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Triple Talaq: सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का हलफनामा, कहा- मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिला रहा तीन तलाक कानून

Mon, 19 Aug 2024 02:40 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: बशु जैन Updated Mon, 19 Aug 2024 02:40 PM IST
सार

केरल के जमीयतुल उलेमा ने मुस्लिम महिला अधिनियम 2019 को असंवैधानिक बताते हुए याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को अमान्य करार कर दिया है तो इसे अपराध घोषित नहीं किया जाना चाहिए।

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Central Governments affidavit in Supreme Court said Triple Talaq law is providing justice to Muslim women
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

तीन तलाक कानून को लेकर दायर याचिका के जवाब में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर किया है। इसमें कहा गया है कि तीन तलाक कानून मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिला रहा है। साथ ही विवाहित मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का संरक्षण करता है।  खुद को सुन्नी विद्वानों का संघ बताने वाले केरल के जमीयतुल उलेमा ने मुस्लिम महिला अधिनियम 2019 को असंवैधानिक बताते हुए याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को अमान्य करार कर दिया है तो इसे अपराध घोषित नहीं किया जाना चाहिए। 

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इसे लेकर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने हलफनामा दायर किया है। सरकार ने कहा कि तीन तलाक की प्रथा मुस्लिम महिलाओं के लिए घातक और उनकी स्थिति को दयनीय बना देती है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2017 में इस प्रथा को अमान्य करार किए जाने को कुछ ही मुस्लिम समुदायों ने वैध माना है। इसके बाद भी तीन तलाक के मामले पूरी तरह नहीं रुके। सरकार ने कहा कि तीन तलाक की पीड़िताओं के पास पुलिस के पास जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। कानून में दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान न होने के चलते पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर पाती। इसलिए इस कानून में कड़े प्रावधानों की जरूरत है। 
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सरकार ने तर्क दिया कि 2019 अधिनियम विवाहित मुस्लिम महिलाओं को न्याय और समानता के बड़े संवैधानिक लक्ष्यों को सुनिश्चित करने में मदद करता है। उनके गैर-भेदभाव और सशक्तीकरण के मौलिक अधिकारों को संरक्षित करने में मदद करता है। सरकार ने हलफनामे में यह भी कहा गया है कि अभी कानून में अपने विवेक से तीन तलाक लेने वाली विवाहित महिलाओं की रक्षा के लिए प्रावधान किए गए हैं। जबकि कानून में कड़ी कार्रवाई के प्रावधान निहित किए जाने चाहिए।
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हलफनामे में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट संसद द्वारा पारित कानूनों की बुद्धिमत्ता पर विचार नहीं कर सकता। चह इस बात पर चर्चा नहीं कर सकता कि कानून क्या होना चाहिए। सरकार ने तर्क दिया कि देश के लोगों के लिए क्या अच्छा है और क्या नहीं यह तय करना विधानमंडल का काम है। उसे अपनी शक्तियों के अनुरूप काम करने की छूट दी जानी चाहिए। किस आचरण को अपराध माना जाएगा और क्या दंड लगाया जाएगा यह निर्धारण भी विधायिका करती है। 

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