानून दमन का साधन न बने, यह तय करना सभी नीति निर्धारकों की जिम्मेदारी

Sat, 12 Nov 2022 04:34 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Sat, 12 Nov 2022 04:34 PM IST
सार

सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि हम एक नागरिक के रूप में यह कैसे तय करते है कि कानून न्याय का साधन बन जाए और कानून उत्पीड़न का साधन न बने। ऐसे में कानून को न्याय का साधन बने रहने देने के लिए न्यायाधीशों के साथ ही सभी निर्णय निर्माताओं को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।   

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CJI Chandrachud says Responsibility of all decision makers to ensure law doesn't become instrument of oppressi
न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़(फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि कानून दमन का साधन नहीं बल्कि न्याय का साधन बना रहे, यह तय करना केवल न्यायधीशों का नहीं, बल्कि सभी नीति निर्धारकों की जिम्मेदारी है। उन्होंन शनिवार को एक कार्यक्रम में बोलते हुये टिप्पणी की। इस दौरान उन्होंने कहा कि नागरिकों से उम्मीदें रखना बहुत अच्छी बात है लेकिन हमें संस्थानों के रूप में अदालतों की सीमाओं और उनकी क्षमता को समझने की भी जरूरत है। 

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 इस कार्यक्रम में बोलते हुए सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि कभी-कभी कानून और न्याय आवश्यक रूप से एक ही रेखीय प्रक्षेपवक्र का पालन नहीं करते हैं। कानून न्याय का एक साधन हो सकता है, लेकिन कानून उत्पीड़न का एक साधन भी हो सकता है। हम जानते हैं कि कैसे औपनिवेशिक काल में वही कानून प्रताड़ना के साधन बने थे। तब के समय की क़ानून की किताबें आज उत्पीड़न के साधन के रूप में इस्तेमाल की जा सकती हैं।  
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उन्होंने आगे कहा कि हम एक नागरिक के रूप में यह कैसे तय करते है कि कानून न्याय का साधन बन जाए और कानून उत्पीड़न का साधन न बने। ऐसे में कानून को न्याय का साधन बने रहने देने के लिए न्यायाधीशों के साथ ही सभी निर्णय निर्माताओं को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।   
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सीजेआई ने आगे कहा कि जो चीज लंबे समय तक न्यायिक संस्थानों को बनाए रखती है, वह करुणा की भावना, सहानुभूति की भावना और नागरिकों के प्रति जवाबदेही की क्षमता है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने सलाह देते हुए कहा कि जब आप अपने सिस्टम में अनसुनी आवाजें सुनने की क्षमता रखते हैं और फिर देखते हैं कि कानून और न्याय के बीच संतुलन कहां है। ऐसा करके आप वास्तव में एक न्यायाधीश के रूप में अपना मिशन पूरा कर सकते हैं। 

इस दौरान उन्होंने न्यायधीशों के सामने आने वाली मुसीबतों का भी जिक्र किया। सीजेआई ने कहा कि वर्तमान में सोशल मीडिया ने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक को पेश किया है क्योंकि एक न्यायाधीश द्वारा अदालत में कहे गए हर छोटे शब्द की वास्तविक समय पर रिपोर्टिंग होती है। इस तरह एक न्यायाधीश के रूप में आपका लगातार मूल्यांकन किया जाता है। उन्होंने कहा कि अदालतों में न्याय करने की प्रक्रिया संवाद है। अदालत में वकीलों और न्यायाधीशों के बीच मुक्त प्रवाह वाली बातचीत होती है, जो सच्चाई को उजागर करने के प्रयास में होती है। 

कानूनी पेशे की संरचना पितृसत्तात्मक-सामंती, महिलाओं के अनुकूल भी नहीं
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि देश में कानूनी पेशे की संरचना सामंती और पितृसत्तात्मक है। यह महिलाओं के अनुकूल भी नहीं है। उन्होंने कहा कि कानूनी पेशे में अधिक से अधिक महिलाओं की भागीदारी बढ़े और समाज के हाशिये के लोगों को भी इसमें प्रवेश मिले, इसके लिए एक लोकतांत्रिक और योग्यता आधारित प्रक्रिया की आवश्यकता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने बुधवार को ही सीजेआई का पदभार ग्रहण किया है। 

उन्होंने शनिवार को एक कार्यक्रम में कहा कि न्यायपालिका के सामने कई चुनौतियां हैं। इनमें पहली चुनौती बड़ी उम्मीद से जुड़ी है, क्योंकि हर सामाजिक, कानूनी मसला और बड़ी संख्या में राजनीतिक मुद्दे शीर्ष अदालत के अधिकार क्षेत्र में हैं। सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि हमें समझने की जरूरत है कि न्यायपालिका के पास एक अलग व्यवस्था (फीडिंग पूल) है। यह व्यवस्था, जो निर्धारित करती है कि कौन इस क्षेत्र में आएगा, बहुत हद तक कानूनी पेशे की संरचना पर निर्भर करती है।

महिला वकीलों की संख्या बढ़े
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, हम अभी से महिलाओं तक पहुंच बनाकर भविष्य के ढांचे की नींव रखें। इस दिशा में पहला कदम वरिष्ठ वकीलों की जमात में महिलाओं की संख्या बढ़ाना है, जिसमें अभी पुरुष वकीलों का दबदबा है।

प्रवेश के लिए हो लोकतांत्रिक व्यवस्था 
जब तक हमारे पास कानूनी पेशे में प्रवेश के लिए लोकतांत्रिक और योग्यता आधारित व्यवस्था नहीं होगी, तब तक हमारे पास इस पेशे में न तो अधिक महिलाएं होंगी और न ही समाज में हाशिये के लोग इससे जुड़ पाएंगे। -जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, मुख्य न्यायाधीश

अदालतों की सीमाओं को समझना होगा
जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि नागरिकों की ओर से उम्मीदें रखना अच्छी बात है, लेकिन हमें एक संस्थान के रूप में अदालतों की सीमाओं व क्षमताओं को समझना चाहिए। कभी-कभी कानून और न्याय आवश्यक रूप से एक ही दिशा में अग्रसर नहीं होते। उन्होंने कहा कि करुणा, सहानुभूति की भावना व नागरिकों की परेशानियों को दूर करने की क्षमता लंबे समय तक न्यायिक संस्थानों को बनाए रखती है।

दमन का साधन भी बन सकता है कानून
सीजेआई ने कहा कि कानून दमन का साधन भी बन सकता है। इसलिए यह सुनिश्चित करना सिर्फ अदालतों की ही नहीं, बल्कि सभी नीति निर्माताओं की जिम्मेदारी है कि कानून न्याय का साधन बना रहे। यह इस पर निर्भर है कि जज व नीति निर्माता उसे किस तरह से संभालते हैं।

नई चुनौती : सोशल मीडिया 
सीजेआई ने कहा, सोशल मीडिया बड़ी चुनौती बना है। जज की हर शब्द तुरंत बाहर आ जाता है। एक जज के रूप में आपका हर समय मूल्यांकन होता रहता है।

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