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Census 2027: गिनती का गणित, जातियों के आंकड़े तय करेंगे सत्ता का भविष्य; बदल जाएंगे सियासत के समीकरण
Wed, 01 Apr 2026 06:37 AM IST
Devesh Tripathi
अजीत खरे
अजीत खरे
Published by: Devesh Tripathi
Updated Wed, 01 Apr 2026 06:37 AM IST
सार
अभी तक देश में राजनीति पुराने अनुमानों पर चल रही है लेकिन नई जनगणना में जातियों और उपजातियों की सही संख्या सामने आ सकती है। इससे यह नारा और मजबूत होगा कि जिसकी जितनी आबादी है उसे उतना ही हिस्सा मिले। सबसे बड़ा सवाल आरक्षण की सीमा को लेकर उठेगा।
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जातिगत जनगणना
- फोटो : ANI
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विस्तार
जाति न पूछो साधु की..। यह पुरानी कहावत भले ही ज्ञान को बड़ा बताती हो, लेकिन आज की राजनीति में जाति और संख्या का गणित ही सबसे बड़ा सच बन गया है।
देश में होने वाली अगली जनगणना अब सिर्फ लोगों की गिनती नहीं रह गई है। यह तय करने वाली है कि किसे कितनी सुख-सुविधाएं मिलेंगी और सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी। भारत में जातियों के आधार पर आंकड़ों की राजनीति बहुत पुरानी है। आखिरी बार 1931 में जातियों की विस्तार से गिनती हुई थी। आजादी के बाद की सरकारों ने जाति आधारित गिनती से दूरी बनाए रखी लेकिन राजनीति हमेशा इसी के इर्द-गिर्द घूमती रही। आज भी हमारे देश की ज्यादातर योजनाएं और आरक्षण के नियम उसी 90 साल पुराने अनुमान पर टिके हैं।
मंडल आयोग का असर
1979 में जब मंडल आयोग बना तो उसने भी 1931 के पुराने आंकड़ों को ही आधार बनाया था। इसके बाद 1990 के दशक में जब पिछड़ों को हक देने की बात आई तो देश की राजनीति पूरी तरह बदल गई। तब से ही पिछड़ा वर्ग राजनीति के केंद्र में आ गया। राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं का यह मानना था कि जिसकी जितनी संख्या है उसे उतना ही हक मिलना चाहिए। आज यही मांग फिर से जोर पकड़ रही है।
बिहार का सर्वे व नई मांग
जातिगत जनगणना की बहस तब और तेज हो गई जब बिहार सरकार ने अपने राज्य में जाति सर्वे कराया। इस सर्वे ने साफ कर दिया कि पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग की आबादी बहुत बड़ी है। इसके बाद दूसरे राज्यों और विपक्षी दलों ने भी ऐसी ही गिनती की मांग तेज कर दी है। अब उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी पिछड़ों और दलितों को एकजुट करने की कोशिशें इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
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आरक्षण और आबादी का गणित
अभी तक देश में राजनीति पुराने अनुमानों पर चल रही है लेकिन नई जनगणना में जातियों और उपजातियों की सही संख्या सामने आ सकती है। इससे यह नारा और मजबूत होगा कि जिसकी जितनी आबादी है उसे उतना ही हिस्सा मिले। सबसे बड़ा सवाल आरक्षण की सीमा को लेकर उठेगा। अभी सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की सीमा तय कर रखी है लेकिन नए आंकड़े आने पर इस सीमा को बढ़ाने की मांग उठना तय है।
रास्ते की मुश्किलें
जातिगत जनगणना कराना आसान काम नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर कोई अपनी जाति बताता है तो उसकी जांच कैसे होगी। कई बार एक ही जाति एक राज्य में सामान्य मानी जाती है तो दूसरे राज्य में उसे पिछड़ा माना जाता है। इसके अलावा उपजातियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि उनके नाम और पहचान को सही-सही दर्ज करना बहुत पेचीदा काम है।
क्या बदल जाएंगे सियासत के समीकरण?
साफ है कि आने वाली जनगणना सिर्फ एक सरकारी प्रक्रिया नहीं है। यह देश की राजनीति और समाज की बनावट को नए सिरे से तय कर सकती है। अब देखना यह होगा कि क्या ये नए आंकड़े भारत की सत्ता के समीकरणों को हमेशा के लिए बदल देंगे।
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देश में होने वाली अगली जनगणना अब सिर्फ लोगों की गिनती नहीं रह गई है। यह तय करने वाली है कि किसे कितनी सुख-सुविधाएं मिलेंगी और सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी। भारत में जातियों के आधार पर आंकड़ों की राजनीति बहुत पुरानी है। आखिरी बार 1931 में जातियों की विस्तार से गिनती हुई थी। आजादी के बाद की सरकारों ने जाति आधारित गिनती से दूरी बनाए रखी लेकिन राजनीति हमेशा इसी के इर्द-गिर्द घूमती रही। आज भी हमारे देश की ज्यादातर योजनाएं और आरक्षण के नियम उसी 90 साल पुराने अनुमान पर टिके हैं।
मंडल आयोग का असर
1979 में जब मंडल आयोग बना तो उसने भी 1931 के पुराने आंकड़ों को ही आधार बनाया था। इसके बाद 1990 के दशक में जब पिछड़ों को हक देने की बात आई तो देश की राजनीति पूरी तरह बदल गई। तब से ही पिछड़ा वर्ग राजनीति के केंद्र में आ गया। राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं का यह मानना था कि जिसकी जितनी संख्या है उसे उतना ही हक मिलना चाहिए। आज यही मांग फिर से जोर पकड़ रही है।
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बिहार का सर्वे व नई मांग
जातिगत जनगणना की बहस तब और तेज हो गई जब बिहार सरकार ने अपने राज्य में जाति सर्वे कराया। इस सर्वे ने साफ कर दिया कि पिछड़ा और अति-पिछड़ा वर्ग की आबादी बहुत बड़ी है। इसके बाद दूसरे राज्यों और विपक्षी दलों ने भी ऐसी ही गिनती की मांग तेज कर दी है। अब उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी पिछड़ों और दलितों को एकजुट करने की कोशिशें इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
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आरक्षण और आबादी का गणित
अभी तक देश में राजनीति पुराने अनुमानों पर चल रही है लेकिन नई जनगणना में जातियों और उपजातियों की सही संख्या सामने आ सकती है। इससे यह नारा और मजबूत होगा कि जिसकी जितनी आबादी है उसे उतना ही हिस्सा मिले। सबसे बड़ा सवाल आरक्षण की सीमा को लेकर उठेगा। अभी सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए 50 प्रतिशत की सीमा तय कर रखी है लेकिन नए आंकड़े आने पर इस सीमा को बढ़ाने की मांग उठना तय है।
रास्ते की मुश्किलें
जातिगत जनगणना कराना आसान काम नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर कोई अपनी जाति बताता है तो उसकी जांच कैसे होगी। कई बार एक ही जाति एक राज्य में सामान्य मानी जाती है तो दूसरे राज्य में उसे पिछड़ा माना जाता है। इसके अलावा उपजातियों की संख्या इतनी ज्यादा है कि उनके नाम और पहचान को सही-सही दर्ज करना बहुत पेचीदा काम है।
क्या बदल जाएंगे सियासत के समीकरण?
साफ है कि आने वाली जनगणना सिर्फ एक सरकारी प्रक्रिया नहीं है। यह देश की राजनीति और समाज की बनावट को नए सिरे से तय कर सकती है। अब देखना यह होगा कि क्या ये नए आंकड़े भारत की सत्ता के समीकरणों को हमेशा के लिए बदल देंगे।
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