भारत वाकई में कैशलेस इकोनॉमी बन सकता है?
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आठ नवंबर की शाम जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हजार और पांच सौ के नोट बंद करने की घोषणा कर रहे थे तब उसी समय मुंबई में सड़क किनारे सब्जी बेचने वाले विशाल गुप्ता अपनी दुकान बंद करने की तैयारी कर रहे थे। प्रधानमंत्री के ऐलान के बाद सड़कों पर लोग निकल आए थे। एटीएम के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लग गईं और लोग दुकानों की ओर जरूरत का सामान खरीदने के लिए भागने लगे।
विशाल गुप्ता बताते हैं, "बीस मिनट में दुकान की सारी सब्जी बिक गई। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था।" लेकिन उस दिन के बाद से उनकी कमाई लगभग बंद हो गई। कुछ ही ग्राहक दिन भर में उनकी दुकान पर आ पाते थे। ग्राहक आते भी थे तो उनके पास खुले पैसे नहीं होते थे सब्जी खरीदने के लिए। अगले पांच दिनों तक ऐसा ही चलता रहा।
ग्राहक नहीं मिलने की वजह से उनके दुकान की सब्जियां खराब हो गई और उन्हें करीब दस हजार का नुकसान उठाना पड़ा। भारत की अर्थव्यवस्था में 86 फीसदी कैश हजार और पांच सौ के नोट के रूप में है। विशाल गुप्ता ने आमदनी का कोई जरिया ना देखते हुए मजबूर होकर पेटीएम का सहारा लिया ताकि कुछ पैसे वो कमा सकें। उन्होंने पेटीएम के बारे में अपने कुछ दोस्तों से सुन रखा था।
अब उनका कहना है, "हालात थोड़े बेहतर हुए हैं। मुझे दिनभर में अब चार या पांच ग्राहक ऐसे मिल जाते हैं जो पेटीएम से पैसे देते हैं।" विशाल गुप्ता की तरह ही कई और छोटे व्यापारी भी अब मोबाइल और कार्ड का सहारा ले रहे हैं। सरकार के इस फैसले से सबसे ज्यादा फायदा पेटीएम जैसी कंपनियों को ही मिला है। मोबाइल से भुगतान करने के मामले में पेटीएम भारत की सबसे बड़ी कंपनी है।
पेटीएम का कहना है कि उसके व्यवसायिक लेन-देन में सात सौ फीसदी का इजाफा हुआ है और हर दिन होने वाला लेन-देन पचास लाख तक पहुंच चुका है। पेटीएम का यह भी दावा है कि एप डाउनलोड करने वालों की संख्या में तीन सौ फीसदी का इजाफा हुआ है। फिलहाल पेटीएम के जरिए 85,000 व्यापारी जुड़़े हुए हैं लेकिन कंपनी का लक्ष्य है कि मार्च 2017 तक पचास लाख व्यापारी उससे जुड़ जाएं। पेटीएम का चीन की बड़ी ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के साथ समझौता है।
लोग नकद में ही लेन-देन करना पसंद करते हैं
पेटीएम के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट किरण वासीरेड्डी ने बीबीसी को बताया, "इस घोषणा के बाद से हमारे व्यवसाय में अहम बढ़ोत्तरी हुई है। हम छोटे शहरों और कस्बों में अपने दफ्तर खोल रहे हैं ताकि अपना व्यवसाय बढ़ा पाए।" मोबीक्विक और फ्रीचार्ज जैसी मोबाइल सेवाओं के ग्राहकों में भी इजाफा हुआ है। लेकिन ये सिर्फ़ मोबाइल एप कंपनियां ही नहीं हैं जो ग्राहकों को लुभाने में लगे हुए हैं।
बल्कि बड़े पैमाने पर भारतीय बैंक भी लोगों को कैश-लेस लेन-देन के लिए ऑनलाइन बैंकिंग और मोबाइल सेवाओं की मदद लेने को कह रहे हैं। इस फैसले के तुरंत बाद पेटीएम ने अख़बारों में पूरे पन्ने का इश्तेहार दिया था और प्रधानमंत्री को बधाई दी थी। इश्तेहार में इसे एक ऐतिहासिक फैसला बताया गया था।
स्मार्टफोन के लिहाज से चीन के बाद भारत दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। इसके साथ ही इंटरनेट यूजर्स की संख्या में भी इजाफा हुआ है। मीडिया प्लेयर को जंप करेंमीडिया प्लेयर की मददमीडिया प्लेयर से बाहर आ गया है। वापस जाने के लिए एंटर दबाएं या जारी रखने के लिए टैब।
क्या हैं कैशलेस इकोनॉमी की चुनौतियां?
फिलहाल देश में 40 करोड़ से भी ज्यादा इंटरनेट यूजर्स हैं और उम्मीद है कि 2020 तक यह संख्या 70 करोड़ तक पहुंच जाएगी। लेकिन इसके बावजूद अभी भी देश में ऑनलाइन और मोबाइल सेवा से खरीददारी करने वालों की संख्या देश की सवा अरब आबादी की तुलना में बहुत कम है। भारत को अभी कैश-लेस अर्थव्यवस्था बनने के लिए लंबा सफर तय करना बाकी है।
ज्यादातर लोग यहां नकद में ही लेन-देन करना पसंद करते हैं। इस मानसिकता को बदलने में अभी लंबा समय लगेगा और कोशिशें भी बड़े पैमाने पर करनी होगी।
आधी से ज्यादा आबादी देहाती इलाकों में रहती है
भारत की आधी से ज्यादा आबादी देहाती इलाकों में रहती है। इन इलाकों में मोबाइल कवरेज मिलना अभी भी एक मसला है और यह कैश-लेस इंडिया की चुनौती को और बढ़ाने वाला है। भारत में पिछले दो सालों के अंदर लाखों बैंक अकाउंट खोले गए हैं लेकिन अभी भी लाखों लोग ऐसे है जिनके पास कोई खाता नहीं है।
देश में अभी भी 65 करोड़ के पास डेबिट कार्ड है और ढाई करोड़ के पास क्रेडिट कार्ड है। डेबिट कार्ड की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है लेकिन ज्यादातर लोग इसका इस्तेमाल सिर्फ एटीएम से पैसे निकालने के लिए ही करते हैं। वे अब भी इसका इस्तेमाल लेन-देन में भुगतान करने के लिए नहीं करते हैं।
प्राइस वाटर हाउस कूपर्स इंडिया के आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ विवेक बेलगावी बताते हैं, "छोटे-छोटे काम धंधे करने वालों को डेबिट और क्रेडिट कार्ड स्वीकार करने वाले मशीन लेने की बड़े पैमाने पर जरूरत है। इनमें से ज्यादातर व्यवसायी नकद में ही लेन-देन करना चाहते हैं।"
शहरों में जहां धीरे-धीरे व्यापारी वर्ग कैश-लेस विकल्प की ओर बढ़ रहा है वहीं कस्बों और गांवों में अभी भी इसे लेकर कोई खास उत्साह नहीं देखने को मिल रहा है। अभी भी बहुत से भारतीयों के दिमाग में यह सोच बैठी हुई है कि इंटरनेट और मोबाइल से लेन-देन करना सुरक्षित नहीं है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि हालात समान्य होने के बाद वैसे ग्राहक जो हाल के दिनों में कैश-लेस भुगतान करने की ओर बढ़ चुके हैं, उन्हें वापस बाजार में खींच लाना एक अहम काम होगा। एक ऐसे देश में जहां "आज नकद और कल उधार" जैसे मुहावरे चलते हो कैश-लेस अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करना आसान काम नहीं होगा।