संविधान में अलग झंडे का प्रावधान नहीं, कर्नाटक की मांग खारिज
कर्नाटक में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार की राज्य के लिए अलग झंडे की मांग को मंगलवार को केंद्र सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया है। केंद्र का कहना है कि संविधान में किसी भी राज्य के लिए अलग झंडे का कोई प्रावधान नहीं है।
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने राज्य के लिए एक अलग 'झंडा' तैयार करने की मांग की है। इसके लिए नौ सदस्यीय समिति का भी गठन किया गया है और इसे कानूनी तौर पर मान्यता देने के लिए एक रिपोर्ट भी जमा की गई, लेकिन केंद्र ने इसे गैर संवैधानिक करार दिया है।
वहीं मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने अपनी इस पहल का खुलकर बचाव किया। उन्होनें कहा कि कर्नाटक के आधिकारिक झंडे की मांग असंवैधानिक नहीं है। अपने कदम का बचाव करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा, 'कि क्या संविधान में ऐसा कोई प्रावधान है जो राज्य को अपना अलग झंडा रखने से रोके? क्या आपने संविधान में ऐसा कोई प्रावधान देखा है? क्या बीजेपी के लोगों को ऐसे किसी प्रावधान के बारे में पता है? तो वे यह मुद्दा क्यों उठा रहे हैं?'
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने संविधान में 'एक देश एक झंडा' के सिद्धांत के आधार पर स्पष्ट किया कि तिरंगा ही पूरे देश का ध्वज है। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने मंगलवार को कहा कि हम एक देश हैं और हमारा एक झंडा है। ऐसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है जो राज्यों के लिए अलग झंडे की अनुमति देता हो या ऐसा करने को प्रतिबंधित करता हो। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्नाटक का अपना एक झंडा है जो जनता का प्रतिनिधित्व करता है सरकार का नहीं। राज्य में तमाम बड़े जनआयोजनों में इस झंडे का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इस झंडे को स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस या अन्य सरकारी कार्यक्रमों में सरकार द्वारा नहीं फहराया जा सकता।
अगर राज्य के लिए अलग झण्डे की मंजूरी मिलती है तो कर्नाटक, जम्मू और कश्मीर के बाद आधिकारिक तौर पर खुद का 'झंडा' रखने वाला देश का दूसरा राज्य होगा जो संविधान की धारा 370 के तहत विशेष दर्जा हासिल करेगा । 2014 में, जाने माने कन्नड़ लेखक एवं एक अनुभवी पत्रकार और कन्नड़ कार्यकर्ता पाटिल पुटप्पा और समाजसेवी भीमप्पा गुंडप्पा ने कर्नाटक के लिए आधिकारिक झंडे की मांग की। पुटप्पा और गडपा ने अपने ज्ञापन में सरकार से अनुरोध किया था कि 'कन्नड़ नाडु ' के लिए एक अलग झंडा डिजाइन किया जाए और इसे कानूनी आधार दिया जाए।
सदानंद गौड़ा की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार ने कर्नाटक हाई कोर्ट को बताया कि जब साल 2012 में बीजेपी की सरकार थी तब उसने लाल और पीले कन्नड़ ध्वज को आधिकारिक राज्य 'ध्वज' घोषित करने के सुझावों को स्वीकार नहीं किया था, क्योंकि यह "देश की एकता और अखंडता" के खिलाफ होगी। कन्नड़ और संस्कृति मंत्री गोविंद एम करजोल ने कहा कि "फ्लैग कोड राज्यों के लिए झंडे की अनुमति नहीं देता है। हमारा राष्ट्रीय ध्वज हमारे राष्ट्र की अखंडता और संप्रभुता का प्रतीक है। वहीं कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री सदानंद गौड़ ने इस कदम को खारिज करते हुए कहा, "भारत एक राष्ट्र है और एक देश में दो झंडे नहीं हो सकते।
कर्नाटक के पूर्व वकील जनरल रवी वर्मा कुमार ने कहा, "संविधान अपने क्षेत्र में राज्यों को वर्चस्व प्रदान करता है और यहां तक कि सात न्यायाधीशों की सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इसे बरकरार रखा है। ध्वज कोड के इस मामले पर कोई प्रतिबंध नहीं है।" वहीं भाजपा सांसद शोभा करंदलाज ने कहा कि राज्य ध्वज की मांग कर सरकार राष्ट्र के खिलाफ जा रही है। तो जनता दल (सेकुलर) नेता एच डी कुमारस्वामी ने कहा कि राज्य ध्वज के लिए संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। उन्होंने कहा, "कांग्रेस सरकार इस मुद्दे का इस्तेमाल कुछ हालिया विवादों से ध्यान हटाने के लिए कर रही है।" मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि कर्नाटक में पहले से ही राज्य का एक आधिकारिक गीत है और राज्य का अलग झण्डा होने में कुछ भी गलत नहीं है।
केंद्रीय मंत्री एवं बीजेपी के वरिष्ठ नेता राजीव प्रताप रुडी ने कहा कि वह सिर्फ राष्ट्रीय ध्वज के बारे में जानते हैं और राज्य के लिए अलग झंडे की कर्नाटक सरकार की योजना को समझ नहीं पा रहे हैं। उन्होंने तिरुवनंतपुरम में पत्रकारों से कहा, 'मुझे नहीं पता कि इसका मतलब क्या है। हम एक ही संविधान और एक ही ध्वज पर सहमत हैं। मैं किसी और झंडे के बारे में नहीं जानता। देश किसी और झंडे के बारे में सोच भी नहीं सकता। इस कदम की निंदा करते हुए शिवसेना नेता संजय राउत ने कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। राउत ने दलील दी कि राज्य सरकार की मांग 'असंवैधानिक' और 'देश की अखंडता के खिलाफ' है।