तीन राज्यों के चुनाव से पहले दलितों को लेकर भाजपा का बड़ा दांव, बनाया ये प्लान
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देश में अचानक ही अहम हो गई दलित वोट बैंक की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए भाजपा ने भी कम कस ली है। साल के अंत में तीनों भाजपा शासित राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव होना है। इन चुनावों में दलित मतदाताओं की अहमियत को देखकर भाजपा ने अपनी चुनावी बिसात तय कर ली है।
संगठन और पार्टी स्तर पर खाली पड़े दलितों के लिए आरक्षित पदों को तत्काल भरने की कवायद शुरू की गई है तो पन्ना प्रमुखों की तरह घनी दलित आबादी में मोहल्ला प्रमुख बनाकर हर घर तक पहुंच दर्ज कराने की योजना बनाई गई है। पिछले दिनों दलितों के घर खाना खाने के मामले में हुई किरकिरी से सीख लेते हुए इस मर्तबा बूथ और प्रान्त स्तर पर सहभोज, चौपाल व सामाजिक समरसता आयोजन करना तय किया गया है।
दरअसल भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों में ऐतिहासिक पूर्ण बहुमत मिलने के पीछे देश भर के लगभग 16.3 फीसदी दलितों की बड़ी जनसंख्या का वोट खुद को मिलने को बड़ा कारण माना था। लेकिन पिछले कुछ महीनों में पहले सहारनपुर में भीम आर्मी की तरफ से हिंसा, फिर एससी/एसटी एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट का डंडा चलने पर आरक्षण समाप्त करने के आरोप में 10 राज्यों में भड़की हिंसा और उस पर कांग्रेस की संविधान बचाओ मुहिम के तहत भाजपा की दलित विरोधी छवि को हवा देने की कोशिश ने पार्टी प्रबंधन को सचेत किया है। भाजपा और संघ का मानना है कि इससे उनके दलित वोट बैंक को जबरदस्त झटका लगा है।
क्या कहती है पार्टी
पार्टी के प्रवक्ता और एससी/एसटी वर्ग से आने वाले पूर्व सांसद विजय सोनकर शास्त्री कहते हैं कि दलितों और भाजपा का साथ पुराना है। संघ अपने जन्म से ही पंचनिष्ठा के नियम का पालन कर रहा है। हां इतना जरूर है कि पिछले दिनों दलितों को लेकर भाजपा की छवि खराब करने की कवायद हुई है। उसके देखते हुए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के दिशा-निर्देशन पर हम सजगता से आगे बढ़ रहे हैं।
बाहरी दिल्ली से चयनित भाजपा के दलित सांसद उदित राज कहते हैं कि दलित एकमात्र ऐसा वोट बैंक है, जो किसी भी एक्शन पर तुरंत रिएक्शन देता है। सबसे ज्यादा वोट करते हैं। लिहाजा उन्हें वरीयता देना स्वागत योग्य कदम होगा। यह भाजपा की छवि पर लगे दाग को कितना धूमिल कर पाता है, यह कहना थोड़ा कठिन होगा।
ऐसे रहेगा अहम दांव
- छत्तीसगढ़ में लगभग 31.76 फीसदी से ज्यादा दलित और आदिवासी हैं।
- राजस्थान में दलित 17 फीसदी हैं, लेकिन जाट, पिछड़े व अन्य अल्पसंख्यक मिलाकर लगभग 50 फीसदी वोट हो जाती है
- किसी भी राज्य में ये 50 फीसदी आंकड़ा चुनावी बिसात की दिशा बदल सकता है।
- मध्य प्रदेश में भी 230 सीटों में 82 सीटों पर दलित शह और मात तय करने की स्थिति में हैं।