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Supreme Court: 'पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए लाया CAA', अदालत में नई याचिका दायर

Thu, 04 Apr 2024 08:03 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: निर्मल कांत Updated Thu, 04 Apr 2024 08:03 PM IST
सार

Supreme Court: सर्वोच्च न्यायालय में दायर नई याचिका में कहा गया है कि संशोधित नागरिकता कानून और उसके नियम पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के सताए हुए गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार की रक्षा के लिए लाए गए। 

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CAA, related rules brought to safeguard rights of minorities from Pak, Afghanistan & B'desh, says fresh plea
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई (फाइल)

विस्तार

शीर्ष अदालत में एक नई याचिका दायर की गई है। जिसमें बताया गया कि संशोधित नागरिकता कानून और उसके नियम पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के सताए हुए गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार की रक्षा के लिए लाए गए। 

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मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने 19 मार्च को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को प्रभावी बनाने वाले नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगाने से इनकार किया था। इसके साथ ही केंद्र को नागरिकता संशोधन नियम 2024 के क्रियान्वयन  पर रोक लगाने वाली याचिकाओं पर तब तक जवाब देने को कहा था कि जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय सीएए की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का निपटारा न कर दे। 

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इस बीच, वकील अश्विनी उपाध्याय ने सीएए और उसके नियमों पर चल रहे मुकदमों में खुद को पक्षकार बनाने के लिए एक आवेदन के साथ उच्चतम न्यायालय का रुख किया है। वकील अश्विनी उपाध्याय के जरिए दायर नई याचिका में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) सहित विभिन्न याचिकाकर्ताओं की लंबित जनहित याचिकाओं को विभिन्न आधारों पर खारिज करने की मांग की गई है। 

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अपनी याचिका में उपाध्याय ने कहा कि संशोधित नागरिकता कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली रिट याचिकाएं राजनीति से प्रेरित हैं। अधिनियम से उनके किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हो रहा है। इसलिए जनहित याचिकाएं अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई योग्य नहीं हैं। अदालत के कीमती समय को बचाने के लिए इन्हें खारिज किया जा सकता है। 

याचिका में उन्होंने कहा, सीएए के लागू होने के बाद से प्रदर्शनकारियों ने ट्रेनों और बसों को जलाकर, पथराव करके और पुलिस पर हमला करके देश को डराने की कोशिश की और सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार मशीन से आग की लपटों में घिरे राष्ट्र की छवि बनाने के लिए समन्वय किया। हालांकि, सच्चाई पूरी तरह से अलग थी। गुस्सा सिर्फ इसलिए है क्योंकि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों को न्याय का एक छोटा सा हिस्सा दिया जा रहा था। इसे केवल हक का विरोध कहा जा सकता है और निश्चित तौर पर संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत इसकी गारंटी नहीं दी गई है। 

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