फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   Caution Many health centres in 19 districts of seven states exposed no medicines and doctors in hospitals

Health Alert: सात राज्यों के 19 जिलों के कई स्वास्थ्य केंद्रों की खुली पोल, अस्पतालों में न दवाएं, न डॉक्टर

Mon, 02 Jun 2025 06:34 AM IST
शुभम कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शुभम कुमार Updated Mon, 02 Jun 2025 06:34 AM IST
सार

आईसीएमआर, डब्ल्यूएचओ और बीएचयू की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ग्रामीण सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में मधुमेह व उच्च रक्तचाप की दवाएं साल की शुरुआत में खत्म हो जाती हैं, जिससे मरीज बाकी महीनों में बिना दवा के रहते हैं। 7 राज्यों के 415 केंद्रों में हुआ यह चिंताजनक सर्वे।

विज्ञापन
Caution Many health centres in 19 districts of seven states exposed no medicines and doctors in hospitals
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

भारत में मधुमेह और उच्च रक्तचाप रोगियों की तेजी से बढ़ती संख्या के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्वास्थ्य केंद्र पर्याप्त दवाएं नहीं दे पा रहे हैं। इन गैर संचारी रोगों को लेकर ऐसा चिकित्सा प्रबंधन किया जा रहा है जिसमें ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर सालाना आने वाली दवाएं तीन से चार महीने में ही खत्म हो जाती हैं, और उसके बाद बाकी सात से आठ महीने तक अलमारी खाली रहती है।
विज्ञापन


यह खुलासा भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के एक संयुक्त सर्वे रिपोर्ट में हुआ है, जिसमें सात राज्यों के 19 जिलों में सरकारी और निजी स्वास्थ्य केंद्रों की मधुमेह व उच्च रक्तचाप प्रबंधन की सुविधाओं की जांच की गई। साल 2021 और 2023 में दो अलग अलग बार हुई इस जांच में टीम ने 415 स्वास्थ्य केंद्रों का एक सर्वे किया जिसमें 75.7% सरकारी और 24% निजी अस्पताल शामिल हैं।
विज्ञापन


इसमें प्रमुख रूप से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी), सब-सेंटर (एससी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज शामिल थे। जांच के दौरान सर्वे टीम ने 105 उप केंद्रों में से 37 (35.2%) में मेटफॉर्मिन (मधुमेह की दवा) और 47 (44.8%) में एम्लोडिपिन ( रक्तचाप की दवा) के खाली डिब्बे पाए। यहां मौजूदा स्वास्थ्य कर्मचारियों से पता चला कि औसतन सात महीने से अलमारियों में यह डिब्बे खाली पड़े हैं, क्योंकि जब यहां सालाना दवाएं आती हैं तो शुरुआती तीन से चार महीने में ये दवाएं खत्म हो जाती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


ये भी पढ़ें:- Sharmishta Panoli Case: 22 वर्षीय युवती के समर्थन में आया बार काउंसिल; तत्काल रिहाई और निष्पक्ष ट्रायल की मांग

जिला अस्पतालों में भरपूर दवाएं
इन ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों से संबंधित जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेजों में जब मधुमेह और उच्च रक्तचाप की दवाओं की जांच हुई तो वहां इनका पर्याप्त दवा भंडारण मिला लेकिन सरकारी सिस्टम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके जरिये यहां से इन दवाओं को वहां तक पहुंचाया जाए जहां जीवन-रक्षक दवाओं की कमी से हजारों मधुमेह और बीपी के मरीज बेहाल हैं।

उपकरण तो हैं, लेकिन उन्हें चलाने वाले तकनीशियन नहीं
अपनी सर्वे रिपोर्ट में शोधकर्ताओं ने कहा है कि चिकित्सक, स्टाफ और राष्ट्रीय गैर संचारी रोग नियंत्रण कार्यक्रम के दिशानिर्देशों से संबंधित तैयारियां अधिकतम 70% स्वास्थ्य केंद्रों में पाई गईं, जबकि इन केंद्रों पर चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता बेहतर है। इससे पता चलता है कि उपकरणों के मुकाबले दवाओं और मानव संसाधन की कमी गैर संचारी रोगों (एनसीडी) के उपचार में बाधा है। इसी तरह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी मिली, जो ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी रिपोर्ट 2020-21 से मेल खाती है। इसके अनुसार सीएचसी स्तर पर चिकित्सकों की 82.2% और सर्जन की 83.2% की कमी है।

ग्रामीण सेहत के सर्वे में क्या मिला?
मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी गैर संचारी बीमारियों को लेकर केंद्र सरकार राष्ट्रीय कार्यक्रम चला रही है। आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में इन बीमारियों की जांच, इलाज और दवा सुविधा भी दी जा रही है लेकिन शोधकर्ताओं ने सर्वे में पाया कि सबसे कम तैयारी उप केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर मिली जबकि इनसे थोड़ी बहुत अधिक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैयारी थी।


जांच टीम में दिल्ली से लेकर कर्नाटक के विशेषज्ञ :
इस सर्वेक्षण पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम ने एक अध्ययन भी किया है जो इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) में प्रकाशित हुआ। इस टीम में बंगलूरू स्थित आईसीएमआर के नेशनल सेंटर फॉर डिजीज इंफॉर्मेटिक्स एंड रिसर्च, एमएस रमैया मेडिकल कॉलेज, दिल्ली के आईएनसीएलईएन ट्रस्ट इंटरनेशनल के साथ साथ जोधपुर, भुवनेश्वर और रायपुर एम्स के सामुदायिक चिकित्सा विभाग के विशेषज्ञों ने सहयोग दिया है। इनके अलावा मैसूर के जेएसएस मेडिकल कॉलेज और कर्नाटक के सिद्धगंगा मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर भी टीम में शामिल थे।

सरकार को सौंपे सुझाव, तत्काल डिजिटल निगरानी करें
  • राज्य और जिला स्तर पर दवा वितरण तंत्र को पारदर्शी और अधिक प्रभावी बनाना जरूरी है।
  • ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में स्टॉकआउट रोकने के लिए डिजिटल ट्रैकिंग  और बेहतर प्रबंधन आवश्यक है।
  • स्वास्थ्य सेवाओं की विश्वसनीयता बढ़ाने के लिए स्थायी फंडिंग और निगरानी भी जरूरी है।
  • इनके अलावा समुदाय को बीमारी की जागरूकता और नियमित जांच के लिए प्रेरित करना भी अहम होगा।
  • इंडिया हाइपरटेंशन कंट्रोल इनिशिएटिव (आईएचसीआई)   जैसे मॉडल को अपनाकर दवा सप्लाई और फॉलो-  अप की विश्वसनीयता बढ़ाई जा सकती है।

ये भी पढ़ें:- IPL 2025: कोलकाता से मेजबानी छीनकर गुजरात को देने पर भड़की पश्चिम बंगाल सरकार, सियासत करने का लगाया आरोप

सात राज्य के इन जिलों में हुई जांच
हरियाणा (फरीदाबाद, भिवानी), कर्नाटक (बैंगलोर शहरी, तुमकुर, मैसूर), राजस्थान (जोधपुर, अजमेर और अलवर), मेघालय (पूर्वी खासी हिल्स, पश्चिम गारो हिल्स ), ओडिशा (मयूरभंज, पुरी, नयागढ़, अंजुम), मध्य प्रदेश (सीहोर, विदिशा, अनूपपुर), छत्तीसगढ़ (दुर्ग, कांकेर)
 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed