China-Nepal: नेपाल को श्रीलंका और पाकिस्तान बनाने पर जुटा चीन, पीएम प्रचंड की चीन यात्रा पर लगी देश की निगाहें
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विस्तार
जिस तरह से चीन धीरे-धीरे नेपाल में कर्ज देकर इस देश को अपनी गिरफ्त में करने की तैयारी कर रहा है ठीक उसी तरह नेपाल में अब लोगों के बीच में चीन के खतरनाक मंसूबों वाली रणनीति का विरोध भी होने लगा है। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि नेपाल ने अपनी साजिशों के तहत चीन में निवेश के नाम पर कर्ज तो दिया लेकिन उसे कर्ज के बदले शुरू किए जाने वाले काम की शुरुआत तक नहीं की। फिलहाल विशेषज्ञों का कहना है चीन ने जिन साजिशों के चलते श्रीलंका और पाकिस्तान में निवेश किया है ठीक उसी तर्ज पर नेपाल में वह बढ़ावा दे रहा है। वहीं 23 सितंबर को नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल प्रचंड का चीन का दौरा इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि चीन की ओर से नेपाल में भारत को लेकर लगातार विरोधाभासी बयान दिए जा रहे हैं। यही वजह है भारत और अमेरिका जैसे बड़े देशों की निगाहें इस महत्वपूर्ण दौरे पर लगी हुई है।
विदेशी मामलों की जानकारो का कहना है कि नेपाल के प्रधानमंत्री की चीन में होने वाली बैठक बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर और चीन की रणनीतियों को करीब से समझने वाले असिस्टेंट प्रोफेसर अभिषेक प्रताप सिंह कहते हैं कि नेपाल हमेशा से चीन को अपने पक्ष में करने के लिए सभी रणनीतियां अपनाता रहा था। वह कहते हैं कि जब कोइराला की सरकार थी तो वह चीन के पक्ष में खड़े दिखाई देते थे। अभिषेक का कहना है कि कोविड के पहले से ही चीन ने नेपाल में बड़ा निवेश भी करना शुरू कर दिया था। लेकिन वह हैरानी जताते हुए कहते हैं कि अरबो डॉलर के कर्ज और संयुक्त निवेश के बाद भी चीन की ओर से शुरू किए जाने वाले प्रोजेक्ट की रिपोर्ट अभी भी शून्य बनी हुई है। इसी को लेकर चीन के कुछ राजनीतिक दलों के और सत्ता पक्ष के बीच में घमासान भी बचा हुआ है।
चीन नीतियों के मामलों के जानकार अभिषेक सिंह कहते हैं यह चीन की सोची समझी रणनीति का हिस्सा ही है कि वह जरूरतमंद मुल्कों को ज्यादा से ज्यादा ब्याज की दरों पर लोन उपलब्ध कराता है और फिर उसमें काम नही करता है। वह कहते हैं कि नेपाल में भी इसी तरीके की रणनीति से चीन ने श्रीलंका और पाकिस्तान बनाने की परिस्थितियों पैदा करनी शुरू कर दी हैं। उनका कहना है कि चीन ने 2017, 2018 और 2019 में नेपाल के व्यापार को सुधारने के नाम पर कई प्रोजेक्ट में निवेश करना शुरू किया। इनमें हाइड्रो प्रोजेक्ट से लेकर टेलीकम्युनिकेशन, हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री से लेकर सड़क हाईवेज पुल और छोटे-छोटे व्यापार में भी निवेश का पूरा रोड मैप तैयार किया।
जानकारी के मुताबिक चीन ने टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए नेपाल में होटल और रेस्टोरेंट इंडस्ट्री में भी भारी निवेश किया। नेपाल के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 17 बड़े होटल चीन की ओर से नेपाल की राजधानी काठमांडू और कास्की में खोले गए। स्थानीय व्यापारियों ने चीन की ओर से खोले गए इन होटल और रेस्टोरेंट का खुलकर विरोध करना शुरू किया। विदेशी मामलों के जानकार और रक्षा विशेषज्ञ कर्नल आरएन धूलिया कहते हैं कि नेपाल में खुले चीन के हॉस्पिटैलिटी सेक्टर का विरोध इसलिए होना शुरू हुआ क्योंकि यहां के व्यापारियों ने कहा टूरिज्म के नाम पर चीन के होटल में ही उनके टूरिस्ट आकर रुकते हैं इसलिए उनके व्यापार को नुकसान हो रहा है। सिर्फ होटल और रेस्टोरेंट इंडस्ट्री में ही चीन ने नेपाल के हजारों करोड रुपए का निवेश तो किया लेकिन उसमें भी ऐसी रणनीति अपनाई कि नेपाल के व्यापारियों का धंधा ही चौपट होने लगा। नेपाल के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक चीन की 63 कंपनियों ने नेपाल में होटल और रेस्टोरेंट के लिए अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। जो सभी उसी तर्ज पर काम कर रहे हैं जिससे नेपाल के इस इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के व्यापार पर फर्क पड़ रहा है।
नेपाल और चीन को व्यापारिक गतिविधियों पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि 2020 से 2022 के बीच में नेपाल ने चीन से एक विशेष खुले व्यापारिक रास्ते से तकरीबन दो बिलियन डॉलर का इंपोर्ट किया। जबकि इतने ही साल में एक्सपोर्ट के नाम पर चीन ने महज 5 मिलियन डॉलर का ही सामान नेपाल से चीन में भेजा। आर्थिक मामलों के जानकार हरदीप साहनी कहते हैं कि 2020 से 2022 के बीच में चीन ने नेपाल को साढ़े तीन बिलियन डॉलर से ज्यादा की ग्रांट दी। जो कि नेपाल के अलग-अलग प्रोजेक्ट के लिए दी गई थी। जानकारी के मुताबिक सिर्फ चीन ने इसी तरीके से नेपाल के भीतर अपना वर्चस्व बढ़ाने के लिए लेन देन नहीं शुरू किया बल्कि कोविड से पहले चीन और नेपाल के बीच में राशुवाहडी और केरुंग बॉर्डर को खोल करके व्यापार की शुरुआत की थी। विदेशी मामलों के जानकारो का कहना है कि चीन ने कोविड में इस शुरू हुए व्यापारिक रूप को बंद कर दिया। डीयू में असिस्टेंट प्रोफेसर अभिषेक सिंह कहते हैं कि इस मामले में जब नेपाल में विरोध होना शुरू हुआ और नेपाल सरकार पर दबाव पड़ा तो 2022 में इसको एक बार फिर से खोला गया। नेपाल ने कुटिल रणनीति के चलते 2023 में एक बार फिर से इस रास्ते को बंद कर दिया।
विदेशी मामलों के जानकारों का मानना है कि इस व्यापारिक रास्ते को बंद किए जाने से नेपाल का जो व्यापारिक दायरा बढ़ रहा था वह न सिर्फ सिमट गया बल्कि उसकी इंडस्ट्री को भी बड़ा नुकसान होने लगा। विदेशी मामलों के जानकार और रक्षा विशेषज्ञ कर्नल धूलिया कहते हैं कि दरअसल चीन का मकसद इस रास्ते को खोलकर व्यापार की बजाय अपने इन्वेस्टर और उन लोगों को समय-समय पर भेजने की योजना थी जो की नेपाल में अपने खुफिया नेटवर्क को स्थापित कर सके। वह कहते हैं कि इस मामले में चीन में नेपाल को महज एक इस्तेमाल किए जाने वाले टूल से ज्यादा कभी कुछ समझ ही नहीं रहा है। यही वजह रही कि चीन लगातार नेपाल को अपने बहकावे में फंसा कर श्रीलंका और पाकिस्तान की तर्ज पर फसाने की पूरी योजना बनाता रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने 2017 में केरूम और काठमांडू के बीच में रेलवे प्रोजेक्ट के लिए एक करार किया था। इसके बाद चीन की एक्सिम बैंक से 215 मिलियन डॉलर का पोखरा एयरपोर्ट के लिए लोन की स्वीकृत करवाई गई। विदेशी मामलों के जानकार बताते है एक्सिम बैंक की ओर से पोखरा एयरपोर्ट के लिए जो ऋण स्वीकृत हुआ था उसका कितना इस्तेमाल हुआ है यह पोखरा एयरपोर्ट पर किए गए काम से पता चलता है। जानकारों का मानना है कि चीन लगातार अपनी शातिर रणनीतियों के चलते नेपाल को अलग-अलग प्रोजेक्ट में साझेदार बनाकर न सिर्फ नेपाल के ऊपर वित्तीय बोझ बढ़ा रहा है बल्कि उन प्रोजेक्ट को शुरू भी नहीं कर रहा है। इसको लेकर अंदर ही अंदर विरोध भी पैदा हो रहा है। चीन ने नेपाल में निवेश के नाम पर मोरसियोडी हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए एक बिलियन डॉलर से ज्यादा का फंड दिया गया। इसके अलावा चीन के शिंचुआ प्रोविंशियल इन्वेस्टमेंट ग्रुप की ओर से नेपाल के बुटवल में पावर प्रोजेक्ट के लिए करार किया गया। 2017 में चीन के गुझाउबा ग्रुप की ओर से नेपाल में तकरीबन 45 मिलियन डॉलर के हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट के लिए एक समझौता हुआ।
विदेश और रक्षा मामलों के जानकार कर्नल धूलिया कहते हैं कि चीन का नेपाल में सबसे ज्यादा दखल तिब्बत की अपनी रणनीतियों के लिहाज से भी बड़ा खतरनाक साबित हो सकता है। वह कहते हैं कि नेपाल में बहुत से तिब्बती निर्वाचित होकर रह रहे हैं। उनकी सुरक्षा के साथ-साथ उनकी जानकारी को भी नेपाल के बीच में किसी रणनीति के माध्यम से लगातार लिख भी किया जा रहा है। जिस तरीके से नेपाल में चीन का दखल बड़ा है उसके साथ नेपाल की अपनी खुफिया एजेंसियों को मिलने वाली जानकारी का भी ग्राफ भी बढ़ता जा रहा है। हालांकि वह कहते हैं कि नेपाल में चीन की अधिक हस्तक्षेप के चलते हमेशा से उनका अपना खुफिया नेटवर्क लगातार भारत पर भी करीब से निगरानी रखता है।