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संघ में बदलाव : 13 साल की उम्र में आरएसएस से जुड़े दत्तात्रेय होसबाले को तीन साल पहले बनना था सरकार्यवाह 

Sat, 20 Mar 2021 11:23 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Sat, 20 Mar 2021 11:23 PM IST
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Changes in the Sangh: At the age of 13, Hosbole, associated with the RSS, was to become Sarkaryavah three years ago
दत्तात्रेय होसबोले - फोटो : file photo

करीब 65 साल के दत्तात्रेय होसबाले को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रतिनिधि सभा में सरकार्यवाह चुना है। उनका कार्यकाल तीन साल के लिए होगा। होसबाले मात्र 13 साल की उम्र में आरएसएस से जुड़ गए थे। 17 साल की उम्र में वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े और 20 साल की उम्र में जेपी की अगुआई में हुए आंदोलन में हिस्सा लेने के कारण 16 महीने मीसा के तहत जेल में बंद रहे। अब उनके कंधे पर आरएसएस के नंबर दो (सरकार्यवाह) की जिम्मेदारी है।

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भागवत के विश्वसनीय है दत्तात्रेय
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गहराई से जानने वालों का कहना है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के विश्वसनीय और प्रिय दत्तात्रेय होसबाले के लिए यह पद 2018 से इंतजार कर रहा है। उन्हें लोकसभा चुनाव 2019 से पहले आरएसएस का सरकार्यवाह बन जाना चाहिए था, लेकिन आरएसएस के भीतर की तमाम परिस्थितियों ने सुरेश भैय्या जी जोशी को तीन साल के लिए एक अवसर और दे दिया था। इस तरह से खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर सरकार्यवाह के दायित्व से मुक्ति पाने वाले भैय्या जी जोशी को 12 साल बाद (2009-2021) इससे मुक्ति मिल पाई।   होसबोले को 2008 में आरएसएस का सह सरकार्यवाह बनाया गया था। दरअसल भैय्या जी जोशी अपने संवाद में केन्द्र सरकार पर चुटकी लेते रहते थे। उनका केन्द्र सरकार को घेरना सरकार में अपच भी हो रहा था।

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कई भाषाओं के मर्मज्ञ हैं दत्तात्रेय होसबोले

दत्तात्रेय  होसबाले की मातृभाषा कन्नड़ है। वह अंग्रेजी में परास्नातक हैं। हिन्दी बहुत निपुणता से बोलते, लिखते हैं। संस्कृत, तमिल, मराठी भी आती है। उन्हें जानने वाले कहते हैं कि  होसबाले असमिया भी बोल लेते हैं और मलयालम भी समझते हैं। इसके अलावा उन्हें एकाध विदेशी भाषा भी आती है। नेपाल, रूस, अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड की यात्रा कर चुके हैं। पूरे भारत में भ्रमण के साथ-साथ दक्षिण भारत, पूर्वोत्तर भारत, नेपाल से सटे क्षेत्र में आरएसएस के विचारों के प्रचार-प्रसार का काम बखूबी किया है। सीखने, सिखाने, संगठनात्मक शक्ति बनाने में बेजोड़ हैं। बिना पूर्वाग्रह और सामने वाले को अच्छी तरह से सुनने के बाद अपनी राय व्यक्त करते हैं।

हो सकते हैं अगले आरएसएस प्रमुख
होसबाले के पास उम्र और समय दोनों है। सरसंघ चालक मोहन मधुकर भागवत से वह उम्र में कोई पांच साल छोटे हैं। 70 साल के मोहन भागवत सरकार्यवाह पद के दायित्व से मुक्त हुए भैय्या जी जोशी से तीन साल छोटे हैं। मोहन भागवत भी 2000 में दिवंगत सरसंघ चालक के एस सुदर्शन के साथ सरकार्यवाह बने थे। तब सरसंघ चालक राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भैय्या और एचवी शेषाद्रि ने उम्र और स्वास्थ्य का हवाला देकर दायित्व से मुक्ति ले ली थी। 2009 में केएस सुदर्शन द्वारा अपने उत्तराधिकारी के रूप में मोहन भागवत को चुने जाने के बाद 21 मार्च 2009 से वह सरसंघ चालक का पदभार संभाल रहे हैं। संघ के भीतर तमाम स्थितियों को समझने वाले एक वर्ग को उम्मीद थी कि सर कार्यवाह भैय्या जी जोशी को भी सरसंघ चालक बनने का अवसर मिल सकता है। इसी तरह से संघ के प्रचारकों का एक बड़ा धड़ा अब सरकार्यवाह दत्तात्रेय हसबोले में अगले सरसंघ चालक का अक्स देख रहा है। 


 

पीएम मोदी के साथ है सहयोगात्मक रिश्ता

सरसंघ चालक मोहन राव भागवत ने संगठनात्मक संतुलन बना रखा है। वह अपने पूर्ववर्ती के.एस सुदर्शन की तरह केन्द्र सरकार से तल्ख रिश्ते के पक्षधर नहीं हैं। संघ की सामाजिक, सांस्कृतिक, संरचनात्मक सोच, विचारधारा के प्रसार को भी उन्होंने समय के हिसाब से स्वरुप दिया है। हालांकि उनके कई वक्तव्यों को लेकर संघ, भाजपा, संघ के अनुषांगिक संगठनों में नाराजगी भरी चर्चा भी हुई। किसी ने इसे नया संघ तक कहा। अभी भी यह चर्चा खत्म नहीं हुई है, लेकिन आरएसएस प्रमुख इससे विचलित नहीं हुए। 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ लेने के बाद केन्द्र सरकार और संघ से समन्वय की एक बड़ी जिम्मेदारी सह सरकार्यवाह कृष्णगोपाल के जिम्मे थी। बताते हैं 2009 में लोकसभा चुनाव से पहले संघ की प्रतिनिधि सभा में एक बदलाव की उम्मीद की जा रही थी, लेकिन नहीं हो पाने की दशा में तत्कालीन सह सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले की भूमिका बढ़ गई थी। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केन्द्र सरकार के साथ वह बेहतर तालमेल बनाने में सफल रहे हैं। ऐसा समझा जा रहा है कि यही वजह है 2024 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव की भी जिम्मेदारी से वह जोड़े गए हैं। वह संघ के शताब्दी वर्ष (2025) कार्यक्रम का भी कार्यभार देखेंगे।


 
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संघ में आए बदलाव को समझिए

संघ ने परिस्थिति, चुनौती और भविष्य को देखकर टीम में बदलाव किया है। सह सरकार्यवाह पद पर नजर दौड़ाइये। अरुण कुमार को सह सरकार्यवाह चुना गया है। अरुण कुमार जम्मू-कश्मीर मामले के विशेषज्ञ माने जाते हैं। संघ ने जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन के पैरोकार राम माधव की संगठन में सक्रिय वापसी कराई है। सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी, वी भगैया के स्थान पर जहां अरुण कुमार चुने गए, वहीं मुकुन्द जी को भी सह सरकार्यवाह चुना गया है। प्रतिनिधि सभा का चुनाव संघ की भावी रणनीति की तरफ भी संकेत कर रहा है। अगली प्रतिनिधि सभा की बैठक 2024 में होगी। यह देश के आम चुनाव से पहले होगी। उम्मीद है कि उसमें भी कुछ बड़े निर्णय किए जाएंगे।

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