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Bombay High Court: गवाहों के बयान कॉपी-पेस्ट करने पर बॉम्बे हाईकोर्ट नाराज, कहा- यह न्याय प्रणाली के लिए खतरा
Tue, 06 May 2025 02:58 PM IST
बशु जैन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: बशु जैन
Updated Tue, 06 May 2025 02:58 PM IST
सार
औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और न्यायमूर्ति संजय देशमुख की पीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान चार्जशीट को देखा तो गवाहों के बयान इतने समान थे कि पैराग्राफ भी एक ही शब्दों से शुरू होता और एक ही शब्दों पर समाप्त हो रहा था। इस पर पीठ ने नाराजगी जताई।
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बॉम्बे हाईकोर्ट।
- फोटो : ANI
विस्तार
आपराधिक मामलों में चार्जशीट तैयार करते समय गवाहों के बयान कॉपी-पेस्ट करने पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुलिस जांच अधिकारियों द्वारा गवाहों के बयानों की नकल करने को न्याय प्रणाली के लिए खतरा बताया। पीठ ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार इस खतरनाक संस्कृति पर पुलिस विभाग को निर्देश जारी करे।
औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और न्यायमूर्ति संजय देशमुख की पीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान चार्जशीट को देखा तो गवाहों के बयान इतने समान थे कि पैराग्राफ भी एक ही शब्दों से शुरू होता और एक ही शब्दों पर समाप्त हो रहा था। पीठ ने कहा कि यदि पुलिस गंभीर मामलों में भी इस तरह से लापरवाही बरत रही है तो यह आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
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अदालत ने कहा कि अब समय आ गया है कि इसका स्वत: संज्ञान लिया जाए और इस बात पर विचार किया जाए कि जांच अधिकारियों के ऐसे कॉपी-पेस्ट बयान दर्ज करने से क्या कमियां या कठिनाइयां होती हैं? पीठ ने राज्य सरकार से कहा कि वह पुलिस अधिकारियों के लिए विशिष्ट दिशा-निर्देश जारी करे कि बयान किस प्रकार दर्ज किया जाना चाहिए।
17 वर्षीय युवक को आत्महत्या के लिए कथित रूप से उकसाने के आरोप में दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने की मांग को लेकर कुछ व्यक्तियों लोगों की ओर से दायर याचिका पर पीठ सुनवाई कर रही थी। चार्जशीट देखने के बाद पीठ ने पाया कि गंभीर अपराध में भी जांच अधिकारी ने गवाहों के बयानों को शब्दशः कॉपी-पेस्ट किया था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यहां तक कि पैराग्राफ भी उन्हीं शब्दों से शुरू होते हैं और उन्हीं शब्दों पर खत्म होते हैं। कॉपी-पेस्ट बयानों की संस्कृति खतरनाक है और कुछ मामलों में अनावश्यक रूप से आरोपी को लाभ पहुंचा सकती है। ऐसी परिस्थितियों में वास्तविक मामले की गंभीरता खत्म हो सकती है। अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या पुलिस ने गवाहों को बयान दर्ज करने के लिए बुलाया भी था?
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उच्च न्यायालय ने आरोपी को कोई राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि यह एक गंभीर अपराध है। उच्च न्यायालय ने अधिवक्ता मुकुल कुलकर्णी को सहायता के लिए नियुक्त किया। साथ ही उनसे आंकड़े एकत्र करने और सरकार द्वारा ऐसे उपायों के बारे में सुझाव देने को कहा, जिससे ऐसी प्रथाओं को रोका जा सके। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 27 जून को तय की।
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औरंगाबाद पीठ के न्यायमूर्ति विभा कंकनवाड़ी और न्यायमूर्ति संजय देशमुख की पीठ ने एक आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान चार्जशीट को देखा तो गवाहों के बयान इतने समान थे कि पैराग्राफ भी एक ही शब्दों से शुरू होता और एक ही शब्दों पर समाप्त हो रहा था। पीठ ने कहा कि यदि पुलिस गंभीर मामलों में भी इस तरह से लापरवाही बरत रही है तो यह आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
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अदालत ने कहा कि अब समय आ गया है कि इसका स्वत: संज्ञान लिया जाए और इस बात पर विचार किया जाए कि जांच अधिकारियों के ऐसे कॉपी-पेस्ट बयान दर्ज करने से क्या कमियां या कठिनाइयां होती हैं? पीठ ने राज्य सरकार से कहा कि वह पुलिस अधिकारियों के लिए विशिष्ट दिशा-निर्देश जारी करे कि बयान किस प्रकार दर्ज किया जाना चाहिए।
17 वर्षीय युवक को आत्महत्या के लिए कथित रूप से उकसाने के आरोप में दर्ज की गई एफआईआर को रद्द करने की मांग को लेकर कुछ व्यक्तियों लोगों की ओर से दायर याचिका पर पीठ सुनवाई कर रही थी। चार्जशीट देखने के बाद पीठ ने पाया कि गंभीर अपराध में भी जांच अधिकारी ने गवाहों के बयानों को शब्दशः कॉपी-पेस्ट किया था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि यहां तक कि पैराग्राफ भी उन्हीं शब्दों से शुरू होते हैं और उन्हीं शब्दों पर खत्म होते हैं। कॉपी-पेस्ट बयानों की संस्कृति खतरनाक है और कुछ मामलों में अनावश्यक रूप से आरोपी को लाभ पहुंचा सकती है। ऐसी परिस्थितियों में वास्तविक मामले की गंभीरता खत्म हो सकती है। अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या पुलिस ने गवाहों को बयान दर्ज करने के लिए बुलाया भी था?
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उच्च न्यायालय ने आरोपी को कोई राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि यह एक गंभीर अपराध है। उच्च न्यायालय ने अधिवक्ता मुकुल कुलकर्णी को सहायता के लिए नियुक्त किया। साथ ही उनसे आंकड़े एकत्र करने और सरकार द्वारा ऐसे उपायों के बारे में सुझाव देने को कहा, जिससे ऐसी प्रथाओं को रोका जा सके। पीठ ने मामले की अगली सुनवाई 27 जून को तय की।
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