Election 2023: राजस्थान-छत्तीसगढ़ में पीएम मोदी के सहारे भाजपा; वसुंधरा राजे को दरकिनार करना मुश्किल
मध्य प्रदेश में तस्वीर साफ होती नजर आ रही है। राज्य की जनता के मामा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुरे समय को पार करने की कला से खुद को संकटों से उबार लिया है।
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जन प्रतिनिधियों के जीवन में साख बड़ा महत्व रखती है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की मजबूरी इसी तरफ संकेत कर रही है। एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अगले कुछ महीने में चुनाव प्रस्तावित हैं। भाजपा ने इसकी रणनीतिक तैयारी को तेज कर दी है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भोपाल में शीर्ष नेताओं के साथ बैठक करके लौटे हैं। दूसरी तरफ राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलकर जयपुर लौटी हैं। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह भी राज्य विधानसभा चुनाव में अपने राजनीतिक भविष्य को जानने के लिए बेताब हैं। जानिए, तीनों राज्यों के भाजपा के इन बड़े चेहरों की क्या भूमिका रहने वाली है?
MP में PM मोदी और शिवराज के चेहरे पर लड़ेगी चुनाव
मध्य प्रदेश में तस्वीर साफ होती नजर आ रही है। राज्य की जनता के मामा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बुरे समय को पार करने की कला से खुद को संकटों से उबार लिया है। शिवराज के बारे में आम है कि वह वर्तमान को अच्छा बताकर भविष्य के राजनीति की दिशा तय करते हैं। अब चुनाव में बहुत कम समय बचा होने और भाजपा के पास एमपी में अपना विकल्प न होने का उन्हें पूरा फायदा मिल रहा है।
बताते हैं कि इस फायदे में कांग्रेस के नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से उनके रिश्तों की केमिस्ट्री का भी बड़ा योगदान है। सरकार की एक महिला मंत्री नाम न छापने की शर्त पर कहती हैं कि शिवराज सिंह चौहान को हमेशा अपने लक्ष्य का पता होता है। वह सपने में भी इसे नहीं भूलते और साधने के लिए तत्पर रहते हैं।
कभी भाजपा के संस्थापक लालकृष्ण आडवाणी की टीम में रहीं एक अन्य महिला नेत्री का कहना है कि शिवराज अपने प्रतिद्वंदियों को गलती करने का पर्याप्त अवसर देते हैं। यही उन्हें अंत में फायदा पहुंचा देता है। यह भी कहा जा रहा है कि आगामी विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी राज्य को पर्याप्त समय देंगे। राज्य के प्रभारी भूपेन्द्र यादव और सह प्रभारी अश्विनी वैष्णव की अगली भोपाल यात्रा में काफी कुछ स्थिति स्पष्ट होने की संभावना है।
छत्तीसगढ़ में चूक गए रमन सिंह, लीड रोल से पिछड़े
रमन सिंह तीन बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। वर्तमान में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। हार न मानने वाले नेताओं में गिने जाते हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया और भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर को राज्य का प्रभारी बनाया है। अमित शाह ने राज्य का दौरा किया था और शीर्ष नेताओं के साथ बैठक भी की।
अमित शाह का पहला लक्ष्य हर चुनावी राज्य में नेताओं के बीच में चल रही गुटबाजी को खत्म करना है। शाह ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव में गुटबाजी से हुई हार से सबक लिया है। इसी सबक ने म.प्र. में भाजपा को बड़ा दांव खेलने से रोक दिया और राजस्थान में उसे असमंजस की स्थिति में बनाए रखा है। माना जा रहा है कि छत्तीसगढ़ में भी पार्टी ने बिना मुख्यमंत्री के चेहरे के चुनाव में उतरने का मन बना लिया है। छत्तीसगढ़ में भी प्रधानमंत्री मोदी की छवि पर ही विधानसभा चुनाव लड़े जाने के आसार हैं।
पांच साल में वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं तैयार कर पाई भाजपा?
2018 में राजस्थान की तत्कालीन मुख्यमंत्री और भाजपा की नेता वसुंधरा राजे सत्ता में वापसी करने से चूक गई थी। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने राजनीतिक कौशल से राज्य के मुख्यमंत्री बन गए थे। सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री बन गए थे। पिछले पांच साल में वसुंधरा राजे ने राज्य में अपनी साख को बनाए रखा है और अर्जुन राम मेघवाल, गजेंद्र सिंह शेखावत, सतीश पूनिया समेत तमाम नेताओं पर दांव लगाने के बाद भी भाजपा का शीर्ष नेतृत्व वसुंधरा राजे का विकल्प नहीं तैयार कर सका।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सीपी जोशी कोई मजबूत छवि नहीं बना पा रहे हैं। वसुंधरा राजे के राज्य में न केवल समर्थक हैं, बल्कि अभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलकर उन्होंने अपनी राजनीतिक पकड़ का भी एहसास कराया है। वसुंधरा चाहती हैं कि राज्य में विधानसभा चुनाव उनके चेहरे पर लड़ा जाए। दीन दयाल उपाध्याय मार्ग स्थित भाजपा के नेता इसकी संभावना को काफी कम बताते हैं।
सूत्र कहते हैं कि पार्टी ने सिद्धांतिक रूप से राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में कोई चेहरा पहले घोषित न करने का मन बनाया है। पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के सचिवालय के सदस्य यहां तक कहते हैं कि अध्यक्ष जी के कार्यकाल में वसुंधरा के तेवर नरम हुए हैं। केंद्रीय मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत के निजी सचिवालय कर्मियों से वसुंधरा राजे का जिक्र करते ही तस्वीर साफ हो जाती है। हालांकि, इस समय राज्य में अर्जुन राम मेघवाल के साथ केन्द्रीय नेतृत्व खड़ा है। इन सबके बावजूद भाजपा के नेता राजस्थान में वसुंधरा के प्रभाव को मानते हैं। फिलहाल वसुंधरा खेमे में दो दर्जन से अधिक विधायक बताए जाते हैं।
वसुंधरा राजे की अहमियत को कम करके नहीं देखती भाजपा
राजस्थान विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान शुक्रवार को वसुंधरा राजे और कांग्रेस नेता सचिन पायलट के बीच दुआ सलाम और गुफ्तगू की चर्चा भी खूब रही। पूछने पर इसे शिष्टाचार भेंट बताया गया। वसुंधरा की हैसियत को लेकर एक उदाहरण और दिया जा रहा है। भाजपा को महामहिम गुलाब चंद कटारिया के राज्यपाल बनने के बाद राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष चुनना था।
राजेंद्र सिंह राठौड़ को पार्टी ने इसके लिए उपयुक्त समझा। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया उपनेता के तौर पर चुने गए, लेकिन राजेन्द्र सिंह राठौड़ को नेता प्रतिपक्ष बनाने के लिए वसुंधरा की रजामंदी लेना पार्टी ने जरूरी समझा।
राजस्थान के एक विधायक नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि वह (वसुंधरा) विधानसभा में होती हैं तो उनका वजन मालूम पड़ता है। ऐसे में इसकी संभावना काफी कम है कि भाजपा राजस्थान में वसुंधरा राजे को नेपथ्य में रखने की रणनीति बनाए। वसुंधरा खेमे के नेताओं में भी इसी को लेकर उत्साह है। झुंझनू के एक नेता कहते हैं कि सत्ता में वापसी के लिए वसुंधरा को महत्व देना मजबूरी है। हालांकि वह कहते हैं कि अब इसका स्वरूप क्या होगा यह तो दिल्ली ही तय करेगी।