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स्मृति शेष: खांटी राजनेता बूटा सिंह ने हर बार विवादों को पछाड़कर की जोरदार वापसी

एजेंसी, नई दिल्ली Published by: देव कश्यप Updated Sun, 03 Jan 2021 04:55 AM IST
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बूटा सिंह (फाइल फोटो)
बूटा सिंह (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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जमीन पर कान लगाए रखने और नजर राष्ट्रीय राजनीति पर गड़ाए रखने वाले वरिष्ठ कांग्रेसी बूटा सिंह खांटी राजनेता थे जो अपने परिश्रम और कार्य कुशलता से 1980 के दशक में राजीव गांधी की सरकार में नंबर दो बनकर उभरे। कांग्रेस के प्रमुख दलित चेहरे और इंदिरा, राजीव समेत गांधी परिवार के वफादार बूटा सिंह ने शनिवार को एम्स में अंतिम सांस ली।
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अपने पांच दशक से अधिक लंबे राजनीतिक करियर में वह अकसर विवादों के केंद्र में रहे, लेकिन हर बार उन्होंने जोरदार वापसी की। पंजाब के जालंधर जिले में मुस्तफापुर में एक संभ्रांत ‘मजहबी’ सिख परिवार में 21 मार्च 1934 को उनका जन्म हुआ। वह आठ बार लोकसभा के लिए चुने गए, केंद्र में विभिन्न मंत्रालयों में मंत्री रहे और 2004 में बिहार के राज्यपाल बनाए गए।



उनका देश की राजनीति के राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभार 1980 के दशक में हुआ जब वह राजीव गांधी कैबिनेट में सिख समुदाय से इकलौते मंत्री थे। उस वक्त कांग्रेस को ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार और 1984 के सिख विरोधी दंगों के चलते सिख समुदाय की भारी नाराजगी झेलने पड़ रही थी। उन्हें 1986 में पीवी नरसिम्हा राव की जगह गृहमंत्री बनाया गया और वह राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के 1989 में हार तक इस पद पर रहे।

‘हाथ’ चुनाव चिह्न चुनने में रही अहम भूमिका
राजीव गांधी से पहले बूटा सिंह उनकी मां इंदिरा गांधी के काफी करीब थे और उनकी सरकार में कई अहम पदों पर रहे। एक किताब के मुताबिक, ‘हाथ का पंजा’ चुनाव चिह्न चुनने में उनकी अहम भूमिका थी। चुनाव आयोग ने 1978 में इंदिरा के नेतृत्व वाली कांग्रेस (आई) को तीन चुनाव चिह्न हाथी, साइकिल और हाथ का पंजा में से किसी एक चुनने का विकल्प दिया। चिह्न चुनने की जिम्मेदारी इंदिरा ने बूटा को दी और उन्होंने ‘हाथ’ पर अपनी मुहर लगाई।

सामाजिक धार्मिक बहिष्कार भी झेला
गांधी परिवार के अपनी नजदीकी की कीमत भी बूटा सिंह को चुकानी पड़ी। ऑपरेशन ब्ल्यू स्टार और सिख विरोधी दंगों के चलते सिखों ने अप्रैल 1985 में उन्हें सामाजिक और धार्मिक रूप से बहिष्कृत कर दिया। स्वर्ण मंदिर के घटनाक्रम के करीब 10 साल बाद उन्होंने प्रायश्चित जताया और सिख समाज में वापसी हुई। मार्च 1994 में उनको माफी दी गई। बतौर सजा स्वर्ण मंदिर समेत अन्य गुरुद्वारों में फर्श की सफाई करते, बर्तन धोते, जूते-चप्पल साफ करने की उनकी तस्वीरें काफी वायरल हुई थी।

प्रदेश सरकारों को बर्खास्त करने को लेकर भी रहे विवादों में
बूटा सिंह बतौर केंद्रीय गृहमंत्री और राज्यपाल के तौर पर विभिन्न राज्य सरकारों को बर्खास्त किए जाने की सिफारिश को लेकर भी विवादों में रहे। सबसे ज्यादा विवाद 2005 में बिहार विधानसभा भंग किए जाने को लेकर हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी भूमिका की तीखी आलोचना की थी। इसके चलते उन्होंने 2006 में राज्यपाल के पद से इस्तीफा दे दिया था।

बूटा के कहने पर ही अयोध्या मामले में रामलला विराजमान को बनाया गया पक्षकार
बूटा सिंह के गृहमंत्री रहते ही अयोध्या में विवादित परिसर का ताला खुलवाया गया था। इतना ही नहीं, एक किताब के लेखक के अनुसार, 1989 से पहले किसी हिंदू पक्षकार ने अयोध्या की विवादित जमीन पर अपना दावा नहीं किया था। तत्कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह ने अपनी कानून समझ का इस्तेमाल करते हुए विहिप के अशोक सिंघल को संदेश भेजा कि हिंदू पक्ष की ओर से दाखिल किसी मुकदमे में जमीन का मालिकाना हक नहीं मांगा गया है और ऐसे में उनका मुकदमा हारना तय है। इसके बाद राममंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों ने प्रसिद्ध वकील लाल नारायण सिन्हा से कानूनी राय ली और उन्होंने सिंह के तर्क का समर्थन किया। इसके बाद 1989 में फैजाबाद की सिविल कोर्ट में रामलला विराजमान को अयोध्या मामले में पक्षकार बनाया गया।

अकाली दल से शुरू किया था राजनीतिक सफर
सिंह ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत शिरोमणि अकाली दल से की थी। वह 1960 की शुरुआत में कांग्रेस में शामिल हुए। 1962 में पंजाब से राज्यसभा के लिए चुने गए। इसके बाद वह राजस्थान की जालौर सीट से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुए। कुछ समय के लिए वह भाजपा में भी रहे और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मार्च 1998 में संचार मंत्री बनाए गए। 1998 में जेएमएम घूसखोरी मामले में उन पर आरोप लगे और मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। वह फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए और बिहार के राज्यपाल बनाए गए।

कांग्रेस में रहे विभिन्न पदों पर
प्रमुख दलित नेता सिंह ने 1973-74 में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति हरिजन सेल के समन्वयक के तौर पर काम शुरू किया। 1978 में वह कांग्रेस महासचिव बने। 1974 में रेल उपमंत्री बनाए गए और 1976 में वाणिज्य उपमंत्री। 1980 में वह जहाजरानी और परिवहन मंत्रालय में राज्य मंत्री और 1982 में खेल मंत्री स्वतंत्र प्रभार बने। 1983 में पीएम इंदिरा गांधी ने उन्हें कैबिनेट मंत्री के तौर पर संसदीय मामलों, खेल और आवास मंत्रालय का कार्यभार सौंपा। 1984 में वह कृषि और ग्रामीण विकास, 1986 में केंद्रीय गृहमंत्री बने। पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वह 1995 से 1996 तक उपभोक्ता मामलों और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के मंत्री रहे। 2007 में पीएम मनमोहन सिंह ने उन्हें अनुसूचित जाति के लिए राष्ट्रीय आयोग का चेयरमैन नियुक्त किया। वह इस पद पर 2010 तक रहे।  

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