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Byelection Results: क्या उपचुनाव में हार-जीत से भाजपा और विपक्ष कमजोर या मजबूत होगा? जानें विश्लेषकों की राय

Sat, 09 Sep 2023 03:31 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अभिषेक दीक्षित Updated Sat, 09 Sep 2023 03:31 PM IST
सार

Khabron Ke Khiladi on Ghosi Byelection Results: सपा से भाजपा में आए दारा सिंह चौहान उत्तर प्रदेश की घोसी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में हार गए। बंगाल में भी भाजपा ने अपनी सीट गंवा दी। उपचुनाव के इन नतीजों में भाजपा और विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' के लिए क्या संदेश छुपा है?

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Byelection Results Will BJP and opposition become stronger or weaker Know analysts opinion
खबरों के खिलाड़ी। - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

जी20 सम्मेलन के भव्य आयोजन की तैयारियों के बीच देश में सात विधानसभा सीटों पर उपचुनाव के नतीजे आए। इनमें उत्तर प्रदेश की घोसी सीट के नतीजे पर सबसे ज्यादा चर्चा हुई। घोसी के नतीजों से विपक्षी गठबंधन उत्साहित है। इसे I.N.D.I.A. की जीत बताया जा रहा है। आखिर इन नतीजों के मायने क्या हैं, जानिए इस पर 'खबरों के खिलाड़ी' के विश्लेषकों की राय...

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घोसी में सपा की जीत और भाजपा की हार के मायने क्या हैं? 
पूर्णिमा त्रिपाठी:
घोसी की जीत से विपक्षी एकजुटता जमीन पर दिख रही है। कहा जा रहा था कि जमीन पर आपस में सामंजस्य बैठाना आसान नहीं होगा, लेकिन घोसी के नतीजे ने उन आशंकाओं को झुठला दिया है। जीत के बाद श्रेय लेना एक बात है, लेकिन जमीन पर गठबंधन दिख रहा है। ये उपचुनाव इंडिया गठबंधन और भाजपा, दोनों के लिए एक रियलिटी चेक है।
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अवधेश कुमार: उपचुनाव के नतीजों को इतने बड़े राज्य के चुनाव की अग्नि परीक्षा नहीं कहा जा सकता। विजय हमेशा आत्मविश्वास को बढ़ाती है, लेकिन एक जीत को व्यापक जीत नहीं कहा जा सकता। अखिलेश यादव पहले कई चुनाव हारे हैं। तब यह नहीं कह सकते थे कि अखिलेश का यूपी से सूपड़ा साफ हो गया है, तो अब एक जीत को भाजपा की हार नहीं कहा जा सकता। घोसी के मतदाताओं ने दल-बदल की राजनीति के खिलाफ भाजपा को संदेश दिया है, लेकिन यह पीएम मोदी की हार नहीं है। 

प्रेम कुमार: घोसी में 57 प्रतिशत वोट सपा प्रत्याशी को मिले हैं। इससे यह साफ है कि ये सिर्फ अखिलेश की जीत नहीं है। इसमें 'इंडिया' फैक्टर भी है। यह बात भी अहम है। भाजपा अति पिछड़ा वर्ग को साथ लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन घोसी सीट पर भाजपा का यह फॉर्मूला विफल रहा। ओपी राजभर के साथ रहने के बावजूद भाजपा को अति पिछड़े मतदाताओं का वोट नहीं मिला। इससे साफ है कि इसके पीछे 'इंडिया' और कांग्रेस फैक्टर है।

विनोद अग्निहोत्री: किसी एक उपचुनाव के नतीजों को सभी के लिए मान्य नहीं कहा जा सकता। अगर भाजपा घोसी में जीत जाती तो क्या नेरैटिव होता? एक चैनल पर भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि 'इंडिया' नहीं जीता, समाजवादी पार्टी जीती है, लेकिन ये तो मोर्चा है। मोर्चा जहां जीतेगा, उसका श्रेय मोर्चे को ही जाएगा। हालांकि, इससे यह नहीं मान सकते कि घोसी के बाद भाजपा का सफाया होने जा रहा है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में तीन उपचुनाव हुए थे। तीनों में भाजपा हार गई थी, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा जीत गई। भाजपा के साथ एक सकारात्मक पहलू है कि वह हार से सबक लेती है, विपक्ष चाहे सबक ले या न ले, भाजपा जरूर सबक लेती है। दारा सिंह चौहान ने बसपा से शुरुआत की थी। फिर वे सपा में आए। फिर सपा से भाजपा और भाजपा से सपा में गए। उनकी हार नेताओं और वोटरों के लिए एक संदेश है। विपक्ष के उम्मीदवार को तो सभी वर्गों का वोट मिला है। यानी भाजपा के वोट भी उन्हें मिले हैं। 

क्या विपक्षी दलों को जीत का फॉर्मूला मिल गया है? 
पूर्णिमा त्रिपाठी:
इंडिया गठबंधन के घटक दलों को इससे समझ आ गया होगा कि वे साथ चुनाव लड़े तो क्या होगा और अलग-अलग लड़ते हैं तो क्या होगा। मतदाताओं को बेवकूफ मानकर नहीं चलना चाहिए। मतदाता अपना श्रेष्ठ विकल्प देखता है। 

अवधेश कुमार: 2024 से पहले और भी चीजें होंगी। जब तक कांग्रेस-बसपा मजबूत नहीं होती, तब तक भाजपा विरोधी मतदाताओं के केंद्रीकरण के लिए एक ही पार्टी है- सपा। भाजपा तो कांग्रेस के कमजोर होने से देशभर में आगे बढ़ी है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में तभी मजबूत होगी, जब भाजपा वहां कमजोर होगी। बंगाल के नतीजे भाजपा के लिए चिंताजनक हैं। वहां पर कांग्रेस, वाम दल और तृणमूल अलग-अलग चुनाव लड़े, फिर भी भाजपा ने अपनी जीती हुई सीट गंवा दी। बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश में तो इंडिया गठबंधन पर अमल हो जाएगा, लेकिन बंगाल में यह विपक्षी गठबंधन टेढ़ी खीर साबित होगा। 'इंडिया' गठबंधन के घटक दल जीत तो गए हैं, लेकिन एकजुटता का संकेत इससे नहीं मिल रहा।  

प्रेम कुमार: पश्चिम बंगाल के चुनाव इसका उत्तर हैं। सत्ताधारी के खिलाफ वहां विपक्ष कोई है तो भाजपा है। इंडिया गठबंधन के कारण माकपा-कांग्रेस के साझा उम्मीदवार को जनता ने विपक्ष का प्रत्याशी नहीं माना। इंडिया गठबंधन में लोकसभा चुनाव विपक्ष की भूमिका में होगा। ऐसे में तब चुनाव में इन उपचुनाव के नतीजों में अलग फर्क नजर आएगा। 

विनोद अग्निहोत्री: तीसरी बात यह है कि सनातन धर्म पर उदयनिधि का बयान सामने आ चुका था, उसके बाद ये चुनाव हुए और नतीजे आए। इसके बावजूद 4:3 का नतीजा आया है। इसका मतलब स्थानीय मुद्दे भी असर डालते हैं। भाजपा विरोधी वोट इंडिया गठबंधन के पक्ष में जा रहा है। अखिलेश-ममता अब घोसी की जीत का श्रेय इंडिया गठबंधन को देते हैं। 1993 में सपा-बसपा साथ लड़े तो सपा ने 109 और बसपा ने 67 सीटें जीतीं। भाजपा को 177 सीटें मिलीं। 1996 में दोनों अलग-अलग लड़े, तब भी भाजपा 174, बसपा 67 और सपा 110 पर ही रही। बंगाल में गठबंधन होता है तो माकपा और कांग्रेस साथ रहेंगे, तृणमूल का साथ रहना मुश्किल है। या फिर कांग्रेस और तृणमूल साथ लड़ सकते हैं। ऐसे में वहां माकपा अलग चुनाव लड़ सकती है। बागेश्वर में कांग्रेस जीत सकती थी, लेकिन कांग्रेस को यहां जीत का भरोसा ही नहीं था। 

विपक्षी एकता के बीच आम आदमी पार्टी ने मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ में 10-10 उम्मीदवार उतार दिए हैं। इसे कैसे देखते हैं? 
पूर्णिमा त्रिपाठी:
अगर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार मध्यप्रदेश में जीत भी जाते हैं तो क्या मतदाता 'आप' को राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष मानेगा? आम आदमी पार्टी अब रास्ते से भटक गई है। आंदोलन से राजनीतिक दल निकलते हैं, लेकिन 'आप' की विचारधारा अब तक समझ नहीं आई है। 

अवधेश कुमार: आम आदमी पार्टी अब तक यह नहीं समझ पाई कि भारतीय राजनीति में उसकी क्या भूमिका है, दृष्टिकोण क्या है। अरविंद केजरीवाल के बारे में पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता। वे दबाव जरूर बनाए रख सकते हैं। 


प्रेम कुमार: केजरीवाल की पार्टी का व्यवहार दूसरे दलों से कैसे अलग है? भाजपा ने PDP से समझौता किया था, कांग्रेस कहीं IUML से समझौते कर रही है। तृणमूल पहले NDA में रही, अब इंडिया में है। नीतीश कुमार भी पाला बदलते रहे। तो आरोप सिर्फ आम आदमी पार्टी पर क्यों लगाना चाहिए?  केजरीवाल लगातार अनशन पर वे बैठे थे। अनशन-आंदोलन कितना मुश्किल काम होता है। आंदोलन कभी बेईमान नहीं होता, उसका फायदा उठाने वालों पर सवाल उठ सकते हैं। उस आंदोलन का फायदा तो आरएसएस-भाजपा ने उठाया और सत्ता बदल गई। विसंगतियां होंगी, लेकिन आम आदमी पार्टी चुनाव जीतकर आई है। विसंगतियां तो सभी दलों में हैं। 

विनोद अग्निहोत्री: 'आप' को भले ही राष्ट्रीय दर्जा मिल गया, लेकिन है तो वह क्षेत्रीय पार्टी ही। सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री मोदी के बाद राहुल गांधी का ही नाम लिया जाता है। अरविंद केजरीवाल इस मामले में चौथे-पांचवें नंबर पर आते हैं। अभी 'आप' दबाव बना रही है। सपा-बसपा भी कुछ राज्यों में एक-दो सीटें जीत जाते हैं क्योंकि इन दोनों दलों का सामाजिक जनाधार है, 'आप' के मामले में ऐसा नहीं है। इस देश में ज्यादातर राजनीतिक दलों का जन्म आंदोलन के गर्भ से हुआ है। हर पार्टी ने अपने आंदोलन के बाद जनता को छला है। क्या ये दल आंदोन के शाश्वत मूल्यों पर चले? कांग्रेस और वाम दल आज इस हाशिए पर क्यों हैं? संघ के पुराने विचारक भाजपा के बारे में बताएंगे, कांग्रेस के पुराने नेता उस दल के बारे में अपनी पीड़ा बताएंगे। फर्क यही है कि 'आप' का जन्म ऐसे कालखंड में हुआ, जब सूचना प्रौद्योगिकी आ चुकी थी। उसने इसका इस्तेमाल किया।

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