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भाजपा के विजय रथ को रोक सकता है 'किसान आंदोलन', जिद और राजनीतिक नुकसान में से कौन छूटेगा पीछे

Sat, 02 Jan 2021 07:23 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Sat, 02 Jan 2021 07:23 PM IST
सार

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2022 में होंगे। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भाजपा की स्थिति खराब है। अगर भारतीय किसान यूनियन इस आंदोलन को जारी रखती है तो आगामी चुनाव में योगी सरकार को सीटों का भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है...

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BJP stubbornness on Farmers Protest could be lead to political loss in upcoming elections
गाजीपुर बॉर्डर पर प्रदर्शन करते किसानों की तस्वीर - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

विस्तार

'किसान आंदोलन' को लेकर केंद्र सरकार की जिद साफ दिखाई पड़ रही है। कानून वापस नहीं होंगे, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा के सीनियर नेताओं द्वारा दिए जा रहे बयान कुछ ऐसा ही इशारा कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि किसान आंदोलन, भाजपा के विजय रथ को रोक सकता है। पार्टी को अपनी जिद और संभावित राजनीतिक नुकसान में से किसी एक को चुनना होगा। यानी इनमें से एक का पीछे छूटना लगभग तय है। पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं, राजस्थान में 2023 में तो उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का चुनावी बिगुल 2022 में बज उठेगा।

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हरियाणा में चूंकि विधानसभा चुनाव 2024 में हैं, इसलिए पार्टी यहां पर किसानों के विरोध को अनदेखा कर रही है। खास बात, प्रदेश में मुख्यमंत्री एमएल खट्टर कह चुके हैं कि हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी की जो शिकस्त हुई है, उसके लिए किसान आंदोलन काफी हद तक जिम्मेदार है।
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उत्तर भारत के राज्यों की राजनीति पर पैनी निगाह रखने वाले शोधार्थी और पत्रकार रविंद्र सैनी बताते हैं, भाजपा को कई राज्यों में किसान आंदोलन का खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। हरियाणा को लेकर भाजपा की केंद्रीय इकाई अभी गंभीर नहीं है, जबकि मुख्यमंत्री यह मान चुके हैं कि किसान आंदोलन पार्टी को नुकसान पहुंचा रहा है। यहां पर खुफिया महकमे की उस रिपोर्ट का उल्लेख करना जरूरी होगा, जिसमें कहा गया है कि प्रदेश के भाजपा एवं जजपा विधायकों को विधानसभा क्षेत्रों में जाने के दौरान अपने साथ पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था रखनी चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि आम लोगों में भाजपा एवं जजपा के जनप्रतिनिधियों के प्रति भारी गुस्सा व्याप्त है। इसके बाद भी केंद्रीय नेतृत्व सचेत नहीं हो रहा। हो सकता है कि उनके दिमाग में यह बात हो कि अभी चुनाव में तीन साल बाकी हैं, इसलिए बाद में देखा जाएगा।
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हरियाणा की बात करें तो यहां किसान आंदोलन का नुकसान केवल भाजपा को है। वजह, यह पार्टी करीब एक दशक से ग्रामीण इलाकों में अपना जनाधार मजबूत करने में जुटी है। तमाम प्रयासों के बाद भी ग्रामीण इलाकों में भाजपा की पकड़ ठोस नहीं बन सकी है। बड़ोदा विधानसभा उपचुनाव की हार और उसके बाद स्थानीय निकाय के चुनावों में मिली करारी शिकस्त, यह समझने के लिए काफी है कि प्रदेश का मौजूदा राजनीतिक माहौल भाजपा के पक्ष में नहीं है।

रविंद्र के मुताबिक, किसान आंदोलन का लाभ कांग्रेस पार्टी को मिल रहा है। हालांकि वह आंदोलन में सक्रिय तौर से भाग नहीं ले रही है। प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं किसान नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा किन्हीं कारणों से इस आंदोलन के साथ दूरी बनाकर चल रहे हैं। अंदर की बात करें तो इस आंदोलन में हुड्डा को फायदा हो रहा है। अगर हुड्डा चाहते तो वह पंजाब की तर्ज पर दिल्ली की सीमाओं को हरियाणा के किसानों से बंद करा सकते थे। इतना तय है कि ये आंदोलन उत्तरी भारत की राजनीतिक चाल को एक नई दिशा प्रदान कर सकता है। अगर कांग्रेस पार्टी इस आंदोलन को आगे तक भुना पाती है तो चुनाव में भाजपा को भारी नुकसान संभावित है।

पंजाब में भाजपा ने यह घोषणा की थी कि पार्टी 2022 का विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी, अब वहां भी पेंच फंस जाएगा। भाजपा की सहयोगी पार्टी अकाली दल ने किसानों के मसले पर अलग होने की घोषणा कर दी है। कांग्रेस पार्टी, कहीं न कहीं किसानों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन देती हुई नजर आ रही है। कैप्टन अमरेंद्र कह चुके हैं कि वे 2022 का चुनाव लड़ेंगे। भाजपा यहां 'एकला चलो' की नीति पर आगे बढ़ती है तो उसे भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

राजस्थान में किसान नेता रामपाल जाट, जो प्रदेश की राजनीतिक नब्ज को अच्छे से पहचानते हैं, उनका कहना है कि प्रदेश में भाजपा को भारी नुकसान होने जा रहा है। प्रदेश में 2023 के दौरान विधानसभा चुनाव होने हैं। अभी यहां कांग्रेस की सरकार है। किसानों के मसले पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बहुत संभलकर चल रहे हैं। मौजूदा माहौल को देखें तो आगामी चुनाव में भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं रहेगी, अगर किसान आंदोलन को लेकर पार्टी की जिद में कोई बदलाव नहीं आता है तो। पार्टी को यहां राजनीतिक फायदा लेना है तो उसे नए कृषि कानूनों को रद्द करना होगा।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2022 में होंगे। पश्चिमी उत्तरप्रदेश में भाजपा की स्थिति खराब है। अगर भारतीय किसान यूनियन इस आंदोलन को जारी रखती है तो आगामी चुनाव में योगी सरकार को सीटों का भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।

इसी तरह उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में शासन चला रही भाजपा सरकारों के लिए आगामी चुनाव आसान नहीं होगा। हिमाचल प्रदेश में भी अगले साल चुनाव होंगे। दिल्ली में भाजपा की हालत पहले से ही पतली है। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव 2023 में होने हैं। रविंद्र सैनी बताते हैं कि भाजपा जिस तरह से अपने विजय रथ को आगे ले जा रही है, किसान आंदोलन उसमें एक बड़े अवरोध की तरह आड़े आ रहा है। अगर केंद्र सरकार तीनों कानूनों को जारी रखने की जिद पर अड़ी रही तो पार्टी को उत्तर भारत की राजनीति में भारी नुकसान उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए।


पार्टी ने इस आंदोलन में जो रणनीति अपनाई है, यानी हराओ और थकाओ, इस थ्योरी को लेकर किसानों के अलावा दूसरे वर्गों में भी गुस्सा है। सरकार इस रणनीति पर काम कर रही है कि परेशान होकर किसान खुद ही दिल्ली छोड़ देंगे, आगामी चुनाव में यही बात पार्टी के लिए मुसीबत बन सकती है।

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