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तो क्या चंद्रशेखर आजाद पुलिस की गोली से मरे थे?

सुनील राय/बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए Updated Sat, 23 Jul 2016 04:15 PM IST
तो क्या चंद्रशेखर आजाद पुलिस की गोली से मरे थे?
तो क्या चंद्रशेखर आजाद पुलिस की गोली से मरे थे? - फोटो : BBC
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इलाहाबाद के संग्रहालय में चंद्रशेखर आज़ाद की वह पिस्तौल रखी है, जो 27 फ़रवरी 1931 की सुबह आज़ाद के हाथों में थी। मान्यता है कि इसी पिस्तौल से निकली गोली ने आज़ाद की जान ली थी। लेकिन पुलिस के कागज़ ऐसा नहीं कहते। कहीं आज़ाद पुलिस की गोली से तो नहीं मरे? इलाहाबाद के थाना कर्नलगंज में रखे बरतानवी पुलिस के अपराध रजिस्टर को देखें तो यह शक पैदा होता है। तत्कालीन पुलिस दस्तावेज़ कहते हैं कि उस सुबह क़रीब सुबह 10.20 पर आज़ाद एल्फ़्रेड पार्क में मौजूद थे। पुलिस के मुख़बिरों ने उनके वहां मौजूद होने की जानकारी दे दी थी। भारत की आज़ादी के लिए लड़ने वाले चंद्रशेखर आज़ाद बरतानवी पुलिस की हिटलिस्ट में थे। काकोरी कांड और उसके बाद 1929 में बम कांड के बाद पुलिस आज़ाद को ढूंढ रही थी।
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उस दौर के ज़्यादा दस्तावेज़ मौजूद नहीं हैं। बाद में आज़ादी के आंदोलन पर लिखने वाले यह साफ़ नहीं करते कि आख़िर उस सुबह कैसे घटनाक्रम तेज़ी से बदला था। भारत की अपराध प्रणाली अभी भी कमोबेश बरतानवी तौर-तरीक़ों पर ही आधारित है। ख़ासकर अगर कोई आज पुलिस की मुठभेड़ में मारा जाता है, तो वह मुठभेड़ को ठीक उसी तरह दर्ज करती है, जैसा पुलिस उस दौर में करती थी। अपराध रजिस्टर में मुक़दमा अपराध संख्या, अभियुक्त का नाम और धारा-307 (क़ातिलाना हमला) और नतीजे में अंतिम रिपोर्ट का विवरण देती है। मतलब यह कि अभियुक्त ने पुलिस पार्टी पर क़ातिलाना हमला किया, जिसके जवाब में पुलिस ने गोली चलाई और पुलिस की आत्मरक्षार्थ कार्रवाई में अभियुक्त की मौत हो गई। मान्यता है कि जब आज़ाद के पास एक गोली बची, तो उन्होंने ख़ुद को गोली मार ली। मगर सरकारी रिकॉर्ड इसकी तसदीक नहीं करता। इलाहाबाद के ज़िलाधिकारी परिसर में मौजूद फ़ौजदारी के अभिलेखागार में 1970 से पहले का दस्तावेज़ नहीं है।
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पुलिस आज भी मुठभेड़ को उसी तरह दर्ज करती

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