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भाजपा में बदलाव: प्रधानमंत्री मोदी का नजरिया- सक्रिय राजनीति से संन्यास की उम्र तय होना चाहिए

Thu, 07 Oct 2021 10:44 PM IST
सुरेंद्र जोशी शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुरेंद्र जोशी Updated Thu, 07 Oct 2021 10:44 PM IST
सार

भाजपा में संगठनात्मक बदलाव के पीछे मोदी-शाह-नड्डा का तर्क है कि बदलाव पार्टी की बेहतरी के लिए होते हैं। शाह ने 2014 में आडवाणी को किनारे कर संकेत दे दिया था। पार्टी ने सकारात्मक रुख वाले और युवा नेताओं को लगातार वरीयता दी। वह विरासत के नाम पर नेताओं को ढोने को तैयार नहीं है।
 

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Changes in BJP: PM Modis point of view - Age of retirement from active politics should be fixed
कार्यक्रम में बोलते हुए पीएम मोदी - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

2014 में देश की जनता ने नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताया उनके चेहरे वाली भाजपा को पूर्ण बहुमत दे दिया। देश में 30 साल बाद पूर्ण बहुमत की कोई सरकार बनी। इसके कुछ समय बाद ही दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में पार्टी के कार्यक्रम में जब लालकृष्ण आडवाणी के बोलने की बारी आई तो अमित शाह ने आडवाणी के सामने से माइक की दिशा मोड़कर उन्हें डायस से ही बोलने का इशारा कर दिया था। स्टेडियम में बैठे तमाम लोगों ने तभी महसूस कर लिया था कि भाजपा के बदलने के दिन शुरू हो गए हैं। इसके बाद से आज तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्ग दर्शन, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सक्रियता और पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा के चेहरे वाली भाजपा दृढ़ता के साथ धीरे-धीरे बदलती चली गई।

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पार्टी ने गुरुवार को अपनी नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा की है और इसमें फिर संदेश दे दिया कि वह किसी विरासत, परंपरागत राजनीति और तौर तरीकों को ढोने की बजाय लगातार बदलाव, युवाओं, नए चेहरों को वरीयता देने में विश्वास रखती है। पार्टी ने अपने मुखर राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी, मुखर लोकसभा सदस्य वरुण गांधी और सख्त तेवर वाली नेता मेनका गांधी तथा राम मंदिर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले विनय कटियार को इससे बाहर कर दिया।
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भाजपा के राजनीति के पंडितों को इसका काफी पहले से अनुमान भी था। भाजपा के पूर्व महासचिव संगठन (संजय जोशी) के करीबी का कहना है कि उन्हें इन चेहरों को बाहर किए जाने में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं लगता। उन्हें तो आश्चर्य इस पर है कि ऐसा इतने दिन बाद क्यों हुआ?

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75 साल से अधिक उम्र वालों को सक्रिय राजनीति में स्थान नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल के गठन में उम्र का ख्याल रखा। पार्टी ने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी को मार्गदर्शक मंडल में जगह दी। नई कार्यकारिणी में दोनों वरिष्ठ नेता और भाजपा के संस्थापक सदस्य का फिलहाल स्थान बना हुआ है। पहले ही कार्यकाल में प्रधानमंत्री को अपने मंत्रिमंडल में पहला फेरबदल और विस्तार करना था। उनके मंत्रिमंडल के कई चेहरों को 75 साल की आयु का नाम सुनकर पसीना आ रहा था। राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र भी तब केंद्र सरकार में मंत्री थे। न केवल कलराज मिश्र, बल्कि कई मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद प्रधानमंत्री ने दृढ़ता से सक्रिय राजनीति में आयुसीमा को आगे जारी रखा।

दूसरा बड़ा उदाहरण 2019 में टिकट बंटवारे का था। कई नेताओं के साथ यह छटपटाहट पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और डॉ. मुरली मनोहर जोशी को भी थी। आडवाणी के एक राजनीतिक सलाहकार नौ महीने से काफी संवेदनशील बने हुए थे, लेकिन एक दिन प्रधानमंत्री आडवाणी के घर गए। उनके बेटे जयंत आडवाणी को भी वहां पहुचने की सूचना दी गई और तय हो गया कि आडवाणी 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे। यह डॉ. मुरली मनोहर जोशी के लिए भी संदेश था और भाजपा फिर नए रास्ते पर चल पड़ी।

 

इसमें हैरानी की कोई बात नहीं

पार्टी के एक पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री कहते हैं कि इसमें हैरानी की कौन सी बात है? लोग जानना नहीं चाहते। महाराष्ट्र में देवेन्द्र फड़णवीस, हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर, झारखंड में रघुबर दास, उ.प्र. में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य समेत तमाम युवा नेताओं को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में पार्टी ने बड़ी जगह दी है। उ.प्र. में इस समय भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह हैं और पार्टी की नज़र में अच्छा काम कर रहे हैं।

पहले पैर छूने से परहेज, फिर छूए पैर और अब सब ठीक
लालकृष्ण आडवाणी के करीबियों में रहे एक नेता आफ द रिकॉर्ड चर्चा बताते हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान नरेंद्र मोदी आडवाणी की बहुत इज्जत करते थे। राजनीतिक गुरू के तौर पर उनके पैर छूते थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ दिनों तक इससे परहेज भी किया। वह बताते हैं कि कुछ साल ऐसे भी रहे जब आडवाणी के करीबी कनिष्ठ भाजपा नेता और प्रधानमंत्री मोदी के मंत्रिमंडल के तमाम सदस्य भी लालकृष्ण आडवाणी के करीब आने से कतराने लगे थे। लेकिन कहते हैं कि सबसे मुश्किल किसी बदलाव को एक प्लेटफार्म देना होता है। बताते हैं प्रधानमंत्री इस प्लेटफार्म को देने में निपुण हैं। उन्होंने फिर समय को देखा और आडवाणी के पैर छुए। घर गए और फिर राजनीति में आडवाणी में श्रद्धा रखने वालों के लिए बहुत कुछ आसान होता चला गया। इस राजनीतिक यात्रा में भाजपा भी बदल गई। प्रधानमंत्री और उनका चेहरा मजबूत होता गया। पार्टी में अनुशासन का आधार मजबूत बन गया। कई और बड़े बदलाव चुपचाप हो गए। सब कुछ बस सात साल में।

वरुण हो या मेनका विरासत की राजनीति ढोने से परहेज

दिल्ली से भाजपा के एक नेता हैं, वे खुलकर नहीं बोलना चाहते, लेकिन पार्टी के नए कार्यकारिणी सदस्यों की घोषणा पर कहते हैं कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा के दौर की पार्टी है। वह कहते हैं कि जो परफॉर्म नहीं कर सकता, वह प्रधानमंत्री की टीम में नहीं चल सकता। दरसल प्रधानमंत्री संघ की पृष्ठभूमि से राजनीति में आए हैं। संघ की अवधारणा व्यक्ति को मिलने वाले दायित्व तक केंद्रित है। व्यक्ति पर नहीं। इसलिए नए लोगों को अवसर देने के मामले में पुराने लोगों से परहेज करने में भाजपा को कोई हिचकिचाहट नहीं हो रही है। समझा जा रहा है कि वरुण गांधी या फिर मेनका गांधी को भी भाजपा ने इसी नजरिए के तहत कार्यकारिणी से बाहर रखा है। उन्हें बाहर रखने के पीछे उनके नाम के साथ जुड़ा गांधी का टैग भी है। इसके अलावा पिछले साल मेनका गांधी का एक वीडियो वायरल हुआ था। मेनका की तरह ही लखीमपुर खीरी प्रकरण पर वरुण गांधी के ट्वीट, उनके पत्र भी भाजपा को असहज करते रहे हैं। राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी भी अक्सर अपने ट्वीट, बयान आदि के जरिए मोदी सरकार को खठघरे में खड़ा करते आए। बजरंग दल के संस्थापक विनय कटियार भी इसी श्रेणी में आते हैं।


 

गिरिराज, नरोत्तम, ज्योतिरादित्य, मिथुन को जगह

गिरिराज सिंह केन्द्रीय मंत्री हैं। वह बिहार में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुरुप ही भाजपा की राजनीति करते हैं। उसी तरह बयान भी देते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार से उनके समीकरण ठीक नहीं रहते, लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में लगातार सीढ़ियां चढ़ने का मौका मिल रहा है। गिरिराज की पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह तमाम नेताओं के लिए संदेश की तरह है। मिथुन को भी जगह मिली है। मिथुन के बहाने पश्चिम बंगाल में भाजपा अपनी राजनीतिक लड़ाई को तेज करने का संदेश दे रही है। ज्योतिरादित्य का मान रखकर उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल के साथ-साथ राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान दिया गया है। किसी भी गलत संदेश को प्रसारित होने से रोकने और स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए नरोत्तम मिश्रा भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य के तौर पर शामिल किए गए हैं। छत्तीसगढ़ से अजय चंद्राकर, लता उसेंडी को जगह देना भी साफ संदेश है कि जो पार्टी और सरकार में कुछ कर रहा है, उसे पार्टी के शीर्ष नेता देख रहे हैं।

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