चुनाव से पहले हिंदुत्व और जाति कार्ड के ट्रैक पर आगे बढ़ी भाजपा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दो साल पहले नरेन्द्र मोदी जब लोकसभा चुनावों में जनता के सामने आए थे तो उन्होंने अपना विकास का मॉडल सामने रखकर ही वोट मांगे थे। लोगों ने भी विकास की चाह में जाति बिरादरी को दरकिनार कर उन्हें दिल खोलकर वोट दिए।
भाजपा का यह प्रयोग सफल होने के बाद माना जा रहा था कि पार्टी आगामी चुनावों में भी इसी लीक पर आगे बढ़ेगी लेकिन उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनावों की तैयारियों को देखते हुए लग रहा है पार्टी अपने पुराने ट्रैक पर ही वापस लौट रही है।
यूपी में जिन केशव प्रसाद मौर्या को पार्टी ने राज्य की कमान सौंपी है वह हिंदुत्व का मुखर चेहरा रहे हैं तो पंजाब में केन्द्रीय मंत्री सांपला के सहारे भाजपा राज्य की बड़ी दलित आबादी में सेंध लगाने की तैयारी में है। कुछ ऐसा ही कर्नाटक में भी है जहां पार्टी ने राज्य के सबसे मजबूत लिंगायत समुदाय के प्रमुख नेता और पूर्व मुख्यमंत्री येदुरप्पा को पार्टी अध्यक्ष बनाकर चुनावों की बागडोर उनके हाथों ही सौंप दी है। आइए तीनों राज्यों में भाजपा की चुनावी रणनीति और अध्यक्षों के महत्ता पर डालते हैं एक निगाह।
केशव प्रसाद के सहारे हिंदुत्व की धार तेज करेगी भाजपा
साल 1992 में जब भाजपा के दिग्गज नेताओं के नेतृत्व में कार सेवकों के जत्थे ने बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को ढहा दिया था तो हाथों में भगवा झंडा लिए उस भीड़ में एक युवा भी शामिल था। 23 साल का विहिप का वह तेजतर्रार कार्यकर्ता उसके बाद हिंदुत्व से जुड़े हर मुद्दे पर आगे खड़ा दिखता था। आज उसी कार्यकर्ता के हाथ में भाजपा ने देश के सबसे महत्वपूर्ण सूबे की कमान दे दी है।
डेढ़ दशक से ज्यादा के राजनीतिक वनवास के बाद भाजपा उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सत्ता में लौटने के लिए बेचैन है। पार्टी की उम्मीदें इसलिए भी ज्यादा हैं क्योंकि दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में इसी राज्य ने उसे एकतरफा बढ़त देकर पूर्ण बहुमत का रास्ता साफ किया था।
भाजपा ने यूपी में केशव प्रसाद मौर्या को अध्यक्ष बनाकर एक साथ कई लक्ष्यों को भेदने की तैयारी कर ली है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उत्तर प्रदेश में जीत के लिए पार्टी का सबसे बड़ा हथियार आज भी हिंदुत्व ही है। यही कारण है कि गाहे बगाहे घर वापसी, लव जिहाद जैसे मुद्दों को हवा दी जाती रही है।
पार्टी के इसी पैमाने पर केशव प्रसाद मौर्या खरे उतरते हैं क्योंकि विहिप से जुड़े होने के कारण वह स्वभाविक रूप से हिंदुत्व का चेहरा तो हैं लेकिन उस कट्टर हिंदुत्व का नहीं जिसकी नुमाइंदगी फायरब्रांड कहे जाने वाले महंत आदित्यनाथ, विनय कटियार, साक्षी महाराज, साध्वी निरंजन ज्योति और साध्वी प्राची करते हैं।
पार्टी को इस बात का भी एहसास है कि हिंदुत्व के प्रति हद से ज्यादा कट्टरता उसे फायदे के बजाय नुकसान भी पहुंचा सकती है क्योंकि इससे दूसरे पक्षों में तीखी प्रतिक्रिया भी हो सकती है। दूसरा फैक्टर जाति का है, केशव प्रसाद उसी पिछड़ा वर्ग से आते हैं जिसकी तादाद राज्य में सबसे ज्यादा है।
मौर्या जिस काछी बिरादरी से आते हैं उसकी तादाद भी राज्य में चार फीसदी के करीब है। मतलब साफ है भाजपा केशव प्रसाद मौर्या को उसी हिंदुत्व और पिछड़े नेता के तौर पर स्थापित करना चाहती है जिस तरह कभी कल्याण सिंह उसके पोस्टर ब्वाय हुआ करते थे। लोध बिरादरी के कल्याण सिंह की पिछडों में अच्छी पैंठ थी तो उनका जोशीला चेहरा प्रखर हिंदुत्व की नुमाइंदगी भी करता था।
पंजाब में आप की काट के लिए दलितों के भरोसे भाजपा
लोकसभा चुनावों से पूर्व तक 54 साल के विजय सांपला का नाम शायद ही किसी ने सुना हो। चुनावों में जीत दर्ज करने के बाद जब प्रधानमंत्री मोदी ने इस अंजान से चेहरे को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी तब भी लोग इसी सवाल में उलझे रहे कि ऐसा क्यों। लेकिन एक झटके में ही अमित शाह ने कल इन सवालों का जवाब दे दिया।
पंजाब में दलित समुदाय के विजय सांपला को भाजपा ने पार्टी की कमान सौंपकर बड़ा दांव खेला है। दिहाड़ी मजदूर से खाड़ी देश में प्लंबर और फिर अपने गांव के सरपंच से केन्द्रीय मंत्री तक का सफर तय करने वाले विजय सांपला को पार्टी का नेतृत्व सौंपकर भाजपा ने साफ कर दिया है कि उसकी निगाहें राज्य की सबसे बड़ी आबादी दलित पर है।
फीसदी के हिसाब से पंजाब में दलितों की आबादी देश में सबसे ज्यादा 33 फीसदी है। लेकिन अभी तक यह पार्टी राज्य में एक तरह से नेतृत्वविहीन ही रही है। बसपा के संस्थापक काशीराम पैदा पंजाब में हुए लेकिन उन्होंने कर्मभूमि उत्तर प्रदेश को बनाया। हालांकि एक दौर में बसपा ही यहां दलितों की नुमाइंदगी करती थी।
1992 में हुए विधानसभा चुनावों में बसपा के नौ विधायक चुने गए लेकिन काशीराम के पंजाब की बजाय उत्तर प्रदेश में ध्यान देने के कारण राज्य में पार्टी की स्थिति लगातार खराब होती गई। 2007 के चुनाव में तो बसपा के दो ही प्रत्याशी अपनी जमानत बचा पाए थे, साफ था कि दलित बसपा के हाथ से छूटकर दाएं बाएं छितर चुके थे।
अब उन्हीं छितरे वोटों पर भाजपा की निगाहें टिकी हैं। भाजपा की बड़ी दिक्कत ये भी है कि राज्य में आप का ग्राफ तेजी से बढ़ा है और उसके पीछे दलितों के लामबंद होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में भाजपा भी इसी एकमुश्त वोट को अपने पक्ष में करने की कवायद में लग गई है।
होशियारपुर से सांसद विजय सांपला ने काफी तेजी से राजनीति में अपनी पहचान बनाई है, वह पंजाब से भाजपा के पहले मंत्री हैं तो इस पद पर पहुंचने वाले पहले दलित नेता। भ्रष्टाचार और नशे के चंगुल से जूझ रहे पंजाब में अकाली दल के साथ सत्ता में शामिल भाजपा की हालत अभी खस्ता ही है लेकिन उसे उम्मीद है कि 33 फीसदी आबदी के सहारे विजय सांपला यहां उसका बेड़ा पार कर सकते हैं।
कर्नाटक में येदुरप्पा और लिंगायत के सहारे भाजपा
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव यूं तो दो साल बाद होने हैं लेकिन भाजपा ने तैयारी अभी से शुरू कर दी है। दक्षिण भारत में कर्नाटक ही पहला राज्य है जहां भाजपा अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार बना चुकी है। उस समय भाजपा ने कर्नाटक के असरदार लिंगायत समुदाय के सबसे प्रमुख नेता बीएस येदुरप्पा के नेतृत्व में यहां सरकार बनाई थी। लेकिन जल्द ही खनन घोटाले में नाम आने के कारण पार्टी ने येदुरप्पा से इस्तीफा ले लिया था।
जिसके बाद पार्टी से विवाद के चलते येदुरप्पा ने भाजपा छोड़कर कर्नाटक जनता पार्टी नाम से अलग दल बनाया था। पार्टी ने बेशक अनुशासन के नाम पर येदुरप्पा से इस्तीफा लिया हो लेकिन उसे इसका खामियाजा भी उठाना पड़ा। 2013 के विधानसभा चुनावों में पार्टी सत्ता से बेदखल होकर तीसरे नंबर पर पहुंच गई। जबकि अलग दल बनाने वाले येदुरप्पा ने दस फीसदी वोट बटोरे और उसके छह विधायक विधानसभा में पहुंच गए।
तमाम उतार चढ़ाव के बाद जनवरी 2014 में येदुरप्पा की वापसी हुई और भाजपा ने राज्य की 17 लोकसभा सीटें अपने नाम कर ली। अब एक बार फिर पार्टी उन्हीं की शरण में है। कर्नाटक में पिछड़े वर्ग के दो समुदाय सबसे ज्यादा ताकतवर माने जाते हैं लिंगायत और वोक्कालिगा। लिंगायत समुदाय की आबादी 19 फीसदी है तो वोक्कलिगा की 18 फीसदी।
येदुरप्पा लिंगायत समुदाय से आते हैं और इसे एकमुश्त येदुरप्पा के पीछे माना जाता है। 2008 के विधानसभा चुनावों में बीएस येदुरप्पा ने लिंगायत और वोकल्लिगा समुदाय के वोटों के बल पर पहली बार कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनवा दी थी।
2013 के चुनावों में वह भाजपा से अलग होकर लड़े तो उनकी पार्टी कजपा को दस फीसदी वोट मिली थी उसके पीछे भी लिंगायत समुदाय का समर्थन माना गया था। कर्नाटक के पिछडों में येदुरप्पा की मजबूत पकड़ ने ही भाजपा को दोबारा उन्हें अध्यक्ष बनाने पर मजबूर कर दिया।