Election: तेलंगाना में मुस्लिम वोटों के लिए बीआरएस, कांग्रेस-एआईएमआईएम में रस्साकशी, भाजपा को हो सकता है फायदा
ओवैसी का तिलिस्म तोड़ने की जद्दोजहद में कांग्रेस बीआरएस के साथ ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के खिलाफ सियासी तीर चला रही है। तेलंगाना की 119 सीटों के लिए 30 नवंबर को चुनाव होंगे।
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तेलंगाना की राजधानी में खाने में हैदराबादी बिरयानी और राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी के जिक्र से बातें शुरू होती हैं। वैसे ओवैसी सभी सीटों पर चुनाव लड़ नहीं रहे हंै। इसलिए प्रमुख लड़ाई सत्तारूढ़ बीआरएस और कांग्रेस में ही है। हालांकि भाजपा को भी पीएम नरेंद्र मोदी के करिश्मे से उम्मीद है। पीएम मोदी सिकंदराबाद में जोरदार रैली कर भी चुके हैं। ओवैसी का तिलिस्म तोड़ने की जद्दोजहद में कांग्रेस बीआरएस के साथ ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के खिलाफ सियासी तीर चला रही है। तेलंगाना की 119 सीटों के लिए 30 नवंबर को चुनाव होंगे। दूसरे राज्यों में चल रहे चुनाव के बाद यहां सभी पार्टियों के दिग्गज लगातार मैदान में उतरेंगे।
एयरपोर्ट से कैब में बैठते ही ड्राइवर से चुनावी चर्चा करने की कोशिश की। मुझे थोड़ा-थोड़ा हिंदी आता है पर आप पूछिए मैं सब बता देगा, यह कहते हुए वैंकटेश ने टूटी-फूटी हिंदी में कहा, इस बार कांग्रेस के चांस ज्यादा लग रहे हैं। बीआरएस सरकार में भ्रष्टाचार बहुत हुआ है, योजनाओं का सही फायदा गरीब को नहीं हुआ। भाजपा के सवाल पर वैंकटेश का जवाब था-प्रदेश अध्यक्ष बदलने का भाजपा को नुकसान हुआ है। ओवैसी पर जवाब मिला कि उनकी अपने लोगों में काफी पकड़ है।
ओवैसी पर विरोधी उठा रहे सवाल
119 विधानसभा सीटों में ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम महज नौ सीटों पर चुनाव लड़ रही है। हैदराबाद जिले में लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। विरोधियों का सवाल है कि बिहार-यूपी में विधानसभा चुनावों ही नहीं नगर पालिका तक में लड़ाने वाले औवेसी अपने राज्य में पीछे क्यों हट रहे हैं। पिछले दो चुनावों में ओवैसी का रुझान बीआरएस की ओर है। इसका लाभ भी मिला और दो बार से प्रदेश में मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के नेतृत्व में बीआरएस की सरकार है। इस बार भी ओवैसी की पार्टी का रुख बीआरएस की ओर हैं। एक पोस्टर में ओवैसी के पीछे भाजपा होने की बात है। पोस्टर में मेरठ के मेयर चुनाव में ओवैसी के प्रत्याशी व सपा के वोट भाजपा के सामने दिखाए गए हैं। इसके अलावा विभिन्न चुनावों में बिहार और यूपी की तीन अन्य सीटों का जिक्र है। सभी में दिखाया गया है कि ओवैसी ने प्रत्याशी न उतारे होते तो भाजपा नहीं जीतती।
तीखे होते जा रहे हैं सियासी बयान
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रेवंत रेड्डी के ओवैसी को संघ से जुड़ा बताने वाले बयान ने सियासी घमासान तेज कर दिया है। पलटवार करते हुए ओवैसी ने रेवंत को आरएसएस का आदमी बता दिया। साथ ही कहा, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष आरएसएस की कठपुतली हैं। बीआरएस रेवंत-ओवैसी झड़प को अपने लिए फायदे का सौदा मान रही है। यही वजह है कि बीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के बेटे केटी रामाराव भी रेवंत को संघ की पृष्ठभूमि का बताकर हमला करते हैं। जवाब में राहुल गांधी ने कहा कि ओवैसी और बीआरएस मिले हुए हैं। दरअसल बीआरएस को भाजपा के साथ दिखाने में मुस्लिम वोटों को अपनी ओर खींचने की कवायद है। ओवैसी इसीलिए इस चुनाव में और ज्यादा अहम हो गए हैं।
विश्लेषकों का मानना-नतीजा साफ होगा
राजनीतिक विश्लेषक ननचैरय्या मेरूगमला का कहना है, सारा खेल मुस्लिम वोटों के इर्दगिर्द है। प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी 12 से 14 प्रतिशत के बीच है। 20 सीटों पर प्रभावी संख्या है और 20 अन्य पर किसी भी दल को जिता या हरा सकते हैं। इसी से ओवैसी अहम बने हुए हैं। कांग्रेस के साथ ओवैसी का अलगाव किरण रेड्डी के मुख्यमंत्री काल में बढ़ गया। तब से आेवैसी का झुकाव बीआरएस की ओर ही है। साथ ही कहते हैं, यह चुनाव भी पिछली बार की तरह एकतरफा ही जा सकता है। पिछली बार 119 में बीआरएस को 88 सीटें मिली थीं। मेरूगमला कहते हैं कि इसी को बदलने के लिए कांग्रेस जोर लगा रही है। वहीं, भाजपा प्रवक्ता जफर इस्लाम के मुताबिक, तेलंगाना में इस बार भाजपा बदलाव लाएगी।