एमटीसीआर सदस्यता के लिए चीन ने एनएसजी में रोकी भारत की राह
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अमेरिका सहित अन्य ताकतवर देश अगर चीन की मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में शामिल करने की शर्त मान लेते तो भारत का परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में शामिल होने का सपना पूरा हो जाता।
दरअसल भारत को एनएसजी की सदस्यता के लिए चले कूटनीतिक दांवपेंच के बीच चीन ने शर्त रखी थी कि वह एमटीसीआर में शामिल करने की शर्त पर ही एनएसजी में भारत के प्रवेश का विरोध नहीं करेगा। शर्त ठुकराए जाने पर सियोल में हुई एनएसजी की बैठक में चीन ने भारत की राह रोकने के लिए पहले पाकिस्तान को भी सदस्यता देने और बाद में परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर न करने वाले देशों के दावे पर विचार न करने का प्रस्ताव रखा।
चीन के इस प्रस्ताव को एनएसजी के आधा दर्जन अन्य देशों का भी समर्थन मिला। सरकारी सूत्रों के मुताबिक चीन एमटीसीआर के गठन के बाद से ही दुनिया के शीर्ष 34 मिसाइल निर्माता देशों के समूह में शामिल होने की कोशिश में लगा है। जब अमेरिका, रूस, फ्रांस और जर्मनी ने एनएसजी में भारत को शामिल करने के लिए लॉबिंग की शुरुआत की तो चीन ने इसे खुद को एमटीसीआर में शामिल करने का एक बड़ा अवसर माना।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक चीन ने अमेरिका सहित कई अन्य देशों के सामने भारत को एनएसजी की सदस्यता दिए जाने के बदले खुद को एमटीसीआर में शामिल करने की शर्त रख दी। इसके लिए अमेरिका राजी नहीं हुआ। इसके बाद ही चीन ने भारत को एनएसजी से दूर करने के लिए सारी कूटनीतिक ताकत झोंक दी।
बहरहाल अब भारत की सदस्यता के दावे पर इस साल दिसंबर महीने में एनएसजी के सदस्य देशों की विशेष बैठक बुलाने की रणनीति तय की गई है। इस बैठक में भारत के दावे के अलावा एनपीटी पर हस्ताक्षर न करने वाले देशों को एनएसजी में शामिल किए जाने के लिए नई रूपरेखा तय करने पर विचार विमर्श हो सकता है।
हालांकि अगर विशेष बैठक हुई तो भी चीन को साधे बिना भारत को एनएसजी में प्रवेश मिलना मुश्किल है क्योंकि एनएसजी में शामिल होने के लिए सभी देशों की सहमति हासिल करना अनिवार्य है।
क्या है एमटीसीआर?
मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर)
- 35 देशों का समूह है एमटीसीआर। (भारत के जुड़ने के बाद)
- सात देशों ने मिलकर अप्रैल 1987 में एमटीसीआर की स्थापना की थी।
- 27 देश बाद में इसमें शामिल हुए जिसके बाद सदस्य देशों की संख्या 34 हो गई थी।
- 35वां देश है भारत, जो इस समूह से जुड़ा है।
- 2008 के बाद से भारत उन पांच देशों में से एक है, जो एक पक्षीय ढंग से एमटीसीआर के समर्थक हैं।
एमटीसीआर का काम दुनिया भर में मिसाइल द्वारा रासायनिक, जैविक, नाभिकीय हथियारों के प्रसार पर नियंत्रण रखना है। हालांकि इस टेक्नोलॉजी का प्रयोग कोई भी देश केवल अपनी सुरक्षा के लिए कर सकता है। इस समूह में देश के अधिकतर प्रमुख मिसाइल निर्माता शामिल हैं।
सदस्य होने का मतलब : एमटीसीआर में शामिल होने के बाद भारत को अपनी मिसाइल तकनीक व प्रक्षेपण से जुड़ी जानकारी सदस्य देशों को देनी होगी।
मकसद : दुनिया भर में मिसाइल के प्रसार को रोकना तथा मानव रहित हथियार पर रोक लगाना है। ताकि मिसाइल क्षमता 300 किमी के दायरे में ही रहे। भारत को फायदा : प्रमुख उत्पादक देशों से अत्याधुनिक मिसाइल तकनीक और मॉनीटरिंग सिस्टम खरीद में मदद मिलेगी तथा दूसरे देशों से मिसाइल तकनीक हासिल करना आसान हो जाएगा। अमेरिका से ड्रोन तकनीकी लेना सरल हो जाएगा। भारत ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें बेच सकेंगे। शर्त होगी कि मिसाइल का मारक क्षमता 300 किमी तक हो तथा वह 500 किग्रा तक हथियार ले जाने में ही सक्षम हो।
हेग आचार संहिता के लिए दावेदारी : इसकी सदस्यता के बाद भारत के हेग आचार संहिता में शामिल होने की दावेदारी को मजबूती मिलेगी। यह संहिता बैलेस्टिक मिसाइल अप्रसार संधि की निगरानी करती है।
चीन और पाकिस्तान नहीं हैं इसके सदस्य : अभी तक चीन और पाकिस्तान इस विशेष समूह के सदस्य नहीं हैं।
एमटीसीआर समूह के सदस्य देश
कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, ग्रेट ब्रिटेन, अमेरिका (1987), डेनमार्क, आस्ट्रेलिया, बेल्जियम, लग्जमबर्ग, नीदरलैंड, नार्वे, स्पेन (1990), फीनलैंड, ऑस्ट्रीया, न्यूजीलैंड, स्वीडन (1991), पुर्तगाल, स्वीटजरलैंड, ग्रीस, आयरलैंड (1992), अर्जेंटीना, हंगरी, आइसलैंड (1993), ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका (1995), तुर्की (1997), चेक गणराज्य, उक्रेन, पोलैंड (1998), कोरिया गणराज्य (2001), बुल्गारिया (2004) और भारत (2016)।
Published By Rahul Sankrityayan