भाजपा को पहले से थी भनक, लोकसभा चुनावों से ठीक पहले साथ छोड़ेगी पीडीपी
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मंगलवार को सुबह राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अचानक ही पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से मिलने पहुंच जाना और उससे पहले भाजपा जम्मू-कश्मीर के प्रभारियों और प्रमुख मंत्रियों के साथ बैठक के बुलावे से संकेत मिलने लगे थे कि आजकुछ 'बड़ा' घटनाक्रम होने वाला है। यहां तक कि पार्टी की सेंकेड कमांड को भी फैसले की जानकारी नहीं थी, खुद राज्य प्रभारी राममाधव फैसले से पहले दिल्ली से बाहर थे।
मंगलवार को पार्टी मुख्यालय में भाजपा के वरिष्ठ प्रभारी के साथ जम्मू-कश्मीर समेत दूसरे विषयों पर चर्चा चल ही रही थी कि ठीक एक बजकर पचपन मिनट पर वरिष्ठ प्रभारी का फोन घनघनाता है और बामुश्किल तीन सेंकेड में फोन कट जाता है। उनके मुंह से बस इतना निकलता है कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन खत्म। एक पल के सबकुछ एकदम शांत हो जाता है, लेकिन उसके बाद वरिष्ठ प्रभारी के मुख से शब्द निकलते हैं, चलो अच्छा हुआ, देर आयद, दुरुस्त आयद। और इसके बाद ब्रेकिंग न्यूज चलाने का दौर शुरु हो जाता है।
सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल के पार्टी अध्यक्ष अमित शाह से मिलने का मकसद था कि वह कनफर्म करना चाहते थे कि गठबंधन खत्म होने और राज्यपाल शासन लगने के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था के हालातों से कैसे निबटा जाए।
सूत्र कहते हैं कि यह महज संयोग नहीं था, क्योंकि सोमवार दोपहर को ही जम्मू-कश्मीर में भाजपा के मंत्रियों के साथ राज्य यूनिट के प्रभारियों को दिल्ली समन करके बुलाया गया। वहीं जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राममाधव खुद आंध्र प्रदेश के दौरे पर थे और उन्हें दौरा छोड़ कर बीच में ही वापस आने का संदेश दिया गया। पार्टी सूत्रों का कहना है कि पार्टी की सेकेंड कमांड को फैसले की जानकारी नहीं थी, और यह फैसला टॉप लेवल पर ही लिया गया।
भाजपा के लिए यही वक्त गठबंधन से बाहर निकलने के लिए था मुफीद
वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह 23 जून को जम्मू दौरे पर जाने वाले थे, जहां वे जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि से जुड़े कार्यक्रमों में शिरकत करने वाले थे। सूत्र बताते हैं कि भाजपा को भनक थी कि सितंबर-अक्टूबर में लोकसभा चुनावों से पहले ही पीडीपी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेगी। लेकिन पत्रकार शुजात बुखारी की दिन दहाड़े हत्या और सेना के जवान औरंगजेब की शहादत से घाटी में पीडीपी के खिलाफ गुस्से का माहौल था और भाजपा के लिए यही वक्त गठबंधन से बाहर निकलने के लिए मुफीद था।
इस घटनाक्रम के थोड़ी देर बाद ही संदेश आता है कि कुछ ही देर में जम्मू-कश्मीर के प्रभारी राममाधव जी मीडिया को संबोधित करने वाले हैं। हम हड़बड़ा कर नीचे भागते हैं और देखते ही देखते वहां पत्रकारों का हूजूम एकत्र हो जाता है। वहां खड़े हो कर ऐसा लग रहा था कि जैसे सारे पत्रकार सुबह से जानते थे कि आज भाजपा और पीडीपी के तलाक की भविष्यवाणी करने वाले वे पहले 'ज्योतिषी' थे।
इसके बाद भाजपा के मीडिया हॉल में राममाधव समेत केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह और बैठक में शामिल रहे राज्य के प्रभारियों का आगमन होता है। जिसके बाद शुरू हुआ पीडीपी से समर्थन वापसी के कारणों की मार्केटिंग का दौर, जिसमें साफ-साफ दिख रहा था कि कैसे भाजपा ने अपना बचाव करते हुए पीडीपी पर सारा दोष मढ़ दिया। गठबंधन में बने रहने के बावजूद भाजपा राज्य में विकास कार्यों की बयार क्यों नहीं बहा पाई और कैसे पीडीपी पर विकास कार्यों में अड़गा लगाने की इल्जाम लगा रही है।
महबूबा सरकार राज्य को नहीं संभाल पा रही थी: राम माधव
प्रेस कॉन्फ्रेंस में राम माधव ने पीडीपी को कोसते हुए उसी राज्य सरकार पर हमला बोला जिसका हिस्सा पिछले साढ़े तीन साल से वो खुद थे। उन्होंने कहा कि 2015 में प्रधानमंत्री ने सरकार को 80 हजार करोड़ का पैकेज दिया था, जिसे बाद में बढ़ा कर एक लाख करोड़ कर दिया गया। लेकिन राज्य सरकार इसमें से केवल 35 हजार करोड़ ही विकास कार्यों पर खर्च कर पाई। उन्होंने कहा कि जम्मू कश्मीर में विकास के लिए केन्द्र सरकार ने भरपूर मदद की।
वहीं पार्टी के एक और वरिष्ठ पदाधिकारी बताते हैं कि इस साल सरकार ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 3500 करोड़ रुपए जारी किए, जिसमें 2100 करोड़ रुपए अकेले जम्मू-कश्मीर को दिए गए, लेकिन सरकार ने विकास कार्यों की अनदेखी की।
वहीं राममाधव ने कहा कि राज्य में शांति के लिए पीडीपी संग गठबंधन किया गया था और गठबंधन का नेतृत्व पीडीपी के पास था। लेकिन पीडीपी ने विकास कार्यों में अड़चन डालने का काम किया। दायित्व निभाने में महबूबा पूरी तरह से नाकाम रही। जम्मू और लद्दाख के विकास की अनदेखी की गई। ऐसे में भाजपा के मंत्री ठीक से काम नहीं कर सके। राम माधव ने कहा कि महबूबा सरकार राज्य को नहीं संभाल पा रही थी।