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बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला: जबरन छूना यौन हमला नहीं, त्वचा से त्वचा का संपर्क होना जरूरी

Mon, 25 Jan 2021 05:57 PM IST
संजीव कुमार झा पीटीआई, नागपुर
पीटीआई, नागपुर Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 25 Jan 2021 05:57 PM IST
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Bombay High Court rules groping without skin to skin touch is not sexual assault
बॉम्बे हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

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बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए रविवार को कहा कि किसी घटना को यौन हमले की श्रेणी में तभी स्वीकार किया जाएगा जब स्किन टू स्किन संपर्क यानी त्वचा से त्वचा का संपर्क हुआ होगा। अदालत ने कहा कि ऐसी घटना में केवल जबरन छूना यौन हमला नहीं माना जाएगा।

किसी नाबालिग को निर्वस्त्र किए बिना, उसके वक्षस्थल को छूना, यौन हमला नहीं कहा जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि इस तरह का कृत्य पॉक्सो अधिनियम के तहत यौन हमले के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। उधर, कुछ कार्यकर्ताओं ने इस फैसले से आपत्ति जताई है।

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बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने 19 जनवरी को पारित एक आदेश में कहा कि 'यौन हमले का कृत्य माने जाने के लिए ‘यौन मंशा से त्वचा से त्वचा का संपर्क होना’ जरूरी है। उन्होंने अपने फैसले में कहा कि महज छूना भर यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है।'
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न्यायमूर्ति गनेडीवाला ने एक सत्र अदालत के फैसले में संशोधन किया जिसने 12 वर्षीय लड़की का यौन उत्पीड़न करने के लिए 39 वर्षीय व्यक्ति को तीन वर्ष कारावास की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष और नाबालिग पीड़िता की अदालत में गवाही के मुताबिक, दिसंबर 2016 में आरोपी सतीश नागपुर में लड़की को खाने का कोई सामान देने के बहाने अपने घर ले गया।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह दर्ज किया कि अपने घर ले जाने पर सतीश ने उसके वक्ष को पकड़ा और उसे निर्वस्त्र करने की कोशिश की। उच्च न्यायालय ने कहा, चूंकि आरोपी ने लड़की को निर्वस्त्र किए बिना उसके सीने को छूने की कोशिश की, इसलिए इस अपराध को यौन हमला नहीं कहा जा सकता है और यह भारतीय दंड संहिता (भादंसं) की धारा 354 के तहत महिला के शील को भंग करने का अपराध है।

धारा 354 के तहत जहां न्यूनतम सजा एक वर्ष की कैद है, वहीं पॉक्सो कानून के तहत यौन हमले की न्यूनतम सजा तीन वर्ष कारावास है। सत्र अदालत ने पॉक्सो कानून और भादंसं की धारा 354 के तहत उसे तीन वर्ष कैद की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं। बहरहाल, उच्च न्यायालय ने उसे पॉक्सो कानून के तहत अपराध से बरी कर दिया और भादंसं की धारा 354 के तहत उसकी सजा बरकरार रखी।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘अपराध के लिए (पॉक्सो कानून के तहत) सजा की कठोर प्रकृति को ध्यान में रखते हुए अदालत का मानना है कि मजबूत साक्ष्य और गंभीर आरोप होना जरूरी हैं।’ अदालत ने कहा, ‘किसी विशिष्ट ब्यौरे के अभाव में 12 वर्षीय बच्ची के वक्ष को छूना और क्या उसका टॉप हटाया गया या आरोपी ने हाथ टॉप के अंदर डाला और उसके वक्ष को छुआ गया, यह सब यौन हमले की परिभाषा में नहीं आता है।’

न्यायमूर्ति गनेडीवाला ने अपने फैसले में कहा कि ‘वक्ष छूने का कृत्य शील भंग करने की मंशा से किसी महिला/लड़की के प्रति आपराधिक बल प्रयोग है।’ पॉक्सो कानून के तहत यौन हमले की परिभाषा है कि जब कोई ‘यौन मंशा के साथ बच्ची/बच्चे के निजी अंगों, वक्ष को छूता है या बच्ची/बच्चे से अपना या किसी व्यक्ति के निजी अंग को छुआता है या यौन मंशा के साथ कोई अन्य कृत्य करता है जिसमें संभोग किए बगैर यौन मंशा से शारीरिक संपर्क शामिल हो, उसे यौन हमला कहा जाता है।’

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यौन हमले की परिभाषा में ‘शारीरिक संपर्क’ ‘प्रत्यक्ष होना चाहिए’ या सीधा शारीरिक संपर्क होना चाहिए। अदालत ने कहा, ‘स्पष्ट रूप से अभियोजन की बात सही नहीं है कि आवेदक ने उसका टॉप हटाया और उसका वक्ष स्थल छुआ। इस प्रकार बिना संभोग के यौन मंशा से सीधा शारीरिक संपर्क नहीं हुआ।’

कार्यकर्ताओं और बाल अधिकार निकायों ने बंबई उच्च न्यायालय के उस हालिया फैसले की आलोचना की है जिसमें कहा गया कि ‘त्वचा से त्वचा’ का संपर्क नहीं होने पर वह यौन हमला नहीं होता। इस फैसले से बाल अधिकार समूहों एवं कार्यकर्ताओं में नाराजगी है जिन्होंने इसे निश्चित रूप से अस्वीकार्य, आक्रोशित करने वाला और आपत्तिजनक करार दिया है।

कार्यकर्ताओं और समूहों ने अदालत के इस फैसले को चुनौती देने का आह्वान किया है। बाल अधिकारों के लिए काम करने वाले गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) बचपन बचाओ आंदोलन के कार्यकारी निदेशक धनंजय टिंगल ने कहा कि उनकी कानूनी टीम मामले को देख रही है और सभी संबंधित आंकड़े जुटा रही है। हम इनपुट के अधार पर उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकते हैं।

आल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमैंस एसोसिएशन की सचिव एवं कार्यकर्ता कविता कृष्णन ने इसे कानून की भावना के खिलाफ बताया। कृष्णन ने कहा, ‘पॉक्सो कानून यौन हमले को बहुत स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है और उसमें यौन स्पर्श का प्रावधान है। यह धारणा कि आप कपड़ों के साथ या बिना स्पर्श के आधार पर कानून को दरकिनार कर देंगे, इसका कोई मतलब नहीं है।’

उन्होंने कहा, ‘यह पूर्णत: बेतुका है और आम समझ की कसौटी पर भी नाकाम साबित होता है। मेरा व्यापक प्रश्न है कि लैंगिक आधारित मामलों में न्यायाधीश के लिए कौन अर्हता प्राप्त करता है।’ पीपुल्स अगेंस्ट रेप इन इंडिया (परी) की अध्यक्ष योगिता भायाना ने कहा कि न्यायाधीश से यह सुनना निराशाजनक है और ऐसे बयान अपराधियों को प्रोत्साहित करते हैं।

भायाना ने कहा कि निर्भया मामले के बाद वे यहां तक गाली को भी यौन हमले में शामिल कराने की कोशिश कर रहे हैं। सेव चिल्ड्रेन के उप निदेशक प्रभात कुमार ने कहा कि पोक्सो कानून में कहीं भी त्वचा से त्वचा के संपर्क की बात नहीं की गई है। महिला कार्यकर्ता शमिना शफीक ने कहा कि महिला न्यायाधीश द्वारा यह फैसला देना दुर्भाग्यपूर्ण है।

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