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पहल: भोपाल जैसी गैस त्रासदी से बचने के लिए केंद्र की तैयारी, देश में बनेगा आपात निगरानी तंत्र; जानें सबकुछ

Wed, 05 Nov 2025 07:04 AM IST
शुभम कुमार परीक्षित निर्भय
परीक्षित निर्भय Published by: शुभम कुमार Updated Wed, 05 Nov 2025 07:04 AM IST
सार

केंद्र सरकार ने रासायनिक आपदाओं से निपटने के लिए राष्ट्रीय निगरानी तंत्र बनाने का फैसला किया है। हर जिले में रैपिड रिस्पांस टीम गठित होगी जो गैस रिसाव या केमिकल दुर्घटनाओं पर तत्काल कार्रवाई करेगी। एनसीडीसी और स्वास्थ्य मंत्रालय के दिशानिर्देशों के तहत अस्पतालों में विशेष यूनिट और रियल-टाइम रिपोर्टिंग सिस्टम तैयार किए जाएंगे।

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Center prepares to prevent a Bhopal-like gas tragedy emergency monitoring system to be established nationwide
भोपाल गैस त्रासदी (File Photo) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भोपाल गैस त्रासदी और विशाखापत्तनम जैसी घटनाओं से सबक लेते हुए केंद्र सरकार ने अब देश में केमिकल इमरजेंसी से निपटने के लिए राष्ट्रीय निगरानी तंत्र बनाने का फैसला लिया है। देश में पहली बार रासायनिक आपदाओं से जुड़ी स्वास्थ्य निगरानी और त्वरित कार्रवाई को संस्थागत रूप देने की दिशा में यह कदम ऐतिहासिक माना जा रहा है। इसके तहत हर जिले में रैपिड रिस्पांस टीम (आरआरटी) गठित की जाएगी, जो रासायनिक दुर्घटना, गैस रिसाव या जहरीले प्रदूषण जैसी घटनाओं पर तत्काल प्रतिक्रिया देगी और घायलों को प्राथमिक उपचार मुहैया कराएगी।

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यह फैसला नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) और स्वास्थ्य मंत्रालय के नए दिशानिर्देशों के आधार पर लिया है जिसमें साफ तौर पर कहा है कि रासायनिक आपात स्थितियों को लेकर देश के सार्वजनिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाना होगा। एनसीडीसी ने प्रस्ताव दिया है कि इन घटनाओं को भी इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (आईएचआईपी) से जोड़ा जाए, ताकि जहरीले रसायन या गैस रिसाव से प्रभावित मामलों की रियल-टाइम रिपोर्टिंग हो सके। इस नेटवर्क में अस्पतालों, प्रयोगशालाओं, जिला स्वास्थ्य कार्यालयों, दमकल विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को जोड़ा जाएगा।
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अस्पतालों में तैयार होंगे विशेष यूनिट
दिशानिर्देशों के अनुसार, अब हर जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज को अपनी रासायनिक आपदा प्रतिक्रिया योजना तैयार करनी होगी। इसमें परिशोधन क्षेत्र, आइसोलेशन वार्ड, केमिकल एक्सपोजर ट्रीटमेंट किट और प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ शामिल होंगे। अस्पतालों को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी मरीज बिना डिकॉन्टेमिनेशन के इमरजेंसी वार्ड में प्रवेश न करे। साथ ही, सुरक्षा डेटा शीट (एसडीएस) और एंटीडोट सूचियों को ध्यान रखना अनिवार्य है ताकि किसी भी रसायन रसायन के संपर्क में आने वाले रोगी का तुरंत सही इलाज किया जा सके।
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क्यों जरूरी है यह नेटवर्क
भारत में हर साल सैकड़ों औद्योगिक गैस लीक, केमिकल स्पिल और विषाक्तता के मामले दर्ज होते हैं। हाल के वर्षों में विशाखापत्तनम, गाजियाबाद, लुधियाना और भिवंडी जैसे शहरों में हुई घटनाओं ने दिखाया कि स्थानीय स्वास्थ्य तंत्र के पास त्वरित प्रतिक्रिया की कमी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नेटवर्क और रैपिड रिस्पांस सिस्टम के बनने से देश में रासायनिक आपदाओं से जुड़ी मौतों और बीमारियों में उल्लेखनीय कमी आएगी।


भारत में हर साल 200 से अधिक गैस रिसाव हादसे
वर्ष 2023 में केवल सात राज्यों से 100 से ज्यादा गंभीर एक्सपोजर केस रिपोर्ट हुए। nभोपाल गैस त्रासदी (1984) के बाद से अब तक देश में 40 से अधिक बड़े केमिकल हादसे हो चुके हैं। n2020–2023 के बीच देश में 800 से अधिक खतरनाक रासायनिक घटनाएं हुईं, जिनमें से औसत हर महीने 20 से अधिक घटनाएं रिपोर्ट की गईं। nराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, 60% औद्योगिक क्षेत्र उच्च-जोखिम श्रेणी में आते हैं।2023 में जारी डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देशों में रासायनिक जोखिमों से हर साल 20 लाख से अधिक लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित होते हैं।

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