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हाईकोर्ट: उपराष्ट्रपति धनखड़-केंद्रीय मंत्री रिजिजू के खिलाफ PIL खारिज, संविधान-सुप्रीम कोर्ट पर की थी टिप्पणी

Tue, 21 Feb 2023 08:26 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 21 Feb 2023 08:26 PM IST
सार

बीएलए की जनहित याचिका में कहा गया था कि किरेन रिजिजू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की टिप्पणियों ने सुप्रीम कोर्ट और संविधान में जनता के विश्वास को हिला दिया है। साथ ही इसमें मांग की गई थी कि इसी आधार पर दोनों को संवैधानिक पद से अयोग्य ठहराने की मांग की गई थी। 
 

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Bombay High Court dismised pil against Law Minister Kiren Rijiju and Vice-President Jagdeep Dhankhar
कोर्ट ने सुनाया फैसला - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के खिलाफ एक जनहित याचिका को बॉम्बे हाईकोर्ट ने  खारिज कर दिया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस वी गंगापुरवाला और न्यायमूर्ति संदीप मार्ने की खंडपीठ ने कहा कि संविधान सर्वोच्च और पवित्र है और शीर्ष अदालत की विश्वसनीयता आसमान के बराबर है। इसे किसी व्यक्ति के बयान से कम नहीं किया जा सकता।  

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दरअसल, बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन (बीएलए) ने कानून मंत्री रिजिजू और उपराष्ट्रपति धनखड़ के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में नियुक्ति से संबंधित कॉलेजियम प्रणाली और न्यायपालिका के खिलाफ उनकी टिप्पणियों को लेकर जनहित याचिका दायर की गई थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस वी गंगापुरवाला और न्यायमूर्ति संदीप मार्ने की खंडपीठ ने 9 फरवरी को इस याचिका को खारिज कर दिया था। उस मामले का विस्तृत आदेश मंगलवार को उपलब्ध कराया गया।
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हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों सहित प्रत्येक नागरिक को संविधान का सम्मान और पालन करना चाहिए। जनहित याचिका खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि जनहित की सुरक्षा के लिए एक जनहित याचिका दायर की जाती है और इसका उपयोग नागरिकों को होने वाली समस्या के निवारण के लिए किया जाना चाहिए। यह प्रचार-उन्मुख नहीं हो सकती। 
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बीएलए की जनहित याचिका में कहा गया था कि किरेन रिजिजू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की टिप्पणियों ने सुप्रीम कोर्ट और संविधान में जनता के विश्वास को हिला दिया है। साथ ही इसमें मांग की गई थी कि इसी आधार पर दोनों को संवैधानिक पद से अयोग्य ठहराने की मांग की गई थी। 

सुनवाई के दौरान अदालत ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह द्वारा प्रस्तुत रिजिजू और धनखड़ के बयानों पर ध्यान दिया, जिसमें कहा गया था कि सरकार ने न्यायपालिका के अधिकार को कभी कम नहीं किया है। वे संविधान के आदर्शों का सम्मान करते हैं।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा सुझाए गए तरीके से संवैधानिक प्राधिकारों को हटाया नहीं जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि संविधान का पालन करना प्रत्येक नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। कानून की महिमा का सम्मान किया जाना चाहिए। 

किरेन रिजिजू और उपराष्ट्रपति धनखड़ ने की थी टिप्पणी
कानून मंत्री रिजिजू ने हाल ही में कहा था कि उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अपनाई जाने वाली कॉलेजियम प्रणाली पारदर्शी नहीं है। वहीं, उप-राष्ट्रपति धनखड़ ने 1973 के केशवानंद भारती मामले के ऐतिहासिक फैसले पर सवाल उठाया था। धनखड़ ने कहा था कि 50 साल पुराने फैसले ने एक बुरी मिसाल कायम की है। अगर कोई प्राधिकरण संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पर सवाल उठाता है, तो यह कहना मुश्किल होगा कि हम एक लोकतांत्रिक राष्ट्र हैं।

उच्च न्यायालय ने ईडी से पूछा सवाल
बॉम्बे हाईकोर्ट ने  मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से पूछा कि ईसीआईआर को रद्द क्यों नहीं किया जा सकता, अगर मूल अपराध पर क्लोजर रिपोर्ट लगाई जा चुकी है। जस्टिस रेवती मोहिते डेरे और पृथ्वीराज चव्हाण की खंडपीठ ने यह सवाल जेट एयरवेज के संस्थापक नरेश गोयल और उनकी पत्नी अनीता गोयल की याचिका पर सुनवाई करते हुए किया। इस याचिका में उन्होंने ईडी द्वारा उनके खिलाफ दर्ज एक कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले को रद्द करने की मांग की थी। 


आम तौर पर एक ईसीआईआर पुलिस, सीबीआई या किसी अन्य एजेंसी द्वारा दर्ज आपराधिक मामले के आधार पर दर्ज की जाती है।

गोयल के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता रवि कदम और आबाद पोंडा ने बताया कि ईसीआईआर 2018 में मुंबई पुलिस के पास दर्ज एक शिकायत के आधार पर दर्ज किया गया था, लेकिन मार्च 2020 में, पुलिस ने  मामले में क्लोजर रिपोर्ट दायर की। पुलिस ने इसके पीछे तर्क दिया कि उन्हें शिकायत में कोई तथ्य नहीं मिला और विवाद दीवानी प्रकृति का लग रहा था। मजिस्ट्रेट की अदालत ने रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया।

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