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खट्टर का ताज डोल गया, राजनेता नहीं, डिप्टी कलेक्टर बनकर राज करना पड़ गया महंगा

Thu, 24 Oct 2019 07:40 PM IST
आसिम खान जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली  Published by: आसिम खान Updated Thu, 24 Oct 2019 07:40 PM IST
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BJP and CM Manohar Lal Khattar slogan of more than 75 seats failed in Haryana
मनोहर लाल खट्टर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

हरियाणा विधानसभा चुनाव के जो नतीजे आ रहे हैं, वे भाजपा और खासतौर पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के लिए तो किसी भी तरह से उत्साहवर्धक नहीं हैं। खट्टर का नारा कि इस बार 75 पार, पूरी तरह धराशाही हो गया है। उनके द्वारा तैयार की गई सोशल इंजीनियरिंग भी फेल हो गई। खट्टर सरकार के पांच कैबिनेट मंत्री हार के करीब पहुंच रहे हैं। 

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प्रदेश की राजनीति के जानकारों का कहना है कि खट्टर का ताज डोलने के पीछे एक बड़ी वजह यह निकलकर सामने आ रही है कि उन्होंने पांच साल तक राजनेता की हैसियत से नहीं, बल्कि एक डिप्टी कलेक्टर की तरह राज किया है। भाजपा कार्यकर्ताओं और आम लोगों से दूरी बनाकर चलना खट्टर को महंगा पड़ गया है। 2014 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मनोहर लाल खट्टर ने एक कठोर प्रशासक की तरह काम करना शुरू किया तो उनके मंत्री भी उसी राह पर चल पड़े। नतीजा, आज अधिकांश मंत्री हार की कगार पर हैं। 
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पर्ची और खर्ची बंद तो हुई मगर व्यवहार प्रशासक वाला बना रहा
प्रदेश की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले शोधार्थी रविंद्र कुमार सैनी बताते हैं, ऐसा नहीं है कि खट्टर का राज दूसरी पार्टियों से खराब रहा है। उन्होंने कई सारे अच्छे फैसले लिए हैं। जैसे प्रदेश का शिक्षा विभाग, जो कि नौकरी और तबादले के लिए भ्रष्टाचार का केंद्र माना जाता था, खट्टर ने आते ही सबसे पहले इसी विभाग की सुध ली। तबादला नीति पूरी तरह ऑनलाइन कर दी गई। 
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अध्यापक, जिसे पहले तबादला कराने के लिए पर्ची और खर्ची का सहारा लेना पड़ता था, आज वे घर बैठकर अपना तबादला करा लेते हैं। सभी को मन मुताबिक सेंटर मिल रहा है। इसी तरह नौकरियां देने के मामले में भी काफी हद तक पारदर्शिता आई है। पर्ची और खर्ची का दौर बहुत हद तक बंद हुआ है, मगर खट्टर जनता के प्रति एक राजनेता वाला व्यवहार नहीं बना सके। वे एक कठोर प्रशासक की भांति काम करते रहे। 

चूंकि उनसे पहले प्रदेश में दस साल तक मुख्यमंत्री रहे भूपेंद्र सिंह हुड्डा का आम जनता के साथ मेलजोल वाला रसूख रहा है। वे दिल्ली और चंडीगढ़ में लोगों से नियमित तौर पर मिलते थे। कोई भी व्यक्ति उनसे संपर्क कर सकता था। जब हुड्डा व्यस्त होते तो उनके पुत्र दीपेंद्र हुड्डा लोगों की समस्याओं का निवारण करते थे। 

लोगों का मानना है कि उनके राज में पर्ची और खर्ची भी खूब चलती थी। जब खट्टर मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं की पर्चियां लेना भी बंद कर दिया। किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में उनका सुरक्षा घेरा ऐसा रहता था कि कोई आम जन उनसे मिलने की सोच ही नहीं सकता था। 

मंत्री अपने हल्के के लोगों से भी नहीं करते थे बात
बतौर रविंद्र कुमार, खट्टर सरकार में जो नेता मंत्री बने थे, वे भी एक तरह से अहंकार में आ गए। जैसे वित्त मंत्री रहे कैप्टन अभिमन्यु और कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ सहित अधिकांश मंत्री जनता से कटे रहे। वे केवल सार्वजनिक कार्यक्रमों में ही किसी से मिलते थे। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों का व्यवहार आम लोगों के प्रति सौहार्दपूवर्क नहीं रहा। लोकसभा चुनाव में चूंकि मोदी फैक्टर और सोशल इंजीनियरिंग, दोनों काम कर थे, इसलिए तब भाजपा को लोगों की अंदरखाते चल रही नाराजगी का आभास नहीं हुआ। 

भाजपा को दस में दस सीटें मिल गईं। अब विधानसभा चुनाव में लोगों की वह नाराजगी प्रत्यक्ष तौर पर सामने आ गई। लोकसभा चुनाव में जाट और गैर-जाट का मुद्दा भी छाया रहा। कहीं न कहीं इस मुद्दे ने कांग्रेस को भरपूर फायदा पहुंचाया। चूंकि जिन लोगों से खट्टर सरकार की दूरी रही, उनमें केवल जाट ही नहीं, बल्कि गैर जाट भी शामिल थे। गैर जाटों की सुनवाई भी नहीं हो रही थी। इसी वजह से विधानसभा चुनाव में भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग नहीं चल पाई। गैर जाटों ने भाजपा प्रत्याशियों से दूरी बनाकर उन उम्मीदवारों को समर्थन दिया, जिन्हें वे अपना समझते थे। 


यह अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रदेश में करीब 24 प्रतिशत की संख्या वाले जाट समुदाय के ज्यादातर वोट हुड्डा के पक्ष में चले गए। बाकी बचे वोट जजपा को मिले। जाटों के वोट बंट गए, लेकिन दूसरी ओर भाजपा गैर-जाटों का पूर्ण समर्थन हासिल नहीं कर सकी। खास बात रही कि कांग्रेस और जजपा के कई गैर जाट उम्मीदवार भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग फेल होने के चलते जीत दर्ज करा रहे हैं। 

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