{"_id":"5f568e458ebc3e61571a867f","slug":"china-playing-double-game-in-lac-his-plane-is-disclosed","type":"story","status":"publish","title_hn":"लद्दाख में 11 सितंबर तक न निकली राह तो आगे बढ़ेगी भारत-चीन की पेचीदगियां","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
लद्दाख में 11 सितंबर तक न निकली राह तो आगे बढ़ेगी भारत-चीन की पेचीदगियां
Tue, 08 Sep 2020 01:17 AM IST
Amit Mandal
शशिधर पाठक, अमर उजाला
शशिधर पाठक, अमर उजाला
Published by: Amit Mandal
Updated Tue, 08 Sep 2020 01:17 AM IST
सार
- चीन खेल रहा है डबलगेम
- बफर जोन पर अड़कर लद्दाख में समाधान की कोशिश ड्रैगन के अड़ियल रुख का संदेश
- बना रहा है नए सिरे से दबाव
विज्ञापन
भारत चीन गतिरोध
- फोटो : iStock
विस्तार
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और चीन के रक्षा मंत्री वेई फेंग ने मास्को में कोई दो घंटे 20 मिनट तक चर्चा की। चर्चा के मिनट्स बाहर नहीं आए हैं, लेकिन चीन के ग्लोबल टाइम्स और भारतीय मीडिया में छप रही सूचनाएं 11 सितंबर तक कोई नतीजा आने का संकेत कर रही हैं। 10 सितंबर को विदेश मंत्री एस जयशंकर का मास्को दौरा प्रस्तावित है। विदेश मंत्री वहां शंघाई सहयोग संगठन(एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने जाएंगे और चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मिलेंगे। इससे पहले जयशंकर के रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से भेंट की सूचना है।
विज्ञापन
चीन ने अरुणाचल पर जताया दावा
दोनों देशों के बीच में लद्दाख क्षेत्र को लेकर तनाव बना हुआ है। दोनों देशों के अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू वाहन, आर्टिलरी, इंफैट्री, मानिटरिंग इक्विपमेंट समेत सैन्य संसाधन किसी चुनौती से निबटने की ताक में हैं। इस बीच ने भारत के अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र होने का दावा जता दिया है। चीन के प्रवक्ता झाओ लिजिन ने इसे तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताया है। इससे पहले भी चीन अरुणाचल प्रदेश में भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के जाने के कार्यक्रम को लेकर कड़ी प्रतिक्रिया देता रहा है। वह इस क्षेत्र के लोगों को स्टपल वीजा देने की कूटनीतिक चाल भी चल चुका है। हालांकि भारत ने कभी भी चीन के इस दावे की बहुत परवाह नहीं की। बताते चलें कि झाओ लिजिन ने सोमवार को भी कहा कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश को भारत का प्रदेश मानने को कभी मान्यता नहीं दी है। चीन के प्रवक्ता ने अरुणाचल के पांच भारतीय युवकों को चीन की सेना द्वारा अगवा किए जाने के प्रश्न के जवाब में कहा है। समझा जा रहा है कि ये पांच युवक भारतीय सेना की रसद सामग्री को पहुंचाने (पोर्टर का काम) के बाद वहां जंगल में औषधियां (जड़ी-बूटी) इकट्ठा करने या शिकार कर रहे थे, और चीन की सेना ने अगवा कर लिया।
विज्ञापन
क्या है चीन की मंशा?
कई रक्षा और विदेश नीति के जानकारों की राय में चीन डबलगेम खेल रहा है। कुल मिलाकर उसकी कोशिश लद्दाख क्षेत्र में बफर जोन के बहाने अपना हित सुरक्षित करने की है। वह पाकिस्तान के पाक अधिकृत कश्मीर से होकर अक्साई चिन, कराकोरम मार्ग से गुजरने वाले हाई-वे को भारत की निगहबानी से दूर रखना चाहता है। ताकि भारत भविष्य में कभी अक्साई चिन, तिब्बत के पठार की तरफ आंख उठाकर भी न देख सके। इसलिए उसने भारत के पैगांग त्सो लेक, गोगरा पोस्ट, सामरिक रूप से महत्वपूर्ण डेपसांग, गलवां वैली के इलाके में सैन्य अपने सैनिकों की घुसपैठ कराई है। इसके लिए राष्ट्रपति जी शिनपिंग ने इस साल के शुरुआत में ही चीनी सैनिकों को सैन्य मूवमेंट की अनुमति दे दी थी। इसके लिए तिब्बत में भारी-भरकम सैन्य युद्धाभ्यास को केन्द्र में रखकर चीन ने हिडेन एजेंडे पर काम किया था।
विज्ञापन
सूत्र बताते हैं कि अब चीन चाहता है कि गलवां वैली में जिस तरह से भारत और चीन की सेनाएं पीछे हटी हैं, उसी तरह से लद्दाख के अन्य क्षेत्र में भी दोनों बराबर की दूरी पर पीछे हटें। इस पीछे हटकर सैन्य तैनाती से खाली होने वाले क्षेत्र को दोनों देशों के बीच में सीमा विवाद का समाधान होने तक बफर जोन में बदल दिया जाए।
डबल गेम खेल रहा है चीन
चीन के रक्षा मंत्री वेई फेंग हों या स्टेट काऊंसलर, विदेश मंत्री वांग या फिर चीन का विदेश मंत्रालय, भारत में चीन के राजदूत। चीन इनके सहारे सुनियोजित डबलगेम खेलकर मामले को लंबा खींचने की रणनीति पर काम कर रहा है। चीन का विदेश मंत्रालय, विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री भारत से संवाद के जरिए समस्या के समाधान, सीमा पर शांति और सौहार्द की बहाली पर लगातार जोर दे रहे हैं। वार्ता भी हो रही है, लेकिन चीन का पक्ष इस पर अमल नहीं कर रहा है। बल्कि चीन की लगातार कोशिश है कि वह दिखा सके कि इस पूरे हालात के लिए भारत का अड़ियल रुख जिम्मेदार है। उसके नेता लगातार यही आरोप लगा रहे हैं। चीन भारत के विदेश मंत्रालय की अपील पर भी कोई कान नहीं दे रहा है। न ही जून के तीसरे सप्ताह में विदेश मंत्री वांग यी और विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच में बनी सहमति और 05 जुलाई को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि (एनएसए अजीत डोभाल और स्टेट काऊंसलर वांग यी) के बीच में बनी सहमति पर अमल कर रहा है।
जुलाई 2019 से ही खड़े हैं चीन के कान
राजनयिक सूत्रों की मानें तो लद्दाख क्षेत्र में चीन के कान जुलाई 2019 से खड़े हैं। करीब आठ-नौ महीने पहले एक कार्यक्रम के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर की इशारों में स्वीकारोक्ति भी चीन के इस अज्ञात डर की तरफ संकेत करती है। माना जा रहा है कि संसद भवन में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साईचिन जैसे क्षेत्र को कब्जे मेंं लेने का दावा किया था। माना जा रहा है कि भारत के इस दावे के बाद से चीन इसे नई दिल्ली का गोपनीय एजेंडा मानकर आक्रामक तरीके से इस क्षेत्र को अपना साबित करने की रणनीति पर काम कर रहा था। नाम न छापने की शर्त पर विदेश मंत्रालय के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि हमारे राजनेताओं का अपनी जुबान पर नियंत्रण नहीं रहता। इसका कभी न कभी खामियाजा किसी न किसी रूप में आता है। राजनयिक गलियारे में माना जा रहा है कि चीन की योजना अब बफर जोन के रूप में क्षेत्र को सुरक्षित और हित साधने की है।
रूस नहीं चाहता कि भारत और चीन में बढ़े टकराव
रूस के हर ताकतवर फोरम का सदस्य भारत और चीन हैं। दोनों देश एशिया क्षेत्र में प्रभावशाली रुतबा रखते हैं। चीन जहां एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, वहीं भारत दुनिया की तेज गति बढ़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। ऐसे में रूस की कोशिश भारत और चीन के सहयोग से एशिया और खासकर दक्षिण एशिया में अमेरिका की गहराती पैठ को रोकने की है। इसी लक्ष्य को साधने के लिए रूस ने भारत और चीन के साथ पहले आरआईसी (रूस-चीन-भारत), फिर ब्रिक्स (ब्राजील-रूस-भारत-चीन- दक्षिण अफ्रीका) का फोरम बनाया। इसके बाद शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में भारत को और चीन के दबाव में पाकिस्तान को शामिल किया। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और विदेश मंत्री सर्गे लावरोव किसी भी दशा में इन सभी फोरम को कमजोर नहीं देखना चाहते। इसकी मजबूती भी भारत और चीन के बीच में सामंजस्यपूर्ण रिश्ते पर निर्भर करती है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि भारत का पुराना विश्सनीय सामरिक साझीदार रूस चीन (रूस और चीन की केमिस्ट्री अच्छी है) के साथ तालमेल तालमेल का समीकरण बनाने में सहायक होगा।
चीन के नेताओं की नजर राष्ट्रपति चुनाव पर
भारत के कुछ राजनयिक अभी इस मुद्दे पर खुलकर नहीं बोलना चाहते, लेकिन उनका मानना है कि भारत-चीन के बीच में तनाव के मद्देनजर सभी की निगाह अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव पर टिकी है। बताते हैं अमेरिका में राष्ट्रपति नतीजा दोनों देशों के बीच तनाव पर सीधा असर डालेगा। इसको लेकर भारत और चीन दोनों के राजनयिकों की अपनी-अपनी उम्मीदें हैं। माना जा रहा है कि इसका सीधा असर चीन और अमेरिका के द्पिक्षीय रिश्ते, अंतरराष्ट्रीय संबंध पर पड़ सकता है। दोनों देशों के बीच में जारी व्यापार युद्ध की स्थिति के भी बदलने या गंभीर होने की संभावना है।