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नए साल में दवा परीक्षण के नियमों में कई बड़े बदलाव कर सकती है केंद्र सरकार
Sun, 30 Dec 2018 05:23 AM IST
Gaurav Pandey
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
परीक्षित निर्भय, नई दिल्ली
Published by: Gaurav Pandey
Updated Sun, 30 Dec 2018 05:23 AM IST
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केंद्र सरकार नए साल में दवाओं के परीक्षण से जुड़े कानून में कई बड़े बदलाव कर सकती है। इसमें सबसे मुख्य बदलाव मुआवजे को लेकर है। इसके तहत फार्मा कंपनियों की तरफ से दिए जाने वाले तत्काल 60 फीसदी मुआवजा देने की शर्त को हटाया जा सकता है।
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मंत्रालय की तरफ से इस संबंध में आधिकारिक तौर पर जवाब नहीं दिया गया है लेकिन सूत्र बताते हैं कि जनवरी माह के अंत तक बदलावों को सार्वजनिक कर दिया जाएगा। किसी भी नई दवा के मानव शरीर पर अच्छे और बुरे प्रभावों के परीक्षण को क्लीनिकल ट्रायल कहा जाता है।
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केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को देश में बिना अनुमति के भी बड़ी संख्या में क्लीनिकल ट्रायल की शिकायतें मिलती रही हैं। पिछले साल क्लीनिकल ट्रायल से देश में 370 लोगों की मौत हुई थी। नीति आयोग ने क्लीनिकल ट्रायल को कारोबार का अवसर बताया था। आयोग ने इसकी प्रक्रिया को सरल बनाने की सलाह दी थी।
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कहा जा रहा है कि फार्मा कंपनियों के दबाव में इसमें ट्रायल पीड़ितों को 60 प्रतिशत अग्रिम मुआवजा देने की शर्त हटाई जा सकती है। इसके बाद भारत दुनिया भर के क्लीनिकल ट्रायल का डंपिंग ग्राउंड बन सकता है।
एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सरकार ने इसके लिए जो मसौदा तैयार किया था, उसके अनुसार ट्रायल के दौरान मरीज की मौत या दिव्यांगता होने पर कंपनी को 15 दिन के भीतर मुआवजे का 60 प्रतिशत हिस्सा देना तय किया गया था। जबकि मुआवजे की शेष बची 40 प्रतिशत रकम एथिक्स कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद देना था।
भारत में ट्रायल सफल होने पर ‘मेक इन इंडिया’ के तहत दवा को भारत में ही बनाने की शर्त रखी गई थी। नई दवा की भारत में बिक्री/ मार्केटिंग भी अनिवार्य की जानी थी। इस नियम के तहत सरकार पर भी क्लीनिकल ट्रायल के आवेदन को 45 दिन में मंजूर करने की शर्त रखी गई थी। अन्यथा इसे स्वत: ही मंजूर मान लिया जाना तय किया गया था।