सीबीआई विवाद पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट करेगा सुनवाई, वर्मा ने कार्रवाई को बताया गैरकानूनी
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सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच चल रही आंतरिक कलह और गड़बड़ी अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी आलोक वर्मा ने खुद को सीबीआई निदेशक पद से हटाकर अवकाश पर भेजे जाने को गैरकानूनी करार दिया है। वर्मा ने पद से हटाए जाने के चंद घंटों के अंदर सरकार के इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी, जहां चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने उनकी याचिका को शुक्रवार को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है।
वर्मा ने सरकार के निर्णय को सीबीआई की स्वायत्तता खत्म करने की साजिश बताया और साथ ही कई उच्च स्तरीय मामलों में जांच के दौरान सरकार के मनमाफिक लाइन नहीं पकड़ने के कारण की गई कार्रवाई की आशंका जाहिर की। वर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि आनन-फानन में लिया गया यह निर्णय कानून के खिलाफ है। साथ ही उस उच्चाधिकार समिति के आदेश को भी दरकिनार किया गया है, जिसने उन्हें नियुक्त किया था। 1979 बैच के आईपीएस अधिकारी वर्मा ने कहा है कि इस तरह की गैरकानूनी दखलंदाजी से अधिकारियों के मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
वर्मा के वकील गोपाल शंकर नारायण की तरफ से दाखिल याचिका बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ के सामने पेश की गई। चीफ जस्टिस गोगोई के अलावा जस्टिस एसके कौल व जस्टिस केएम जोसेफ की मौजूदगी वाली पीठ से वर्मा के वकील ने तत्काल सुनवाई की मांग की। वकील ने पीठ से कहा कि वर्मा को हटाने की जानकारी बुधवार सुबह छह बजे दी गई। इसके बाद ही पीठ ने शुक्रवार को सुनवाई करने का निर्णय लिया।
संविधान के अनुच्छेदों के उल्लंघन का मुद्दा उठाया
सीबीआई चीफ आलोक वर्मा ने अपनी याचिका में कहा कि जांच एजेंसी की स्वायत्तता आवश्यक है, क्योंकि कई मौकों पर उच्च स्तरीय लोगों के खिलाफ जांच करने के दौरान एजेंसी को सरकार के मनमाफिक नहीं आने वाला निर्णय करना पड़ता है। अपनी याचिका में वर्मा ने केंद्रीय सतर्कता आयोग व कार्मिक विभाग की तरफ से उन्हें पद से हटाकर संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को अंतरिम सीबीआई निदेशक बनाने को प्राकृतिक न्याय के खिलाफ बताया और इसे निरस्त करने की मांग की। वर्मा ने इस निर्णय को यह संविधान के अनुच्छेद-14, 19 और 21 का उल्लंघन भी बताया।
दो साल का होता है सीबीआई चीफ का कार्यकाल
वर्मा ने कहा है कि दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेबलिसमेंट एक्ट, 1946 के प्रावधानों के तहत सीबीआई निदेशक का दो वर्ष का निर्धारित कार्यकाल होता है। निदेशक की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के चीफ जस्टिस की मौजूदगी वाली उच्चाधिकार समिति करती है, लेकिन उनके तबादले के लिए इस समिति से सहमति नहीं ली गई।
अस्थाना को घेरने का प्रयास किया
याचिका में वर्मा ने राकेश अस्थाना को भी घेरने का प्रयास किया। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि अस्थाना के खिलाफ मामले लंबित होने और उनके विरोध के बावजूद अस्थाना को विशेष निदेशक के पद पर नियुक्त किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया है कि अस्थाना ने कुछ जांच में बाधाएं उत्पन्न की। इनमें से कई मामले संवेदनशील है। कुछ मामलों की तो सुप्रीम कोर्ट निगरानी भी कर रही है। सीबीआई निदेशक और अन्य सभी अधिकारी कुछ चुनिंदा कार्रवाई को लेकर एकमत रहते थे, लेकिन विशेष निदेशक राकेश अस्थाना का अलग नजरिया होता था।