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Criminal Laws: नए आपराधिक कानूनों की समीक्षा कर रही सरकार, जांच एजेंसियों से मांगे गए सुझाव
Sat, 20 Jun 2026 11:59 AM IST
नितिन गौतम
सुनील मेहरोत्रा, अमर उजाला, मुंबई
सुनील मेहरोत्रा, अमर उजाला, मुंबई
Published by: नितिन गौतम
Updated Sat, 20 Jun 2026 11:59 AM IST
सार
केंद्र सरकार ने आपराधिक कानून लागू होने की दूसरी सालगिरह पर जांच एजेंसियों से सुझाव मांगे हैं। मुंबई पुलिस ने अरेस्ट मेमो से जुड़ी दिक्कतों पर सवाल उठाए हैं क्योंकि नागपुर में इसी वजह से एक मर्डर आरोपी को तत्काल बेल मिल गई थी।
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आपराधिक कानूनों की समीक्षा।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारतीय न्याय संहिता (BNS) कानून 1 जुलाई, 2024 से पूरे भारत में लागू हुआ है। इसी दिन से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) भी लागू किया गया था ।।दोनों कानूनों ने अंग्रेजों के जमाने के पुराने IPC और CRPC का स्थान लिया है। नए कानूनों के लगभग दो साल पूरे होने पर केंद्र सरकार इसका रिव्यू कर रही है। इस संबंध में देश भर की अलग-अलग जांच एजेंसियों से केंद्र सरकार द्वारा सुझाव मांगे गए हैं। महाराष्ट्र में भी डीजीपी ऑफिस के जरिए मुंबई सहित पूरे राज्य की पुलिस को कुछ दिनों पहले सुझाव से जुड़ी एक लिस्ट भेजी गई। मुंबई पुलिस के कुछ अधिकारियों ने हमसे बातचीत में इस बात की पुष्टि की। एक पुलिस स्टेशन के सीनियर इंस्पेक्टर ने बताया कि उनके पास जॉइंट सीपी लॉ एंड ऑर्डर की तरफ से इस संबंध में लेटर आया था। एक अन्य जांच यूनिट को उनके बॉस की तरफ से यह लेटर आया था।
अरेस्ट मेमो को लेकर आ रही दिक्कत
इन अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने BNS और BNSS के संबंध में अपने जवाब दो-तीन पहले लिख कर भेज दिए हैं। एक अधिकारी ने बताया कि नए कानून में काफी खूबियां हैं, पर इसमें कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। सबसे बड़ी दिक्कत है--अरेस्ट मेमो को लेकर। नए कानून में यह स्पष्ट किया गया है कि अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के आधार आरोपी को लिखित रूप में उपलब्ध कराए जाएं और यह जानकारी ऐसी भाषा में दी जाए जिसे वह समझता हो। हाल के दिनों में विभिन्न न्यायालयों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि आरोपी को उसकी समझ की भाषा में गिरफ्तारी के कारण बताना न्यायसंगत प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
11 जून को इसी अरेस्ट मेमो की कानूनी पेंचिदियों की वजह से नागपुर में मर्डर केस के एक आरोपी को कोर्ट ने बेल दे दी। इस पर काफी बवाल हुआ। दरअसल, नागपुर के यशोधरा नगर पुलिस स्टेशन ने जब हत्या प्रकरण में एक आरोपी को गिरफ्तार किया, तो गिरफ्तार करते समय आरोपी को गिरफ्तारी के कारण यानी Grounds of Arrest मराठी भाषा में दिए गए थे। आरोपी के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि आरोपी हिंदी भाषी है, इसलिए उसे अरेस्ट मेमो हिंदी में दिया जाना चाहिए था। वकील की इस बात से सहमत होते हुए नागपुर की एक कोर्ट ने गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए आरोपी को जमानत प्रदान कर दी थी।
बाद में उस केस का जांच अधिकारी उस स्कूल गया, जहां आरोपी ने शिक्षा प्राप्त की थी। वहां से आरोपी की कक्षा 10 की मार्कशीट निकलवाई गई। इस मार्कशीट में आरोपी मराठी में पास था, उसे 100 में से 39 अंक मिले थे। इसका मतलब था कि आरोपी को मराठी आती थी, इसलिए पुलिस के अनुसार, मराठी में आरोपी को अरेस्ट मेमो देना कानूनन गलत नहीं था। जांच अधिकारी ने यह व कुछ अन्य सबूत कोर्ट को पेश किए। इसके बाद पुलिस को आरोपी की दोबारा कस्टडी मिली। लेकिन इस प्रकरण ने नए कानून में अरेस्ट मेमो को लेकर बड़े सवाल उठा दिए।
विशेषज्ञों के क्या हैं तर्क?
एक अधिकारी के अनुसार, AI के युग में कोई भी यह तर्क दे सकता है कि आप AI से उस भाषा में अरेस्ट मेमो तैयार कर दीजिए, जो भाषा आरोपी जानता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या AI पर शत प्रतिशत भरोसा किया जा सकता है। इस अधिकारी के अनुसार, नए कानून में कहीं नहीं लिखा है कि AI से आरोपी की भाषा में अनुवाद कर उसे अरेस्ट मेमो दिया जाए। इसलिए कायदा यह कहता है कि किसी ट्रांसलेटर को बुलाकर उससे अनुवाद करवा कर आरोपी को अरेस्ट मेमो दिया जाए। लेकिन जब नए कानून में यह लिखा है कि आरोपी को अरेस्ट के तत्काल बाद ही अरेस्ट मेमो देना है, तब इतनी जल्दी ट्रांसलेटर को कहां ढूंढा जाए? यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
26/11 मुंबई हमला केस के मुख्य जांच अधिकारी रमेश महाले कहते हैं कि पुराने कानून में हम महाराष्ट्र में अरेस्ट मेमो के दो फॉर्म रखते थे। एक फॉर्म अंग्रेजी में होता था, जबकि दूसरा मराठी में। हम आरोपी को अरेस्ट करने के बाद इन दो में से कोई एक फॉर्म आरोपी से भरवा लेते थे और फिर उस अरेस्ट मेमो फॉर्म पर आरोपी के सिग्नेचर ले लेते थे। इसी तरह अरेस्ट करने के बाद आरोपी के परिवार में किसी को या तो पुलिस स्टेशन के लैंडलाइन नंबर से या खुद ऑफिसर द्वारा अपने मोबाइल से इसकी सूचना दी जाती थी। इसकी जानकारी लैंडलाइन और मोबाइल नंबर सहित पुलिस की स्टेशन डायरी में तो नोट की ही जाती थी, पंचनामा में भी इसका उल्लेख जरूर होता था
महाले कहते हैं, जब MISA (Maintenance of internal security ACT) कानून था, तब इस एक्ट में यदि किसी को अरेस्ट करना होता था, तो सामने वाले को उसकी ही लैंग्वेज (भाषा )में सिर्फ अरेस्ट मेमो ही नहीं, उसके केस से जुड़े सभी कागजात भी उसकी भाषा में दिए जाते थे। NSA (नैशनल सिक्युरिटी एक्ट ) और एमपीडीए (Maharashtra prevention of dangerous activities of slumlords, Bootleggers, Drug offenders and Dangerous persons ACt) कानून में भी जिसके खिलाफ एक्शन लिया जाता है, उसे उसकी ही भाषा में, जिसका वह जानकार है, उसके खिलाफ जुटाए गए सारे कागजात ट्रांसलेट कर दिए जाते हैं। लेकिन ऐसे केस कई-कई साल में एकाध बार होते हैं। जब पहले IPC में और अब BNS में हजारों केस रोज पूरे देश में दर्ज होते हैं, तब ऐसे में, एक अधिकारी के अनुसार, सभी आरोपियों को नए कानून के अनुसार, उन्हीं की भाषा में अरेस्ट मेमो देना व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है।
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अरेस्ट मेमो को लेकर आ रही दिक्कत
इन अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने BNS और BNSS के संबंध में अपने जवाब दो-तीन पहले लिख कर भेज दिए हैं। एक अधिकारी ने बताया कि नए कानून में काफी खूबियां हैं, पर इसमें कुछ व्यावहारिक दिक्कतें भी हैं। सबसे बड़ी दिक्कत है--अरेस्ट मेमो को लेकर। नए कानून में यह स्पष्ट किया गया है कि अरेस्ट मेमो में गिरफ्तारी के आधार आरोपी को लिखित रूप में उपलब्ध कराए जाएं और यह जानकारी ऐसी भाषा में दी जाए जिसे वह समझता हो। हाल के दिनों में विभिन्न न्यायालयों ने भी इस बात पर जोर दिया है कि आरोपी को उसकी समझ की भाषा में गिरफ्तारी के कारण बताना न्यायसंगत प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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- नए कानून में किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेते ही पुलिस के लिए तुरंत अरेस्ट मेमो तैयार अनिवार्य है। इस मेमो में गिरफ्तारी की तारीख, समय और स्थान का स्पष्ट उल्लेख करना होगा। साथ ही इस पर गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर लेने के अलावा परिवार के किसी सदस्य अथवा स्थानीय क्षेत्र के किसी सम्मानित व्यक्ति के हस्ताक्षर भी कराना आवश्यक होगा।
- नए कानून में अरेस्ट मेमो में केवल गिरफ्तारी का समय और स्थान ही नहीं, बल्कि गिरफ्तारी के स्पष्ट कारण तथा गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी का पूरा विवरण भी दर्ज किया जाना चाहिए।
- नए प्रावधानों के तहत पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति के किसी रिश्तेदार, मित्र या उसके द्वारा नामित व्यक्ति को तत्काल गिरफ्तारी और उसे किस स्थान पर रखा गया है, इसकी जानकारी देना भी अनिवार्य किया गया है ।
- पुराने कानून में ऐसा नहीं था।
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11 जून को इसी अरेस्ट मेमो की कानूनी पेंचिदियों की वजह से नागपुर में मर्डर केस के एक आरोपी को कोर्ट ने बेल दे दी। इस पर काफी बवाल हुआ। दरअसल, नागपुर के यशोधरा नगर पुलिस स्टेशन ने जब हत्या प्रकरण में एक आरोपी को गिरफ्तार किया, तो गिरफ्तार करते समय आरोपी को गिरफ्तारी के कारण यानी Grounds of Arrest मराठी भाषा में दिए गए थे। आरोपी के वकील ने कोर्ट में तर्क दिया कि आरोपी हिंदी भाषी है, इसलिए उसे अरेस्ट मेमो हिंदी में दिया जाना चाहिए था। वकील की इस बात से सहमत होते हुए नागपुर की एक कोर्ट ने गिरफ्तारी को अवैध मानते हुए आरोपी को जमानत प्रदान कर दी थी।
बाद में उस केस का जांच अधिकारी उस स्कूल गया, जहां आरोपी ने शिक्षा प्राप्त की थी। वहां से आरोपी की कक्षा 10 की मार्कशीट निकलवाई गई। इस मार्कशीट में आरोपी मराठी में पास था, उसे 100 में से 39 अंक मिले थे। इसका मतलब था कि आरोपी को मराठी आती थी, इसलिए पुलिस के अनुसार, मराठी में आरोपी को अरेस्ट मेमो देना कानूनन गलत नहीं था। जांच अधिकारी ने यह व कुछ अन्य सबूत कोर्ट को पेश किए। इसके बाद पुलिस को आरोपी की दोबारा कस्टडी मिली। लेकिन इस प्रकरण ने नए कानून में अरेस्ट मेमो को लेकर बड़े सवाल उठा दिए।
विशेषज्ञों के क्या हैं तर्क?
एक अधिकारी के अनुसार, AI के युग में कोई भी यह तर्क दे सकता है कि आप AI से उस भाषा में अरेस्ट मेमो तैयार कर दीजिए, जो भाषा आरोपी जानता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या AI पर शत प्रतिशत भरोसा किया जा सकता है। इस अधिकारी के अनुसार, नए कानून में कहीं नहीं लिखा है कि AI से आरोपी की भाषा में अनुवाद कर उसे अरेस्ट मेमो दिया जाए। इसलिए कायदा यह कहता है कि किसी ट्रांसलेटर को बुलाकर उससे अनुवाद करवा कर आरोपी को अरेस्ट मेमो दिया जाए। लेकिन जब नए कानून में यह लिखा है कि आरोपी को अरेस्ट के तत्काल बाद ही अरेस्ट मेमो देना है, तब इतनी जल्दी ट्रांसलेटर को कहां ढूंढा जाए? यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।
26/11 मुंबई हमला केस के मुख्य जांच अधिकारी रमेश महाले कहते हैं कि पुराने कानून में हम महाराष्ट्र में अरेस्ट मेमो के दो फॉर्म रखते थे। एक फॉर्म अंग्रेजी में होता था, जबकि दूसरा मराठी में। हम आरोपी को अरेस्ट करने के बाद इन दो में से कोई एक फॉर्म आरोपी से भरवा लेते थे और फिर उस अरेस्ट मेमो फॉर्म पर आरोपी के सिग्नेचर ले लेते थे। इसी तरह अरेस्ट करने के बाद आरोपी के परिवार में किसी को या तो पुलिस स्टेशन के लैंडलाइन नंबर से या खुद ऑफिसर द्वारा अपने मोबाइल से इसकी सूचना दी जाती थी। इसकी जानकारी लैंडलाइन और मोबाइल नंबर सहित पुलिस की स्टेशन डायरी में तो नोट की ही जाती थी, पंचनामा में भी इसका उल्लेख जरूर होता था
महाले कहते हैं, जब MISA (Maintenance of internal security ACT) कानून था, तब इस एक्ट में यदि किसी को अरेस्ट करना होता था, तो सामने वाले को उसकी ही लैंग्वेज (भाषा )में सिर्फ अरेस्ट मेमो ही नहीं, उसके केस से जुड़े सभी कागजात भी उसकी भाषा में दिए जाते थे। NSA (नैशनल सिक्युरिटी एक्ट ) और एमपीडीए (Maharashtra prevention of dangerous activities of slumlords, Bootleggers, Drug offenders and Dangerous persons ACt) कानून में भी जिसके खिलाफ एक्शन लिया जाता है, उसे उसकी ही भाषा में, जिसका वह जानकार है, उसके खिलाफ जुटाए गए सारे कागजात ट्रांसलेट कर दिए जाते हैं। लेकिन ऐसे केस कई-कई साल में एकाध बार होते हैं। जब पहले IPC में और अब BNS में हजारों केस रोज पूरे देश में दर्ज होते हैं, तब ऐसे में, एक अधिकारी के अनुसार, सभी आरोपियों को नए कानून के अनुसार, उन्हीं की भाषा में अरेस्ट मेमो देना व्यावहारिक रूप से संभव ही नहीं है।