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VC Reappointment Case: सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, वीसी की नियुक्ति रद्द
Tue, 11 Oct 2022 11:05 PM IST
Amit Mandal
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Amit Mandal
Updated Tue, 11 Oct 2022 11:05 PM IST
सार
शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय का इस निष्कर्ष पर पहुंचना उचित था कि कठिनाइयों को दूर करने की आड़ में राज्य योजना और अधिनियम के आवश्यक प्रावधानों को नहीं बदल सकता है।
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सुफ्रीम कोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : ANI
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में सोनाली चक्रवर्ती बनर्जी की पुनर्नियुक्ति को रद्द कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार ने चांसलर की शक्ति को हथियाने के लिए कानून के तहत एक गलत रास्ता चुना है जो राज्य का राज्यपाल है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली की पीठ ने तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व वाली राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए कहा कि हम मानते हैं कि उच्च न्यायालय का फैसला कानून और वास्तव में सही है और अपील में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। राज्य सरकार वीसी की फिर से नियुक्ति का आदेश जारी नहीं कर सकती है।
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शीर्ष अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय का इस निष्कर्ष पर पहुंचना उचित था कि कठिनाइयों को दूर करने की आड़ में राज्य योजना और अधिनियम के आवश्यक प्रावधानों को नहीं बदल सकता है। पीठ ने कहा कि बनर्जी की नियुक्ति पर कुलाधिपति के गैर-सहमत दृष्टिकोण मानते हुए राज्य सरकार ने 1979 के कलकत्ता विश्वविद्यालय अधिनियम की धारा 60 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने का दावा करके स्थिति को हल करने का प्रयास किया।
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अदालत ने कहा, राज्य सरकार ने नियुक्ति करने के लिए कुलाधिपति की शक्ति को हथियाने के लिए कठिनाई दूर करने वाले खंड का दुरुपयोग करके धारा 60 के तहत गलत रास्ता चुना। कोई सरकार बाधाओं को दूर करने के लिए कठिनाई को दूर करने वाले खंड का दुरुपयोग नहीं कर सकती है। पश्चिम बंगाल के तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ के पद पर रहने के दौरान राज्य के विश्वविद्यालयों के संचालन सहित कई मुद्दों पर वीसी की फिर से नियुक्ति हुई थी।
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शीर्ष अदालत ने कहा कि इस तरह की कार्रवाइयों को अनुमति देना कानून के शासन के खिलाफ होगा। पीठ ने कहा कि यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि एक ऐसी स्थिति के बनने से बचने के लिए कानून लागू होना चाहिए जिसे कुछ प्रावधान या शर्तें अर्थहीन या बेमानी हो जाती हों। पीठ ने कुलपति की पुनर्नियुक्ति के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि न तो कोई स्पष्ट प्रावधान है और न ही कोई आवश्यक मंशा है जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि उप-कुलपति को नियुक्त करने के लिए जो शक्ति कुलपति को सौंपी गई है, उसे छीन लिया गया है।