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बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला: ऑपरेशन सिंदूर पर पोस्ट साझा करने वाली छात्रा पर दर्ज केस रद्द, जानें क्या कहा अदालत

Tue, 27 Oct 2026 10:46 PM IST
राहुल कुमार आईएएनएस, नई दिल्ली
आईएएनएस, नई दिल्ली Published by: राहुल कुमार Updated Tue, 27 Oct 2026 10:46 PM IST
सार

ऑपरेशन सिंदूर से जुड़ी सोशल मीडिया पोस्ट साझा करने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे की इंजीनियरिंग छात्रा खदीजा शहाबुद्दीन शेख को राहत दी है। अदालत ने उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करते हुए कहा कि किसी पोस्ट से नाराजगी या असंतोष पैदा होने की आशंका मात्र आपराधिक कार्रवाई के लिए पर्याप्त नहीं है।
 

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Bombay High Court Quashes FIR Against Pune Student for Social Media Post on Operation Sindoor
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : एएनआई

विस्तार

ऑपरेशन सिंदूर के संदर्भ में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट दोबारा साझा करने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे की इंजीनियरिंग छात्रा खदीजा शहाबुद्दीन शेख के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी है। अदालत ने कहा कि केवल किसी पोस्ट को आपत्तिजनक मान लेना आपराधिक कार्रवाई के लिए पर्याप्त नहीं है। आरोपों में संबंधित अपराधों के लिए जरूरी कानूनी आधार भी होना चाहिए।

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जस्टिस मिलिंद एन. जाधव की पीठ ने 27 अक्टूबर को दिए अपने आदेश में कहा कि छात्रा मूल पोस्ट की लेखिका नहीं थी। उसने दूसरे व्यक्ति की पोस्ट अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर साझा की थी और उसी दिन करीब दो घंटे के भीतर उसे हटा दिया था। इसके बाद उसने सार्वजनिक रूप से खेद जताते हुए माफी भी मांगी थी।
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अदालत के सामने मामला तब आया, जब कोंढवा पुलिस थाने में 9 मई 2025 को छात्रा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। पुलिस के अनुसार, 7 मई 2025 को गश्त के दौरान एक पुलिस हवलदार ने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट देखा। आरोप था कि भारत-पाकिस्तान युद्ध से संबंधित पोस्ट धार्मिक भावनाओं को भड़का सकते थे और इससे सामुदायिक तनाव पैदा होने की आशंका थी।
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छात्रा की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उसने मूल पोस्ट तैयार नहीं की थी और उसे साझा करने के दो घंटे के भीतर हटा दिया था। उसने माफी भी मांगी थी। वकील ने दलील दी कि एफआईआर में छात्रा के आपराधिक इरादे को साबित करने वाली पर्याप्त सामग्री नहीं है। छात्रा के खिलाफ पहले कोई आपराधिक मामला नहीं था और आपराधिक कार्रवाई जारी रहने से उसके करियर पर असर पड़ सकता था।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील अमित पालकर ने एफआईआर रद्द करने का विरोध किया। उन्होंने कहा कि मूल पोस्ट किसी और की होने के बावजूद उसे दोबारा साझा करने से उसका प्रसार होता है और धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं। पोस्ट हटाने और माफी मांगने से अपने आप आपराधिक जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि पोस्ट से नाराजगी या असंतोष पैदा होने की आशंका मात्र किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि संबंधित कानून के तहत अपराध के आवश्यक तत्व मौजूद हैं या नहीं।

अदालत ने कहा कि एफआईआर में यह दिखाने वाली सामग्री पर्याप्त नहीं है कि छात्रा की पोस्ट साझा करने की कार्रवाई से भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धाराओं के तहत लगाए गए आरोपों के आवश्यक तत्व पूरे होते हैं। अदालत के सामने पोस्ट के कारण सामुदायिक तनाव की कोई वास्तविक घटना होने की जानकारी भी नहीं लाई गई। पीठ ने यह भी कहा कि छात्रा ने पोस्ट हटाने के बाद उसे लगातार प्रसारित नहीं किया और धार्मिक वैमनस्य फैलाने के किसी सुनियोजित प्रयास का संकेत देने वाली विशिष्ट सामग्री भी सामने नहीं आई।


छात्रा की उम्र और उसके भविष्य पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि युवा अवस्था में हुई गलती को, आरोपों के आवश्यक तत्व साबित करने वाली सामग्री के अभाव में, अपने आप जानबूझकर किया गया आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि मुकदमे और सजा का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, केवल दंड देना नहीं। छात्रा पहले ही हिरासत में रह चुकी थी और इस अनुभव का उसके भविष्य पर असर पड़ सकता है। अदालत ने छात्रा की याचिका मंजूर कर कोंढवा पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर को रद्द करने का आदेश दे दिया। 

 

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