BJP: कर्नाटक की हार से भाजपा ने बदली रणनीति, राजस्थान- मध्य प्रदेश चुनाव में कर सकती है पलटवार
भाजपा की पहचान एक ऐसी पार्टी की रही है, जो चुनाव की रणनीति बनाते वक्त जातीय समीकरणों को काफी अहमियत देती है लेकिन कर्नाटक चुनाव में कहीं ना कहीं पार्टी इस मामले में चूक गई।
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कर्नाटक चुनाव में हार के साथ ही दक्षिण भारत में भाजपा लगभग साफ हो गई है। चुनाव का शोर थमने के बाद अब भाजपा में हार के कारणों पर मंथन का दौर चल रहा है। भाजपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि कर्नाटक हार से भाजपा ने सीख ली है और इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए अपनी रणनीति में बड़े बदलाव किए हैं। भाजपा ने अपनी रणनीति में जो बदलाव किए हैं, उनका असर अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भी दिख सकता है। तो आइए जानते हैं कि आगामी दिनों में भाजपा अपनी रणनीति में क्या-क्या बदलाव कर सकती है....
स्थानीय नेतृत्व को जिम्मेदारी
भाजपा का सबसे बड़ा और लोकप्रिय चेहरा प्रधानमंत्री मोदी हैं। सत्ता में नौ साल का लंबा समय बिताने के बाद भी प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बरकरार है। अभी तक ऐसा होता आया है कि भाजपा लगभग हर राज्य चुनाव पीएम मोदी के चेहरे को आगे करके लड़ती है। कर्नाटक में भी ऐसा ही हुआ लेकिन अब भाजपा ने अपनी रणनीति में थोड़ा बदलाव किया है, जिसके तहत पीएम मोदी के साथ ही भाजपा स्थानीय नेतृत्व को भी जिम्मेदारी सौंपेगी।
इस साल के अंत में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा स्थानीय नेताओं को आगे करेगी। साथ ही किसी एक चेहरे पर भी चुनाव प्रचार को केंद्रित ना करके पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं को भी बराबर मौका दिया जाएगा। जैसे मध्य प्रदेश में सीएम शिवराज सिंह चौहान के साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया, नरेंद्र सिंह तोमर और बीडी शर्मा जैसे नेताओं को भी बराबर तवज्जो दी जाएगी। इसी तरह राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया के साथ ही गजेंद्र सिंह शेखावत और सतीश पुनिया आदि नेताओं को जिम्मेदारी दी जाएगी।
जातीय समीकरण साधने पर बढ़ेगा फोकस
भाजपा की पहचान एक ऐसी पार्टी की रही है, जो चुनाव की रणनीति बनाते वक्त जातीय समीकरणों को काफी अहमियत देती है लेकिन कर्नाटक चुनाव में कहीं ना कहीं पार्टी इस मामले में चूक गई। कर्नाटक में लिंगायत वोटबैंक भाजपा का पारंपरिक वोटबैंक रहा है लेकिन इस बार भाजपा का यह वोटबैंक बिखर गया। इसकी कई वजह रही, जिनमें प्रमुख वजह बीएस येदियुरप्पा को बीच कार्यकाल में ही पद से हटाना रहा। येदियुरप्पा, लिंगायत समुदाय के बड़े नेता हैं और उन्हें अचानक सीएम पद से हटाना कहीं ना कहीं लिंगायत समुदाय को नाराज कर गया। साथ ही जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी जैसे नेताओं के पार्टी छोड़ने से भी भाजपा के जातीय समीकरण बिगड़े। अब आगामी चुनाव में भाजपा की कोशिश होगी कि वह अपने परंपरागत वोटबैंक को अपने साथ जोड़े रखे और साथ ही अन्य वोटबैंक को भी अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगी।
कर्नाटक चुनाव में भाजपा की हार का एक प्रमुख कारण उसका विकास के मुद्दों और राज्य सरकार द्वारा किए गए कामों का प्रचार नहीं करना भी रहा। भाजपा ने कर्नाटक चुनाव के लिए अपना घोषणा पत्र जारी किया था लेकिन उसके घोषणा पत्र में विकास के वादों या पूर्व में किए गए कामों की उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी बजरंग दल, बजरंग बली और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दों की हुई। वहीं कांग्रेस ने इस मामले में संतुलन साधा। कांग्रेस के घोषणा पत्र की कई योजनाओं ने मतदाताओं को लुभाया तो कांग्रेस ने भाजपा सरकार के भ्रष्टाचार को भी मुद्दा बनाया। इससे कांग्रेस का जनता के साथ एक जुड़ाव बना और चुनाव में उसका फायदा मिला।
मुस्लिम वोटबैंक में सेंधमारी
देश की राजनीति में मुस्लिम वोटबैंक अहम माना जाता है। अभी तक भाजपा की रणनीति में इस वोटबैंक को लगभग दरकिनार माना जाता है। हालांकि विधानसभा चुनाव में मुस्लिम वोटबैंक की अहमियत और ज्यादा बढ़ जाती है क्योंकि राज्य के चुनाव में हिंदुत्व और सांप्रदायिक राजनीति के साथ ही विकास के मुद्दे भी अहम होते हैं। ऐसे में भाजपा का कोर वोटबैंक बिखरता है और मुस्लिम वोटबैंक से दूरी भाजपा को बड़ा नुकसान करती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा ने एक खास कार्यक्रम 'मोदी मित्र' की शुरुआत की है। इस कार्यक्रम के तहत भाजपा ने 65 मुस्लिम मतदाताओं के दबदबे वाली लोकसभा सीटों की पहचान की है। भाजपा इन सीटों पर अपनी विकास योजनाओं का प्रचार करेगी और लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करेगी। पीएम मोदी की रैलियां भी इन सीटों पर आयोजित की जाएंगी, जिसकी रणनीति भी बननी शुरू हो गई है। भाजपा को कहीं ना कहीं ये समझ आ गया है कि अल्पसंख्यकों को पूरी तरह से दरकिनार करना उनके लिए नुकसानदायक है।
छोटी पार्टियों से गठबंधन
भाजपा मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए राज्य की छोटी पार्टियों से भी गठबंधन करने की तैयारी कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर भाजपा ने चुनाव पूर्व ही जेडीएस से गठबंधन कर लिया होता तो भाजपा को इससे कई सीटों का फायदा हो सकता था। मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों में भाजपा अब इस रणनीति पर काम कर रही है। मध्य प्रदेश में भाजपा जनजातीय दलों के साथ गठबंधन की कोशिश कर रही है तो राजस्थान में हनुमान बेनीवाल के साथ भाजपा गठबंधन कर सकती है। जब कई सीटों पर कुछ प्रतिशत वोटों का बदलाव नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है तो वहां छोटी पार्टियों से गठबंधन भाजपा को फायदा पहुंचा सकता है।