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Hindi News ›   India News ›   Buddha Purnima Special Lord Buddha Teachings Way of Blissful life by getting rid of sorrow

बुद्ध पूर्णिमा विशेष: सिद्धार्थ गौतम से बुद्ध तक की यात्रा बेहद प्रेरक, जानें दुख-निवारण का मार्ग

Rajesh Pratap Singh राजेश प्रताप सिंह
Updated Thu, 23 May 2024 05:41 AM IST
सार

ध्यान के दौरान गौतम बुद्ध को संसार के दुखों और उनके निवारण के विषय में ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसके अनुसार दुखों के निवारण का अष्टांगिक मार्ग ही सद्धर्म है।

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Buddha Purnima Special Lord Buddha Teachings Way of Blissful life by getting rid of sorrow
भगवान बुद्ध (फाइल) - फोटो : एएनआई

विस्तार

रात्रि की नीरवता को तोड़ते हुए सिद्धार्थ गौतम अपने सारथी छन्ना के साथ महाराजा शुद्धोदन के राज प्रासाद से निकलकर राज्य की सीमा से बाहर जाने लगे। पौ फटते-फटते दोनों अनोमा नदी के तट पर पहुंचे। नदी के पार दूसरा राज्य और घना जंगल था। दोनों ने सावधानीपूर्वक नदी पार की। सिद्धार्थ ने तलवार से अपने बालों को काटा और अपनी तलवार, केश और अपने प्रिय घोड़े कंथक की लगाम छन्ना के हाथ में देकर उसे वापस जाने का निर्देश दिया।

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29वें वर्ष में सबके कल्याण के लिए जीवन की नई यात्रा
यह वही सिद्धार्थ गौतम थे, जिनके जन्म पर ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि वह या तो एक महान सम्राट होंगे या महान संन्यासी। इसी संन्यास से बचाने के लिए राजा ने सारे ऐश्वर्य राज प्रासाद में ही इकट्ठा किए और राजकुमार के बाहर जाने पर प्रतिबंध लगाया। पर ऐसा होता कहां है? जो राजकुमार तपती दोपहर में खेतों में काम करने वालों को देखकर या पक्षी के तीर लगने पर करुणा से उद्विग्न हो जाता था, वह अपने जीवन के 29वें वर्ष में सबके कल्याण के लिए एक नई यात्रा पर निकल चुका था।
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निरंजना नदी के तट पर तप और ध्यान
कई आश्रमों में सब कुछ सीखने के उपरांत भी गौतम की जिज्ञासा शांत नहीं हुई। लगभग 6 वर्ष बीतने पर निरंजना नदी के तट पर वह तप और ध्यान करने लगे। तीन माह बाद उनके साथ पांच अन्य भिक्षु आ गए। एक रात्रि उन्हें लगा कि इस तरह शरीर को कष्ट देने से कोई लाभ नहीं है। सुबह उठकर उन्होंने नदी में स्नान किया और उरुवेला गांव जाने लगे। रास्ते में कमजोरी के कारण वह बेहोश हो गए। उसी समय सुजाता नाम की स्त्री पूजा के लिए जंगल की ओर जा रही थी।
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जब गौतम ने पीपल के वृक्ष के नीचे समाधि लगाई
एक संन्यासी को बेहोश देखकर उसने अपने हाथ की खीर उनके मुंह में डाल दी। धीरे-धीरे उन्हें होश आया और वह जंगल में अपने तप की जगह पहुंचे। जब अन्य पांचों को पता चला कि गौतम ने खाना-पीना शुरू कर दिया है तो वे उन्हें छोड़कर चले गए। कुछ दिन बाद पीपल के वृक्ष के नीचे गौतम ने समाधि लगाई। चार सप्ताह बाद उन्हें ध्यानावस्था में संसार के दुखों और उनके निवारण के विषय में ज्ञान प्राप्त हुआ। वहां से चलकर वह वाराणसी के सारनाथ के मृगदाय में आए।

ब्रह्मचर्य का अर्थ यहां व्यभिचार न करना
पहले तो उन पांचों ने सोचा कि बुद्ध से बात न की जाए, पर उनके चेहरे की आभा और वाणी में विश्वास ने उन्हें बुद्ध की बातों को सुनने के लिए मजबूर िकया। उनको नए मार्ग के बारे में बताते हुए बुद्ध ने कहा, “हमें यह जानना चाहिए कि संसार में हर तरफ दुख है। इस दुख का कारण है। इस दुख या दुख के कारणों का निवारण संभव है और अंत में निवारण का यह मार्ग अष्टांगिक मार्ग है। यही सद्धर्म है। इस सद्धर्म पर चलने के लिए सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य का अर्थ यहां व्यभिचार न करना है) का पालन जरूरी है।”


बुद्धम शरणम गच्छामि...
भिक्षुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “सभी संस्कार अनित्य है। अप्रमादपूर्वक अपने लक्ष्य की प्राप्ति में लगे रहो।” यह कहकर गौतम बुद्ध ने अपनी आंखें मूंद लीं। गगन में वैशाख की पूर्णिमा अपनी पूरी चांदनी बिखेरती हुई शांति का संदेश दे रही थी। कहीं एक आवाज वातावरण में गूंज रही थी- बुद्धम शरणम गच्छामि, धम्मम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि।

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