{"_id":"5d73d2a38ebc3e93dc47e4e5","slug":"bombay-high-court-says-there-is-time-machine-in-in-courts-where-cases-continue","type":"story","status":"publish","title_hn":"अदालतों में टाइम मशीन हैं जहां मामले चलते रहते हैं: बॉम्बे हाईकोर्ट","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
अदालतों में टाइम मशीन हैं जहां मामले चलते रहते हैं: बॉम्बे हाईकोर्ट
Sat, 07 Sep 2019 09:26 PM IST
Trainee Trainee
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Trainee Trainee
Updated Sat, 07 Sep 2019 09:26 PM IST
विज्ञापन
कोर्ट का फैसला(सांकेतिक)
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय अदालतों में मुकदमों को समाप्त होने में अत्यधिक समय लगने का जिक्र करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि अदालतों में टाइम मशीन हैं जहां मामले अनिश्चितकाल तक चलते रहते हैं।
किराया नियंत्रण अधिनियम से संबंधित एक मामले में अदालत ने शुक्रवार को कहा कि यह मुकदमा 1986 में शुरू हुआ था। इसके बाद कई अपील, आवेदन और याचिकाएं दायर हुईं लेकिन मामला फिर भी नहीं सुलझा, जबकि वास्तविक भू-स्वामी और किराएदार अब जीवित नहीं रहे हैं।
न्यायमूर्ति दामा एस नायडू ने कहा कि कई मामलों में दोनों पक्षों के वादियों की मृत्यु हो जाती है लेकिन मुकदमेबाजी बाद की पीढ़ियों द्वारा की जाती है। शहर निवासी रुक्मणीबाई द्वारा यह याचिका दायर की गई थी। याचिका में उसने अपनी संपत्ति से कुछ किराएदारों को बाहर किए जाने का अनुरोध किया था। मामले के दौरान उसकी मौत हो गई और उसके वारिसों ने इस मामले को संभाल लिया।
विज्ञापन
किराएदारों के खिलाफ 1986 में संपत्ति खाली कराए जाने की कार्रवाई शुरू की गई थी और निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने संपत्ति मालिकों के पक्ष में फैसला दिया था।
साल 2016 में किराएदारों ने बदली परिस्थितियों का हवाला देते हुए फिर से उच्च न्यायालय का रुख किया था।
विज्ञापन
किराया नियंत्रण अधिनियम से संबंधित एक मामले में अदालत ने शुक्रवार को कहा कि यह मुकदमा 1986 में शुरू हुआ था। इसके बाद कई अपील, आवेदन और याचिकाएं दायर हुईं लेकिन मामला फिर भी नहीं सुलझा, जबकि वास्तविक भू-स्वामी और किराएदार अब जीवित नहीं रहे हैं।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति दामा एस नायडू ने कहा कि कई मामलों में दोनों पक्षों के वादियों की मृत्यु हो जाती है लेकिन मुकदमेबाजी बाद की पीढ़ियों द्वारा की जाती है। शहर निवासी रुक्मणीबाई द्वारा यह याचिका दायर की गई थी। याचिका में उसने अपनी संपत्ति से कुछ किराएदारों को बाहर किए जाने का अनुरोध किया था। मामले के दौरान उसकी मौत हो गई और उसके वारिसों ने इस मामले को संभाल लिया।
विज्ञापन
किराएदारों के खिलाफ 1986 में संपत्ति खाली कराए जाने की कार्रवाई शुरू की गई थी और निचली अदालत और उच्च न्यायालय ने संपत्ति मालिकों के पक्ष में फैसला दिया था।
साल 2016 में किराएदारों ने बदली परिस्थितियों का हवाला देते हुए फिर से उच्च न्यायालय का रुख किया था।