Lok Sabha Polls: क्या 'कच्चातिवु' लोकसभा चुनाव में बन सकता है मुद्दा? मछुआरों ने कह दी इस मामले में बड़ी बात
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
जिस कच्चातिवु द्वीप की तमिलनाडु से लेकर दिल्ली के सियासी गलियारों में चर्चाएं हो रही हैं, उसे लेकर अब तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि पुडुचेरी के भी मछुआरे इस मैदान में कूद पड़े हैं। दरअसल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के मछुआरे समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोग केंद्र सरकार से एक अलग मांग कर रहे हैं। इस समुदाय के लोगों का कहना है कि श्रीलंका की सरकार ने उनके समुदाय के कई लोगों को समुद्री सीमा के चलते गिरफ्तार कर लिया है। जब तक इन लोगों को रिहा नहीं किया जाएगा, तब तक उनका प्रदर्शन भी जारी रहेगा। अमर उजाला डॉट कॉम से फोन पर हुई बातचीत में मछुआरा समुदाय की मांगों के साथ सियासत को जोड़ा है। मछुआरा महासंघ के लोगों का कहना है कि श्रीलंका की नौसेना उनके मछुआरों को बेवजह परेशान करती है। महासंघ ने केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग भी की।
दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दिन कच्चातिवु द्वीप का जिक्र किया उसके बाद से सियासत गर्म हो गई। दक्षिण भारत में मछुआरा संघ के नेता एंटोनी सेबेस्टियन कहते ने कहा की जिस द्वीप को लेकर इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है वह सियासी मुद्दा तो हो सकता है। लेकिन इससे मछुआरा समुदाय को कोई विशेष फायदा नहीं होने वाला। सेबेस्टियन कहते हैं श्रीलंका लगतार उनके मछुआरों को न सिर्फ पकड़ता रहता है। बल्कि उनकी महंगी से महंगी नावों को भी जप्त कर लेता है। मछुआरा महासंघ का कहना है कि इसको लेकर न सिर्फ राज्य सरकारों बल्कि केंद्र सरकार को भी इस बाबत अवगत कराया है।
दरअसल, इलाके के मछुआरों की लगातार श्रीलंका सरकार से शिकायत बनी रहती है। तमिलनाडु के मछुआरा समुदाय से ताल्लुक रखने वाले उनके नेता वी. राजा कहते हैं कि समस्या सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं बल्कि उस पूरे समुद्री इलाके में है जो श्रीलंका की समुद्री सीमा के संपर्क में आता है। उनका कहना है कि पुडुचेरीमें भी हाल के दिनों में कुछ मछुआरों को श्रीलंका की नेवी ने हिरासत में ले लिया। इसको लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन चल रहा है। जबकि गुरुवार को बड़े स्तर पर पुडुचेरी और तमिलनाडु के लोग मछुआरों की मांगों को लेकर बंदी का आवाहन कर चुके हैं। राजा कहते हैं कि जिस द्वीप को लेकर इस वक्त सबसे ज्यादा सियासत गर्म है वह राजनीतिक तौर पर तो मुद्दा हो सकता है। लेकिन स्थानीय स्तर पर इसको लेकर बहुत कुछ सरगर्मी नहीं देखी जा रही है।
वी. राजा का तर्क है कि उनके समुदाय के लोग जब मछली पकड़ने के लिए समुद्र के भीतर जाते हैं तो श्रीलंका की नौसेना उनको आगे जाने पर हिरासत में ले लेती है, जबकि कई दफा देखा यह गया है कि हमारे मछुआरे भारतीय सीमा में ही होते हैं। उनका कहना है कि कच्चातिवु द्वीप वाले इलाके के अलावा भी बहुत सारे ऐसे इलाके हैं जहां पर भारतीय सीमा होने के बाद भी श्रीलंका की नेवी उनको पकड़ लेती है या कई बार भूल बस समुद्री लहरों के साथ उनके मछुआरे श्रीलंका की सीमा में चले जाते हैं।
उनका कहना है कि राजनीतिक दबाव पड़ने पर उनको छोड़ तो जाता है लेकिन इससे उनके व्यापार पर और मछुआरों में डर बना रहता है। वह कहते हैं कि यह समस्या छोटी नहीं है। कच्चातिवु द्वीप को सौंपे जाने के मामले पर 50 साल पुराने विवाद में नहीं पड़ना चाहते। उनकी तो यही मांग है कि मछुआरा समुदाय के लोगों पर श्रीलंकाई नौसेना की ओर से समुद्र में की जाने वाली ज्यादतियों पर अंकुश लगाया जाए।
वहीं, इस पूरे मामले मे डीएमके के सचिव आरएस भारती केंद्र सरकार पर हमलावर होते हुए कहते हैं कि वास्तव में अगर इस द्वीप को लेकर उनकी मंशा स्पष्ट थी तो 10 सालों में वह क्या करते रहे। वह कहते हैं कि अभी भी स्थानीय स्तर पर मछुआरों को तमाम तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसमें कई मामले ऐसे हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार के हस्तक्षेप के बगैर नहीं सुलझाए जा सकते।
डीएमके के नेता का कहना है कि कच्चातिवु को श्रीलंका को देने के खिलाफ रही थी। इसको लेकर प्रदेश स्तर पर बड़े आंदोलन भी किए गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से उठाए गए इस मामले पर पार्टी का कहना है कि चुनाव नजदीक आते ही भारतीय जनता पार्टी इसको सियासी तौर उठा रही है। अगर वास्तविकता में केंद्र सरकार इसको लेकर सीरियस होती तो बीते 10 साल में इस दिशा में कुछ बड़े कदम तो उठाए ही गए होते।