{"_id":"573e23554f1c1b0f25ac7571","slug":"bjp-become-stronger-than-other-but-jaya-and-mamata-still-dominant","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"भाजपा मजबूत हुई लेकिन जया और ममता को संभालना मुश्किल","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
भाजपा मजबूत हुई लेकिन जया और ममता को संभालना मुश्किल
महेश रंगराजन/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 20 May 2016 02:04 AM IST
विज्ञापन
दिल्ली में मना जीत का जश्न
- फोटो : PTI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुूचेरी विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए बेहद सकारात्मक रहे हैं। कांग्रेस की जो स्थिति बीते लोकसभा चुनाव के दौरान थी वह अब भी बरकरार है। उसके लिए हालात बदले नहीं हैं। केरल में बेशक वाम दल की सरकार बनी है मगर पश्चिम बंगाल में उसका तीसरे नंबर पर जाना सबसे बड़ा झटका है। परिणाम यह भी दर्शा रहा है कि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बरकरार रहेगा।
असम में जीत दर्ज करने और अन्य राज्यों में प्रभाव बढ़ाने के साथ भाजपा के लिए परिणाम सकारात्मक हैं। लेकिन जयललिता और ममता बनर्जी के रूप में दो शक्तिशाली नेताओं से उन्हें मुकाबला करना पड़ेगा। ये दोनों ही नेत्रियां केंद्र सरकार के इशारे पर नाचने वाली नहीं हैं। हां सरकार के कुछ कामकाज के मामले में उनका केंद्र को सहयोग हो सकता है। मगर सियासी सहयोग मिलने के आसार कम हैं। ममता ने तो क्षेत्रीय दलों को जोड़कर नई ताकत खड़ी करने की बात भी कह दी है। ऐसे ही दूसरी दफे जीतने के बाद जयललिता भी केंद्र में अपना बड़ा रोल चाहेंगी।
उनके नेतृत्व में परिपाटी तोड़ते हुए वर्ष 1984 के बाद पहली बार तमिलनाडु में किसी दल ने दोबारा से जीत दर्ज कर सत्ता में वापसी की है। इसके लिए मुख्यमंत्री जयललिता बड़े श्रेय की पात्र हैं। अपने कामकाज के उपलब्धियों के सहारे उन्होंने जोरदार वापसी की है। बीच-बीच में उनके खिलाफ हवा बनी मगर वह बाजी मारने में कामयाब रही हैं। इससे देश की राजनीति में भी उनका कद बढ़ेगा। केरल में परिणाम पुराने पैटर्न का रहा है। यहां हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता है। इस दफे भी यह क्रम जारी रहा। मगर यहां इस दफे नए नेता उभर कर सामने आएंगे। उम्मीद कम है कि अच्युतानंनदन को कमान मिले।
विज्ञापन
विज्ञापन
असम में जीत दर्ज करने और अन्य राज्यों में प्रभाव बढ़ाने के साथ भाजपा के लिए परिणाम सकारात्मक हैं। लेकिन जयललिता और ममता बनर्जी के रूप में दो शक्तिशाली नेताओं से उन्हें मुकाबला करना पड़ेगा। ये दोनों ही नेत्रियां केंद्र सरकार के इशारे पर नाचने वाली नहीं हैं। हां सरकार के कुछ कामकाज के मामले में उनका केंद्र को सहयोग हो सकता है। मगर सियासी सहयोग मिलने के आसार कम हैं। ममता ने तो क्षेत्रीय दलों को जोड़कर नई ताकत खड़ी करने की बात भी कह दी है। ऐसे ही दूसरी दफे जीतने के बाद जयललिता भी केंद्र में अपना बड़ा रोल चाहेंगी।
विज्ञापन
उनके नेतृत्व में परिपाटी तोड़ते हुए वर्ष 1984 के बाद पहली बार तमिलनाडु में किसी दल ने दोबारा से जीत दर्ज कर सत्ता में वापसी की है। इसके लिए मुख्यमंत्री जयललिता बड़े श्रेय की पात्र हैं। अपने कामकाज के उपलब्धियों के सहारे उन्होंने जोरदार वापसी की है। बीच-बीच में उनके खिलाफ हवा बनी मगर वह बाजी मारने में कामयाब रही हैं। इससे देश की राजनीति में भी उनका कद बढ़ेगा। केरल में परिणाम पुराने पैटर्न का रहा है। यहां हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता है। इस दफे भी यह क्रम जारी रहा। मगर यहां इस दफे नए नेता उभर कर सामने आएंगे। उम्मीद कम है कि अच्युतानंनदन को कमान मिले।
विज्ञापन
'ममता ने अपना जलवा बरकरार रखा'
असम जीत के बाद अमित शाह
- फोटो : PTI
पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने अपना जलवा बरकरार रखा है। ऐसा नहीं है कि पिछले 5 साल के उनके कार्यकाल में गलत कार्य नहीं हुए। बल्कि वाम और कांग्रेस की विश्वसनीयता के आगे प्रदेश की जनता ने ममता पर भरोसा करना मुनासिब समझा है। यहां कांग्रेस पार्टी अपना पुराना प्रदर्शन बचाने में फिर भी कमायाब रही है। मगर वाम को बड़ा झटका लगा है। सीताराम येचुरी का प्रयोग असफल रहा है। यह पहली दफ ा है जब वाम दल बंगाल की राजनीति में तीसरे नंबर पर चले गए हैं।
असम में भाजपा की जीत का अपना एक अलग महत्व है। गैर कांग्रेस के रूप में पहली दफा भाजपा के रूप में किसी राष्ट्रीय दल की एंट्री हुई है। इनका अपना एक एजेंडा और कामकाज का तरीका है। इससे असम की राजनीति बदलेगी। राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा को ताकत मिली है। बिहार की हार के बाद छाई मायूसी दूर होगी।
(महेश रंगराजन मशहूर राजनीतिक विश्लेषक हैं)
एम.संजय से बातचीत पर आधारित
असम में भाजपा की जीत का अपना एक अलग महत्व है। गैर कांग्रेस के रूप में पहली दफा भाजपा के रूप में किसी राष्ट्रीय दल की एंट्री हुई है। इनका अपना एक एजेंडा और कामकाज का तरीका है। इससे असम की राजनीति बदलेगी। राष्ट्रीय स्तर पर भी भाजपा को ताकत मिली है। बिहार की हार के बाद छाई मायूसी दूर होगी।
(महेश रंगराजन मशहूर राजनीतिक विश्लेषक हैं)
एम.संजय से बातचीत पर आधारित