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भ्रष्टाचार में लिप्त अफसर नपेंगे तो नहीं झुकेगा ईमानदार नौकरशाहों का सिर, केंद्रीय सतर्कता आयोग बदल रहा है कामकाज का तरीका

Thu, 07 Jan 2021 06:42 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 07 Jan 2021 06:42 PM IST
सार

सीवीसी ने सभी विभागों के सीवीओ से कहा है कि वे मामले की जांच में यह ध्यान रखें कि आरोपी लोकसेवक अदालत की आड़ में तो खुद को नहीं बचा रहा है। ऐसे केसों में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के तहत आगे बढ़ा जाए, जिसमें कहा गया है कि किसी भी मामले में छह माह से अधिक समय का स्टे नहीं दिया जाएगा...

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central vigilance commission to government departments, set timeline to finalise vigilance cases  within 6-month time limit
central vigilance commission - फोटो : PTI (File Photo)

विस्तार

केंद्र सरकार में भ्रष्टाचार के मामलों का सामना कर रहे लोकसेवक अब नपने के लिए तैयार हो जाएं। उनके केसों का निपटारा अब तेज गति से होगा। वे लोकसेवक, जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और उन्होंने अपनी पहुंच का इस्तेमाल कर जांच कार्य में अनावश्यक विलंब कराया है, ऐसे नौकरशाह कार्रवाई से बच नहीं सकेंगे। केंद्रीय सतर्कता आयोग ‘सीवीसी’ अपने कामकाज का अंदाज बदलने जा रहा है।

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नई कार्ययोजना में भ्रष्टाचारी लोकसेवकों के बचने की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी और ईमानदार नौकरशाहों का सिर नहीं झुकेगा। मौजूदा परिस्थितियों में कुछ मामले ऐसे रहे हैं, जहां आरोपी लोकसेवक जांच के दौरान भी अनुचित गतिविधियों में शामिल रहे हैं और दूसरी तरफ उस केस से जुड़े ईमानदार अफसरों को हानि या मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है।
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सीवीसी ने ऐसे सभी मामलों की जांच एक तय समय सीमा के भीतर पूरी करने के निर्देश दिए हैं। सभी विभागों के मुख्य सतर्कता अधिकरी (सीवीओ) को विशेष हिदायतें जारी कर कहा गया है कि वे इन मामलों पर लगातार नजर रखेंगे और बिना किसी देरी के उनकी फाइनल रिपोर्ट आयोग को सौंपेंगे।
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बता दें कि केंद्रीय सतर्कता आयोग के सामने अनेक ऐसे मामले आते रहे हैं, जिनमें जांच कार्य के दौरान अनावश्यक देरी की जाती है। आयोग ने जब कई मामलों की पड़ताल की तो पता चला कि आरोपी लोकसेवक ही केस की जांच रिपोर्ट को आगे बढ़ने से रोक रहे हैं। इसका असर विभाग की कार्यप्रणाली पर पड़ रहा था। कई ईमानदारी अधिकारी जो किसी भी तरह से उस केस में शामिल होते हैं, जांच रिपोर्ट की देरी के चलते उन्हें हानि उठानी पड़ती है।

आरोपी लोकसेवक उन पर निशाना साधने का कोई मौका नहीं छोड़ते। जांच रिपोर्ट जमा कराने में हुई देरी भ्रष्टाचार में लिप्त लोकसेवक को नामुनासिब अवसर देती है। वह लोकसेवक दोबारा से अनुचित गतिविधियों में शामिल होने लगता है। संबंधित विभाग का स्टाफ भी ऐसे केसों में खुद को असुरक्षित महसूस करने लगता है। वे महसूस करते हैं कि फलां लोकसेवक पर भ्रष्टाचार के आरोप साबित होने पर भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही। ऐसे में कुछ कर्मचारी उस लोकसेवक की फाइल रोकने या उस पर टिप्पणी करने से बचते हैं।

आयोग के मुताबिक, यह भी देखने को मिला है कि कुछ विभागों में पिछले आठ दस साल तक के केस लंबित हैं। उनकी फाइनल जांच रिपोर्ट अभी तक नहीं सौंपी जा सकी है। ऐसे केसों की त्वरित जांच के लिए नए अधिकारियों को जिम्मेदारी दी जा रही है। जांच अफसर की नियुक्ति और आरोपी लोकसेवक को चार्जशीट देना, इन सब कार्यों के लिए दो माह का समय निर्धारित किया गया है। विभागीय जांच पूरी कर फाइनल रिपोर्ट भेजने की समयावधि छह माह तय की गई है। इसमें जांच अधिकारी की नियुक्ति से लेकर केस में गवाही और दूसरे सबूत जुटाना, सब शामिल है।

कुछ केस ऐसे भी हैं जो अदालतों में विचाराधीन होने के कारण लंबित पड़े हैं। ऐसे केसों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है, जब आरोपी अधिकारी किसी दूसरे मामले में सेवा से बाहर कर दिया गया हो। आरोप या दुर्व्यवहार के दौरान कोई लोकसेवक केंद्र में तैनात होता है, जबकि उसके मामले की जांच अथॉरिटी राज्य सरकार होती है, तो ऐसे केस की फाइलें भी इधर-उधर होती रहती हैं। यानी समय पर जांच कार्य पूरा नहीं हो पाता।


सीवीसी ने सभी विभागों के सीवीओ से कहा है कि वे मामले की जांच में यह ध्यान रखें कि आरोपी लोकसेवक अदालत की आड़ में तो खुद को नहीं बचा रहा है। ऐसे केसों में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के तहत आगे बढ़ा जाए, जिसमें कहा गया है कि किसी भी मामले में छह माह से अधिक समय का स्टे नहीं दिया जाएगा। सभी विभागीय सीवीओ खुद ऐसे केसों के जांच कार्य की निगरानी करेंगे। वे ध्यान रखेंगे कि आगे कोई भी जांच कार्य तय समयावधि में पूरा कर लिया जाए।

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