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Bombay High Court: 'UAPA पर नहीं उठा सकते सवाल, यह पूर्णत: सांविधानिक'; अदालत बोली- इसे राष्ट्रपति की मंजूरी..
Fri, 18 Jul 2025 12:35 AM IST
ज्योति भास्कर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Fri, 18 Jul 2025 12:35 AM IST
सार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने गैरकानूनी गतिविधियां रोधी कानून (UAPA) की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका ठुकरा दी। अदालत में दो जजों की खंडपीठ ने कहा, यूएपीए पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। यह कानून मौजूदा स्वरूप में पूरी तरह सांविधानिक है। कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी भी हासिल है।
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बॉम्बे हाई कोर्ट (फाइल)
- फोटो : ANI
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विस्तार
बॉम्बे हाईकोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की वैधता पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता। अपने मौजूदा स्वरूप में यह कानून पूरी तरह सांविधानिक है। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए यूएपीए और राजद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की अब निलंबित हो चुकी धारा 124ए को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया।
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जस्टिस एएस गडकरी और जस्टिस नीला गोखले की पीठ अनिल बाबूराव बेले नामक एक व्यक्ति की तरफ से 2021 में दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसे राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने एल्गार परिषद मामले के संबंध में 2020 में नोटिस जारी किया था। बेले की ओर पेश वकील प्रकाश आंबेडकर ने दावा किया कि यूएपीए ने कार्यपालिका को किसी संगठन अथवा व्यक्ति और उनकी गतिविधि को कानून में परिभाषित किए बिना गैरकानूनी घोषित करने की अनियंत्रित शक्ति प्रदान की है।
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जस्टिस गडकरी और जस्टिस गोखले की पीठ ने कहा, अपने मौजूदा स्वरूप में यूएपीए सांविधानिक रूप से वैध है। इसे राष्ट्रपति की मंजूरी हासिल है। इसलिए इसकी वैधता को चुनौती देने में कोई दम नहीं है। इसलिए याचिका खारिज की जाती है। जस्टिस गडकरी ने इस तरह की याचिका दायर करने पर निराशा जाहिर करते हुए सुनवाई के दौरान यह भी कहा, आंबेडकर आपने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया।
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व्यापक अधिकार देने पर उठाया गया था सवाल
याचिका में दावा किया गया था कि संविधान कहीं भी कार्यपालिका को निर्णय लेने का व्यापक अधिकार नहीं देता और संसद को किसी संगठन को गैरकानूनी घोषित करने का व्यापक अधिकार नहीं दिया जा सकता। बेले ने यूएपीए और राजद्रोह से संबंधित धारा 124ए को असांविधानिक घोषित करने की मांग के साथ ही 10 जुलाई 2020 को उन्हें जारी नोटिस रद्द करने की भी अपील की थी।
संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के अनुरूप संशोधनों का जिक्र
इसमें यह भी कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का समर्थन करने वाले किसी भी व्यक्ति को अपराधी करार देने संबंधी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 2001 का प्रस्ताव अपनाने के लिए यूएपीए में जो संशोधन किए गए, उसने सरकार के लिए किसी भारतीय नागरिक या संगठन को आतंकवादी घोषित करना आसान बना दिया।
केंद्र सरकार और एनआईए ने किया विरोध
केंद्र सरकार और एनआईए की तरफ से बेले की याचिका का विरोध करते हुए यह भी बताया गया कि यूएपीए की वैधता पर आपत्ति जताने वाली कई याचिकाएं हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। शीर्ष कोर्ट में आईपीसी की धारा 124ए के तहत राजद्रोह कानून की सांविधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका लंबित होने का भी हवाला दिया गया।