Bihar: कट्टा लहराते हुए आए राजद समर्थक 'रंगदार', 'जंगल राज' बताने वाली भाजपा को इससे कितना लाभ?
राजद समर्थकों के वायरल हुए वीडियो पर भाजपा नेता अमित मालवीय ने आरोप लगाया है कि यह लालू प्रसाद यादव के 'जंगलराज की झलक' है। उन्होंने कहा है कि बिहार में 'बाहुबली और उनके गुर्गे' फिर से सत्ता में आने का सपना देख रहे हैं, लेकिन जनता अब ऐसा नहीं होने देगी। इसके पहले भी कुछ बयानों को लेकर भाजपा ने राजद को 'जंगलराज' के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की थी।
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बिहार में विधानसभा चुनावों के ठीक पहले एक नया बवाल खड़ा हो गया है। सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें भागलपुर में कुछ लोग कट्टा लहराते हुए डांस कर रहे हैं। बैकग्राउंड में 'तेजस्वी सरकार बनत, (जाति विशेष) रंगदार बनत' गाना बज रहा है। दावा किया जा रहा है कि इस मंच से राजद के कुछ कार्यकर्ता हथियार लहराते हुए जाति विशेष के रंगदार होने का दावा कर रहे हैं। इस वीडियो को ट्वीट कर भाजपा नेता अमित मालवीय ने आरोप लगाया है कि यह लालू प्रसाद यादव के 'जंगलराज की झलक' है। उन्होंने कहा है कि बिहार में 'बाहुबली और उनके गुर्गे' फिर से सत्ता में आने का सपना देख रहे हैं, लेकिन जनता अब ऐसा नहीं होने देगी। इसके पहले भी कुछ बयानों को लेकर भाजपा ने राजद को 'जंगलराज' के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की थी।
स्पष्ट है कि भाजपा इस विधानसभा चुनाव में एक बार फिर जंगलराज का मुद्दा उठाने की कोशिश कर रही है। बड़ा प्रश्न यह है कि 1990-97 के दौर में बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव के कथित जंगलराज के विरोध के सहारे भाजपा को आज कितने वोट मिलेंगे? भाजपा-जदयू की यह रणनीति कितनी सफल रहेगी? पिछले कुछ समय में बिहार में अपराध की बड़ी घटनाएं घटी हैं। ऐसे में क्या जंगलराज को मुद्दा बनाने की राह में ये अपराध रोड़ा नहीं बनेंगे। प्रश्न यह भी है कि लगभग दो दशक तक मुख्यमंत्री रहने के बाद भी भाजपा-जदयू को नीतीश सरकार के कामकाज की बजाय लालू के जंगलराज पर भरोसा क्यों है? सत्ता में वापसी के लिए उन्हें आज भी लालू प्रसाद यादव के तथाकथित जंगलराज का सहारा क्यों लेना पड़ रहा है?
राजद के नए चेहरे बन चुके तेजस्वी, लालू की छवि पीछे
2020 में राजद की चुनाव प्रचार की कमान पूरी तरह तेजस्वी यादव के हाथों में थी। नौकरी के मुद्दे पर चुनाव लड़े तेजस्वी यादव को जनता के बीच भारी जनसमर्थन दिखाई मिला था। इस बार भी विपक्ष के चुनाव प्रचार की कमान एक बार फिर तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के ही हाथों में है। वोट अधिकार यात्रा की भीड़ बताती है कि तेजस्वी-राहुल को लोग वोट कर सकते हैं। माना जा सकता है कि संभवतः आम लोग अब राजद के चेहरे के तौर पर लालू यादव की जगह तेजस्वी यादव को देखने लगे हैं। और यदि ऐसा है तो जंगलराज का मुद्दा बहुत कारगर नहीं रह सकता है।
यदि ऐसा है तो सत्ता में वापसी के लिए भाजपा-जदयू केवल जंगलराज के डर पर भरोसा नहीं कर सकते। चुनाव जीतने के लिए उन्हें अहम मोर्चों पर मजबूत दिखना होगा। इसमें युवाओं के लिए नौकरी, दूसरे राज्यों की तुलना में बिहार का विकास और जातीय संतुलन अहम हो सकता है।
'जंगलराज नहीं, नौकरी चलेगी'
राजनीतिक विश्लेषक अभिषेक रंजन ने अमर उजाला से कहा कि 'जंगलराज' का दौर देखने वालों की एक बड़ी जमात अब कम से कम 40-45 वर्ष की है। इस वर्ग की प्राथमिकताएं अलग हैं। इन चुनावों में उत्साह से वोट डालने वाले युवाओं के बड़े वर्ग ने जंगलराज का दौर देखा नहीं है। ऐसे में यह मुद्दा उन्हें बहुत अधिक अपील करेगा, यह कहना मुश्किल है। इस वर्ग को सरकारी नौकरी और रोजगार का मुद्दा ज्यादा आकर्षित करता है। पिछली बार तेजस्वी यादव ने इन्हीं मुद्दों को उठाकर भारी समर्थन हासिल किया था। हालांकि, इस बार नीतीश कुमार ने भी भारी संख्या में सरकारी नौकरी देकर इस मोर्चे पर अपने आपको मजबूत कर लिया है।
'विकास के मोर्चे पर मजबूत दिख रहा एनडीए'
राजनीतिक विश्लेषक धीरेंद्र कुमार ने अमर उजाला से कहा कि भाजपा भी समझ रही है कि जंगलराज का मुद्दा उसे मनोवैज्ञानिक बढ़त तो दिला सकता है, लेकिन उसे जीत नहीं दिला सकता। संभवतः यही कारण है कि वह केवल लालू प्रसाद यादव के जंगलराज पर ही वोट नहीं मांग रही है। उसने अपने कार्यों की पूरी सूची जनता के बीच रख दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार बिहार के दौरे कर योजनाओं के उद्घाटन और शिलान्यास कर रहे हैं। नीतीश कुमार सरकार ने महिलाओं के लिए अनेक योजनाओं का पिटारा खोल दिया है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण से लेकर समाज के अलग-अलग वर्गों छात्रों, युवाओं, किसानों के लिए कई योजनाएं शुरू की गई हैं।
उन्होंने कहा कि इसके साथ-साथ केंद्र सरकार ने मेट्रो, राष्ट्रीय राजमार्गों, एयरपोर्ट, अस्पतालों और अनेक ढांचागत निर्माण के सैकड़ों कार्य किये हैं। इससे बिहार की आम जनता को अपने राज्य में विकास होता हुआ दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि भाजपा नेताओं का दावा है कि इन विकास कार्यों को देखते हुए बिहार की जनता अब राजद के जंगलराज की वापसी नहीं होने देगी।
'तेजस्वी को संभलना होगा'
राजनीतिक विश्लेषक विवेक सिंह के अनुसार, जंगलराज की कहानी भले ही पीछे छूट चुकी है, लेकिन ऐसे दौर लोगों के अवचेतन मस्तिष्क में लंबे समय तक जिंदा रहते हैं। उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव पिछली बार भी थोड़ी कमी से पीछे रह गए थे। यदि भागलपुर की तरह की घटनाएं और घटेंगी तो इससे जनता के बीच एक नकारात्मक संदेश जा सकता है और इसका विपक्ष को नुकसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि बिहार में इस बार सत्ता में कौन पहुंचेगा, इस पर केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष ही नहीं, प्रशांत किशोर जैसे नए खिलाड़ी भी असर डालेंगे। विधानसभा चुनावों में थोड़े अंतर से ही जीत-हार तय हो जाती है। ऐसे में तेजस्वी यादव को अपने बड़बोले कार्यकर्ताओं पर लगाम लगानी चाहिए।