माल्या-नीरव जैसे भगोड़ों को रोकेगा बैंकों का केंद्रीकृत डाटाबेस
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देश में विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े आर्थिक अपराधी देश छोड़ने इस लिए सफल हो रहे हैं क्योंकि बैंकों में धोखाधड़ी पकड़ने की प्रक्रिया बहुत लंबी और पेचीदा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशक पद से दो दिन पहले रिटायर हुए कर्नल सिंह के मुताबिक एनपीए होने के बाद कर्ज लेने वाले के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरु करने में लगभग पांच महीने का समय लग जाता है।
इस बीच वह खतरे के भांपते हुए देश से भाग निकलने में सफल हो जाता है। दरअसल ऐसे व्यापारी बैंक से ली हुई रकम को एक बैंक से दूसरे बैंक और एक खाते से दूसरे खाते में ट्रांसफर कर जांचकर्ता के लिए मनी ट्रेल में अड़चन पैदा करते हैं।
इसे रोकने के लिए कर्नल सिंह ने सरकार से सिफारिश की है कि ऐसे बड़े कर्ज के मामले रिजर्व बैंक के पास एक केंद्रीकृत डाटाबेस में रखे जाएं। इससे पांच महीने का काम आधे घंटे में ही हो जाएगा और आर्थिक अपराधियों को देश छोड़ने का मौका नहीं मिलेगा।
बैंक निगरानी करते तो न बनते ऐसे हालात
अमर उजाला से खास बातचीत में कर्नल सिंह ने कहा कि कर्ज देने के बाद बैंक यह निगरानी नहीं करते हैं कि आखिर वह पैसा जिस काम के लिए लिया गया है उसी में खर्च हो रहा है या नहीं। यदि वह ऐसा करते तो स्टर्लिंग बायोटेक के मालिक चेतन संदेसरा जैसे लोग शेल कंपनियों के जरिए बैंकों से लिए कर्ज को विदेश नहीं भेज पाते। न ही माल्या और मोदी जैसे व्यवसायी हजारों करोड़ डकार कर विदेश भाग जाते। सिंह ने कहा कि मनी लांड्रिंग की वजह से ना सिर्फ करदाताओं को बल्कि ईमानदार व्यवसायियों और देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी नुकसान होता है।
सिंह ने बताया कि छह साल पहले विशेष निदेशक के पद के लिए आवेदन करने से पहले उन्हें ईडी के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं था। लेकिन पद संभालने के बाद से लेकर तीन साल बतौर निदेशक कार्यकाल में इन्होंने ईडी की पूरी की पूरी ईमेज ही बदल डाली। उनके कार्यकाल में ईडी विवादों से दूर रहा और पहली बार पांच आर्थिक अपराध के मामलों में सजा दिलवाने में कामयाबी मिली।
किसी को उसका हक न देना भी बेईमानी
सिंह के मुताबिक उनकी कामयाबी का राज हर कर्मचारी से सीधी बातचीत और सघन तकनीकी प्रशिक्षण में है। वह हर एक कर्मचारी से उनकी समस्याओं और एजेंसी के कामकाज में सुधार के लिए सुझाव पर बात करते थे। इसी दौरान उन्हें प्रमोशन से संबंधित समस्याओं से लेकर भ्रष्ट कर्मचारियों के बारे में जानकारी मिलती थी।
भ्रष्टाचार की शिकायतों पर जांच के बाद सख्त कार्रवाई की। इससे एजेंसी में इमानदारी आई। प्रमोशन जैसी समस्याओं के दूर होने से इनमें काम के प्रति लगन और बढ़ी। यहां तक कि कर्मचारी अपनी पहल पर छुट्टियों के दिन भी दफ्तर आए और देर रात तक काम करते रहे। इसी का नतीजा था कि ईडी ने पिछले तीन साल में 33563 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की।
जबकि इससे पहले 40 साल में केवल 1057 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की गई थी। सिंह के मुताबिक उनका सबसे ज्यादा जोर जांच को तेजी और सटीक तरीके से करने पर रहा। उन्होंने कहा कि बेईमानी सिर्फ रिश्वत लेना ही नहीं है। अगर आप किसी का हक उसे नहीं देते तो वह भी एक बेईमानी है।
सिंह की सबसे बड़ी सफलता ईडी को दलालों से मुक्त करने में रही। जबकि सीबीआई की बदहाली और बदनामी का मुख्य कारण दलालों का निर्बाध प्रवेश रहा। जिस मोईन कुरैशी की वजह से सीबीआई के तीन निदेशकों के खिलाफ जांच शुरू हुई उसकी जांच ईडी ने भी की लेकिन बेदाग रहते हुए।