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BJP: 'गलती का एहसास' होते ही चुनावों में चढ़ गई भाजपा, मुकाबले में मजबूत वापसी

Sun, 12 Nov 2023 03:22 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Sun, 12 Nov 2023 03:22 PM IST
सार

भाजपा के लिए सबसे बड़ा दांव मध्य प्रदेश में लगा हुआ है जहां वह लगभग दो दशक से सरकार में है। चुनावों की शुरुआत से ही यहां पार्टी को कड़े एंटी इनकमबेंसी फैक्टर का सामना करना पड़ रहा था।

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BJP Assembly Elections strategy replenished as Polling in Major states begin against Opposition news and updat
पीतांबरा देवी के रथ को खींचते शिवराज सिंह चौहान और वसुंधरा राजे। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इस समय चल रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाई थी। इस रणनीति को ध्यान में रखते हुए ही पार्टी ने इन राज्यों के स्थानीय कद्दावर नेताओं को दरकिनार करना शुरू कर दिया था। लेकिन इस रणनीति से कोई लाभ नहीं मिल रहा था। उलटे स्थानीय नेताओं की नाराजगी की ख़बरों ने उसकी संभावनाओं को काफी चोट पहुंचाई। फिलहाल, देर से ही सही, भाजपा ने अपनी रणनीतिक गलती को समझा और स्थानीय नेताओं को महत्त्व देना शुरू कर दिया। इसका यह परिणाम हुआ है कि वह मुकाबले में एक बार फिर मजबूत वापसी करती दिखाई पड़ रही है। भाजपा को रणनीति में बदलाव का कितना लाभ मिलेगा, यह अभी से कह पाना मुश्किल है, लेकिन इस बदलाव ने चुनावों को काफी रोचक बना दिया है। 
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मध्य प्रदेश में पार्टी की स्थिति सुधरी 
भाजपा के लिए सबसे बड़ा दांव मध्य प्रदेश में लगा हुआ है जहां वह लगभग दो दशक से सरकार में है। चुनावों की शुरुआत से ही यहां पार्टी को कड़े एंटी इनकमबेंसी फैक्टर का सामना करना पड़ रहा था। पार्टी ने यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह तक को किनारे लगा रखा था तो ऐसे संकेत दिए गए जिससे कैलाश विजयवर्गीय और नरेंद्र सिंह तोमर तक को अगले सीएम की रेस में माना जाने लगा। शिवराज सिंह को तो टिकट मिलेगा या नहीं, इस बात पर भी संदेह किया जा रहा था। इससे पार्टी चुनावों में पिछड़ने लगी। अंत में पार्टी ने शिवराज सिंह को आगे करने की नीति अपनाई।
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मध्य प्रदेश की राजनीति के जानकार मानते हैं कि भाजपा यहां मुकाबले में वापस लौट चुकी है। अभी से यह कहना तो संभव नहीं है कि ऊंट किस करवट बैठेगा, लेकिन यह अवश्य तय हो गया है कि पार्टी यहां अपनी प्रतिद्वंदी कांग्रेस से बहुत पीछे नहीं है। कई विषम फैक्टर के बाद भी यदि भाजपा एक बार फिर यहां की लड़ाई में वापस आ गई है तो यह उसके लिए संतोषजनक बात है। 
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छत्तीसगढ़ में भी स्थिति बेहतर हुई 
राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र कुमार सिंह ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा ने पिछले पांच साल में राज्य की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। उसके पास न कोई नेता था और न ही कोई नीति। इसका परिणाम हुआ कि कार्यकर्ता भी निराश होकर घरों में बैठ गए। स्थिति यह बन रही थी कि भाजपा इस चुनाव में दहाई के आंकड़े तक पहुंच पाएगी या नहीं, यह भी कोई विशवास के साथ नहीं कह पा रहा था। यह स्थिति तब हो रही थी जब भाजपा के पास भूपेश बघेल सरकार के खिलाफ शराब घोटाले के साथ-साथ कई बड़े मुद्दे उपलब्ध थे। 

अंततः भाजपा ने रमन सिंह को मुख्यधारा में सामने किया। अब पार्टी की स्थिति में कुछ सुधार हुआ है। अब भी वह जीत की स्थिति में नहीं है, लेकिन पिछले चुनाव के मुकाबले में वह काफी मजबूत स्थिति में आ चुकी है। इससे विधानसभा चुनाव में ही नहीं, लोकसभा चुनावों में भी भाजपा को लाभ मिल सकता है।  


राजस्थान में भी गलती सुधारी 
इन चुनावों में भाजपा को सबसे अधिक उम्मीद राजस्थान से है। यहां के हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन के इतिहास से भी उसकी उम्मीदों को बल मिल रहा था। लेकिन अपनी रणनीति के तहत भाजपा ने यहां किसी नेता को प्रोजेक्ट नहीं किया। वसुंधरा राजे सिंधिया, सतीश पूनिया, गजेंद्र सिंह शेखावत के साथ-साथ अर्जुनराम मेघवाल तक को यहां अगले मुख्यमंत्री के दावेदारों के रूप में देखा जा रहा है। वसुंधरा का लंबे समय तक टिकट तक क्लियर न करने से बहुत नकारात्मक सन्देश गया। लोगों को भ्रम हुआ कि भाजपा वसुंधरा राजे को किनारे लगाना चाहती है। इससे खुद वसुंधरा भी साइलेंट हो गई तो उनके समर्थक भी चुप हो गए। माना जा रहा है कि इससे भाजपा को खासा नुकसान होने का डर सताने लगा और अंत समय में उसने वसुंधरा को मैदान में उतारा। अब पार्टी एक बार फिर राजस्थान में मजबूत लड़ाई लड़ रही है। 
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