'नागरिकता संशोधन कानून' पर भारत विरोधी शक्तियां कर रहीं दुष्प्रचार, इन नौ सवालों में मिलेगा जवाब
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सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नागरिकता संशोधन कानून के मसले पर नौ सवालों का जवाब तैयार किया है। अगर इसे लोग ध्यान से पढ़ेंगे तो उनका विरोध शांत हो जाएगा।
प्रश्न 1. पाकिस्तान के बलूच, अहमदियों और म्यांमार के रोहिंग्यायों को भी इसका फायदा क्यों नहीं मिलना चाहिए?
उत्तरः नागरिकता संशोधन अधिनियम, नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत भारत की नागरिकता के लिए आवेदन करने से किसी भी देश के नागरिकों को नहीं रोकता।
प्रश्न 2. यह अधिनियम किस तरह से इन तीन देशों के हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और ईसाई लोगों के लिए फायदेमंद है?
उत्तरः इन तीनों देशों से आए ऐसे सभी वैध शरणार्थी जिनके पास सभी जरूरी यात्रा दस्तावेज हैं और जो भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत निर्दिष्ट आवश्यक अहर्ताओं को पूरा करते हैं, भारत की नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं। यह व्यवस्था इन देशों से आने वाले अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों पर भी लागू होती है। अधूरे यात्रा दस्तावेज या वैधता समाप्त हो चुके यात्रा दस्तावेज रखने वाले तथा धर्म के नाम पर उत्पीड़न से बचने के लिए दिसंबर 2014 तक भारत में शरण लेने वाले ऐसे समुदायों के कुछ शरणार्थियों को ही नागरिकता संशोधन अधिनियम से लाभ हो सकता है।
ऐसे लोगों को नागरिकता अधिनियम 1955 के तहत अवैध शरणार्थियों की परिभाषा से बाहर रखा गया है। वे भारत में कुल छह साल की अवधि तक रहने के बाद नागरिकता प्राप्त करने के योग्य हो जाएंगे। अन्य विदेशियों के लिए यह अवधि 12 वर्ष निर्धारित की गई है।
प्रश्न 3. क्या शरणार्थियों का ख्याल रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संधि के तहत भारत का कोई दायित्व नहीं है?
उत्तर: हां, निश्चित तौर पर भारत का दायित्व है और भारत इससे पीछे नहीं हट रहा है। भारत में दो लाख से भी अधिक श्रीलंकाई तमिल और तिब्बती, 15 हजार से अधिक अफगानी और 20-25 हजार रोहिंग्या हैं। इसी तरह वर्तमान में भारत में विभिन्न देशों के अन्य शरणार्थी हजारों की संख्या में रह रहे हैं। यह उम्मीद की जा रही है कि जब हालात बेहतर हो जाएंगे, तो ये शरणार्थी किसी-न-किसी दिन स्वदेश लौट जाएंगे।
भारत शरणार्थियों पर संयुक्त राष्ट्र संधि 1951 और संयुक्त राष्ट्र संधि 1967 का हस्ताक्षरकर्ता देश नहीं है। दूसरी बात यह है कि भारत पर इस तरह के प्रवासियों को अपनी नागरिकता की पेशकश करने का कोई दायित्व नहीं है। भारत सहित प्रत्येक देश में किसी विदेशी को नागरिकता प्रदान करने के स्वयं के अपने नियम है।
प्रश्न 4. क्या इन तीनों देशों के अवैध मुस्लिम प्रवासियों को इस अधिनियम के तहत स्वत: ही निर्वासित कर दिया जाएगा?
उत्तर: नहीं। ‘सीएए’ का भारत से किसी भी विदेशी को निर्वासित करने का कोई लेना-देना नहीं है। किसी भी विदेशी की निर्वासन प्रक्रिया को विदेशी अधिनियम, 1946 और / अथवा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 के अधिदेश के अनुसार लागू किया जाता है, चाहे वह किसी भी धर्म अथवा देश का हो। ये दो कानून ही सभी विदेशियों के भारत में प्रवेश, बसने, आवाजाही और भारत से उन्हें बाहर किए जाने पर लागू होते है, चाहे वे किसी भी धर्म या देश के हों।
अत: सामान्य निर्वासन प्रक्रिया भारत में बसे किसी भी अवैध विदेशी व्यक्ति पर लागू होगी। यह पूरी तरह से सोची-समझी न्यायिक प्रक्रिया है, जो किसी भी अवैध विदेशी की पहचान करने के लिए स्थानीय पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से की जाने वाली समुचित पूछताछ पर आधारित है। यह सुनिश्चित किया जाता है कि इस तरह के अवैध विदेशी व्यक्ति को उसके देश के दूतावास की ओर से समुचित यात्रा दस्तावेज जारी किया जाए, ताकि जब उसे निर्वासित किया जाए, तो उसके देश के अधिकारियों को उसे स्वीकार करने में कोई आपत्ति न हो।
असम में, निर्वासन प्रक्रिया पर तभी अमल किया जाता है, जब विदेशी अधिनियम, 1946 के तहत एक ‘विदेशी’ के रूप में इस तरह के व्यक्ति का निर्धारण हो जाता है। इसके बाद उसे निर्वासन किये जाने का पात्र मान लिया जाता है। अत: इस पूरी कवायद में कुछ भी स्वत: या भेदभावपूर्ण तरीके से नहीं होता है। किसी भी अवैध विदेशी व्यक्ति की पहचान, हिरासत में लेने एवं निर्वासित करने के लिए विदेशी अधिनियम की धारा 3 और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 की धारा 5 के तहत राज्य सरकारों और उनके जिला स्तर के अधिकारियों को केन्द्र सरकार का अधिकार दिया जाता है।
प्रश्न 5. क्या सीएए से भारतीय (हिंदू, मुस्लिम या अन्य) प्रभावित होंगे ?
उत्तर: नहीं। इससे भारतीय नागरिक किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं होंगे। भारतीय नागरिकों को भारत के संविधान द्वारा प्रदान किए गए मौलिक अधिकार पूर्ण रूप से प्राप्त होंगे। सीएए सहित कोई भी कानून इन अधिकारों को नहीं छीन सकता। इसके विरूद्ध दुष्प्रचार का अभियान चलाया जा रहा है। सीएए मुस्लिम नागरिकों सहित किसी भी भारतीय नागरिक को प्रभावित नहीं करेगा।
प्रश्न 6. श्रीलंका के तमिलों के विषय में ?
उत्तर: 1964 और 1974 में प्रधानमंत्री स्तर पर समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद भारत ने भारतीय मूल के 4.61 लाख तमिलों को नागरिकता प्रदान की है। इस समय केंद्रीय और राज्य सरकार की राज सहायता और अनुदानों पर 95 हजार श्रीलंकाई तमिल, तमिलनाडु में रह रहे हैं। वे जब भी पात्र होंगे, तब भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकते हैं।
प्रश्न 7. केवल ये तीन देश क्यों? केवल उपरोक्त अधिसूचित समुदायों के धार्मिक उत्पीड़न के विषय में ही क्यों?
उत्तर: सीएए केवल उन तीन पड़ोसी देशों में धार्मिक उत्पीड़न से सम्बंधित है, जहां राज्य का एक निर्धारित धर्म है। अन्य धर्मों के मानने वालों का इन तीन देशों में उत्पीड़न होता है। यह कानून पूरी तरह सटीक है और ऐसी खास स्थिति में समाधान प्रदान करता है, जहां छह अल्पसंख्यक समुदायों के कुछ विदेशियों को उस स्थिति का सामना करना पड़ता है।
प्रश्न 8. क्या इसका अर्थ यह है कि इन तीन देशों के मुसलमान कभी भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं कर सकते?
उत्तरः नहीं। इन तीन तथा अन्य देशों के मुसलमान भारतीय नागरिकता के लिए हमेशा आवदेन कर सकते है और पात्र होने पर नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं। सीएए किसी भी देश के किसी विदेशी को भारत की नागरिकता लेने से नहीं रोकता, बशर्ते वह व्यक्ति कानून के अंतर्गत वर्तमान योग्यताओं को पूरा करता हो। पिछले छह वर्षों के दौरान लगभग 2,830 पाकिस्तानी नागरिकों, 912 अफगानी नागरिकों तथा बांग्लादेश के 172 नागरिकों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई है।
इनमें से सैकड़ों लोग इन देशों में बहुसंख्यक समुदाय से हैं। ऐसे विदेशी नागरिक भारतीय नागरिकता प्राप्त कर रहे हैं और यदि विदेशी नागरिक पंजीकरण या स्वभाविक नागरिकता के लिए कानून में दी गई पात्रता शर्ते पूरी करते हैं तो उन्हें नागरिकता मिलती रहेगी। भारत और बांग्लादेश के बीच 2014 में सीमा समझौता होने के बाद भारत में बांग्लादेश के 50 से अधिक इलाकों को शामिल किए जाने से लगभग 14,864 बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई। इनमें से अनेक बहुसंख्यक समुदाय के हैं।
प्रश्न 9. तो फिर सीएए किस पर लागू होगा?
उत्तरः सीएए पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण 31/12/2014 तक भारत आने वाले हिन्दू, सिख, जैन, पारसी तथा ईसाई समुदाय के लोगों के लिए प्रासंगिक है। सीएए इन तीन देशों सहित किसी भी देश से आने वाले मुसलमान सहित विदेशी नागरिकों के मामले में लागू नहीं होता।