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बंगाल: रेत माफिया तुलु मंडल को बड़ा झटका, गिरफ्तारी वारंट के खिलाफ याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज; की अहम टिप्पणी
Tue, 22 Sep 2026 03:36 PM IST
देवेश त्रिपाठी
पीटीआई, कोलकाता
पीटीआई, कोलकाता
Published by: देवेश त्रिपाठी
Updated Tue, 22 Sep 2026 03:36 PM IST
सार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने मोहम्मद नजीबुद्दीन मंडल उर्फ तुलु मंडल की गिरफ्तारी वारंट के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। मामला बीरभूम में एक कथित सहयोगी के घर से 28.53 करोड़ रुपये से अधिक नकदी और पांच किलोग्राम सोना मिलने से जुड़ा है। मंडल के वकील ने एफआईआर दर्ज होने के दिन गैर-जमानती वारंट जारी किए जाने पर सवाल उठाया था।
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कलकत्ता हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
विस्तार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने कथित अवैध बालू और पत्थर कारोबारी मोहम्मद नजीबुद्दीन मंडल उर्फ तुलु मंडल की गिरफ्तारी वारंट के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका मंगलवार को खारिज कर दी। मंडल ने निचली अदालत की ओर से जारी गिरफ्तारी वारंट और उसे फरार घोषित करने संबंधी आदेश को चुनौती दी थी।
मंडल के कथित सहयोगी के बीरभूम जिले के मोहम्मद बाजार स्थित आवास से पुलिस ने पांच किलोग्राम सोने की छड़ें और 28.53 करोड़ रुपये से अधिक नकद बरामद किए थे। नकदी और सोने की कुल कीमत करीब 50 करोड़ रुपये बताई गई है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा?
याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि मंडल 23 मई को भारत छोड़ चुका था। ऐसे में निचली अदालत के आदेशों में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। पुलिस की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में कहा गया कि मंडल के कथित सहयोगी और रिश्तेदार के आवास से 28.53 करोड़ रुपये से अधिक नकद और 5 किलोग्राम सोने की छड़ें बरामद की गईं। इसके बाद बड़ी संख्या में भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज भी मिले, जिनसे संगठित अपराध किए जाने का पता चला।
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रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाद की जांच में अलग-अलग बैंक खातों में बड़ी रकम होने का पता चला। मंडल के वकील सिद्धार्थ दवे ने 30 जुलाई को जारी गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट और 10 अगस्त को जारी फरार घोषित करने संबंधी आदेश के खिलाफ दलीलें दीं। 10 अगस्त के आदेश में मंडल को 14 सितंबर को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होने को कहा गया था।
तुलु मंडल के वकील ने दी क्या दलील?
दोनों आदेश बीरभूम जिले के मोहम्मद बाजार थाने में 30 जुलाई को दर्ज आपराधिक मामले के संबंध में सूरी की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने जारी किए थे। मंडल के वकील ने दलील दी कि एफआईआर दर्ज होने के उसी दिन उसके खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधानों के खिलाफ था।
अदालत ने कहा कि मंडल 23 मई को ही देश छोड़ चुका था, जबकि उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई 30 जुलाई को शुरू हुई। न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि बीएनएसएस के प्रावधानों के तहत गैर-जमानती अपराध के आरोपी और गिरफ्तारी से बच रहे व्यक्ति के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है।
क्या गिरफ्तारी वारंट जारी करने में हुई गलती?
याचिकाकर्ता के वकील ने सवाल उठाया कि एफआईआर दर्ज होने के दिन ही वारंट जारी होने के बावजूद यह कैसे माना गया कि मंडल गिरफ्तारी से बच रहा था। इस पर न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि यह दलील महत्वहीन हो जाती है क्योंकि यह स्वीकार किया गया तथ्य है कि मंडल 23 मई को देश छोड़ चुका था।
न्यायमूर्ति ने कहा, "अगर याचिकाकर्ता देश में होता, तो गिरफ्तारी वारंट जारी करने से पहले एक निश्चित प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होता।" अदालत ने कहा कि मंडल के देश छोड़ने के कारण कोर्ट की ओर से गिरफ्तारी वारंट जारी करने में कोई खामी नहीं है। न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि यह कदम जांच को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया था।
एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका भी हो चुकी है खारिज
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने मंडल की गिरफ्तारी वारंट और उसके बाद जारी फरार घोषित करने के आदेश के खिलाफ दायर याचिका का विरोध किया। उन्होंने दावा किया कि मंडल फरार है और उस पर संगठित अपराध सिंडिकेट चलाने का आरोप है। इससे पहले 20 अगस्त को भी हाईकोर्ट ने मंडल की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने नकदी और सोने की बरामदगी से जुड़े मामले में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बरामदगी के बाद मंडल को "सैंड माफिया" बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि वह बीरभूम जिले में पत्थर खदानों के कारोबार से भी कथित तौर पर जुड़ा है। अधिकारी ने कहा था, "सतर्कता और बिना समझौते के कार्रवाई जारी रहेगी और माफिया सिंडिकेट पर कार्रवाई चलती रहेगी।"
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मंडल के कथित सहयोगी के बीरभूम जिले के मोहम्मद बाजार स्थित आवास से पुलिस ने पांच किलोग्राम सोने की छड़ें और 28.53 करोड़ रुपये से अधिक नकद बरामद किए थे। नकदी और सोने की कुल कीमत करीब 50 करोड़ रुपये बताई गई है।
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए क्या कहा?
याचिका खारिज करते हुए न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि मंडल 23 मई को भारत छोड़ चुका था। ऐसे में निचली अदालत के आदेशों में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। पुलिस की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में कहा गया कि मंडल के कथित सहयोगी और रिश्तेदार के आवास से 28.53 करोड़ रुपये से अधिक नकद और 5 किलोग्राम सोने की छड़ें बरामद की गईं। इसके बाद बड़ी संख्या में भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज भी मिले, जिनसे संगठित अपराध किए जाने का पता चला।
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रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि बाद की जांच में अलग-अलग बैंक खातों में बड़ी रकम होने का पता चला। मंडल के वकील सिद्धार्थ दवे ने 30 जुलाई को जारी गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट और 10 अगस्त को जारी फरार घोषित करने संबंधी आदेश के खिलाफ दलीलें दीं। 10 अगस्त के आदेश में मंडल को 14 सितंबर को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होने को कहा गया था।
तुलु मंडल के वकील ने दी क्या दलील?
दोनों आदेश बीरभूम जिले के मोहम्मद बाजार थाने में 30 जुलाई को दर्ज आपराधिक मामले के संबंध में सूरी की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने जारी किए थे। मंडल के वकील ने दलील दी कि एफआईआर दर्ज होने के उसी दिन उसके खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी करना भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) के प्रावधानों के खिलाफ था।
अदालत ने कहा कि मंडल 23 मई को ही देश छोड़ चुका था, जबकि उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई 30 जुलाई को शुरू हुई। न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि बीएनएसएस के प्रावधानों के तहत गैर-जमानती अपराध के आरोपी और गिरफ्तारी से बच रहे व्यक्ति के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है।
क्या गिरफ्तारी वारंट जारी करने में हुई गलती?
याचिकाकर्ता के वकील ने सवाल उठाया कि एफआईआर दर्ज होने के दिन ही वारंट जारी होने के बावजूद यह कैसे माना गया कि मंडल गिरफ्तारी से बच रहा था। इस पर न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि यह दलील महत्वहीन हो जाती है क्योंकि यह स्वीकार किया गया तथ्य है कि मंडल 23 मई को देश छोड़ चुका था।
न्यायमूर्ति ने कहा, "अगर याचिकाकर्ता देश में होता, तो गिरफ्तारी वारंट जारी करने से पहले एक निश्चित प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होता।" अदालत ने कहा कि मंडल के देश छोड़ने के कारण कोर्ट की ओर से गिरफ्तारी वारंट जारी करने में कोई खामी नहीं है। न्यायमूर्ति भट्टाचार्य ने कहा कि यह कदम जांच को आगे बढ़ाने के लिए उठाया गया था।
एफआईआर रद्द करने की मांग वाली याचिका भी हो चुकी है खारिज
राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता बिल्वदल भट्टाचार्य ने मंडल की गिरफ्तारी वारंट और उसके बाद जारी फरार घोषित करने के आदेश के खिलाफ दायर याचिका का विरोध किया। उन्होंने दावा किया कि मंडल फरार है और उस पर संगठित अपराध सिंडिकेट चलाने का आरोप है। इससे पहले 20 अगस्त को भी हाईकोर्ट ने मंडल की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें उसने नकदी और सोने की बरामदगी से जुड़े मामले में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी।
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बरामदगी के बाद मंडल को "सैंड माफिया" बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि वह बीरभूम जिले में पत्थर खदानों के कारोबार से भी कथित तौर पर जुड़ा है। अधिकारी ने कहा था, "सतर्कता और बिना समझौते के कार्रवाई जारी रहेगी और माफिया सिंडिकेट पर कार्रवाई चलती रहेगी।"