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बिहार: क्या तेजस्वी के मुख्यमंत्री बनने की जमीन तैयार हो गई है?

Mon, 01 Jan 2024 07:12 AM IST
Atul Sinha अतुल सिन्हा
Updated Mon, 01 Jan 2024 07:12 AM IST
सार

आरजेडी से जुड़े एक नेता का कहना है कि सियासत के खेल में लालू यादव हमेशा से नीतीश पर भारी रहे हैं। उनके कहने पर ही नीतीश ने मोदी सरकार के खिलाफ महागठबंधन बनाने की पहल की। लालू ने ही नीतीश को यह समझाने की कोशिश की कि अब वह मुख्यमंत्री बहुत रह लिए, उन्हें तो प्रधानमंत्री होना चाहिए और इसके लिए महागठबंधन ही एकमात्र रास्ता है।

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Bihar Politics is ground prepared for Tejashwi Yadav to become Chief Minister
उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनाव से चंद महीने पहले जिस तरह बिहार की राजनीति में तूफान आया है उससे यह तो संकेत मिलने लगे हैं कि बिहार में जल्दी ही सत्ता परिवर्तन का खेल शुरु हो सकता है। अगर भाजपा सांसद और केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह यह कह रहे हैं कि लालू यादव 14 जनवरी से पहले तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनवा देंगे, तो इसके आसार भी नजर आने लगे हैं। आरजेडी खेमे में जबरदस्त हलचल है। विधानसभा अध्यक्ष अवध बिहारी चौधरी ने साल के आखिरी दिन लालू यादव से राबड़ी देवी के घर पर मुलाकात की। तेजस्वी ने भी अपना जनवरी के पहले हफ्ते में प्रस्तावित आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का दौरा रद्द कर दिया है।

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2020 के चुनाव नतीजों को याद कीजिए। 75 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर आरजेडी उभरी थी। भाजपा को 74 सीटें मिली थीं। बाद में ओवैसी की पार्टी के पांच में से चार विधायक भी आरजेडी में शामिल हो गए और आरजेडी के कुल 79 विधायक हो गए। कांग्रेस के 19 विधायक चुने गए थे जबकि वामपंथियों के 16 विधायक। दूसरी तरफ एनडीए के साथ चुनाव लड़ने वाले जेडीयू को केवल 45 सीटों पर संतोष करना पड़ा और भाजपा को 74 सीटें मिली थीं, हालांकि अब उसके 78 विधायक हैं। तब भी तेजस्वी यादव ही मुख्यमंत्री के सबसे पहले दावेदार थे। लेकिन नीतीश ने खुद मुख्यमंत्री बने रहने के लिए भाजपा के साथ मिलकर अपनी सरकार बनाई। यह तकलीफ लालू यादव को तब से ही रही है। लेकिन नीतीश ने मुख्यमंत्री बनने के डेढ़ साल बाद ही फिर पाला बदला, लालू यादव की इफ्तार पार्टी में शामिल हुए और तीन ही महीने बाद अगस्त 2022 में एनडीए छोड़कर फिर से आरजेडी के साथ चले गए। मुख्यमंत्री वह बने रहे और तेजस्वी यादव को 2015 की तरह उप मुख्यमंत्री के तौर पर संतोष करना पड़ा। लेकिन अगर गिरिराज सिंह की मानें तो लालू यादव पहले से ही वक्त के इंतजार में थे और चुनाव से पहले ‘खेला’ करने की रणनीति बना चुके थे।

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आरजेडी से जुड़े एक नेता का कहना है कि सियासत के खेल में लालू यादव हमेशा से नीतीश पर भारी रहे हैं। उनके कहने पर ही नीतीश ने मोदी सरकार के खिलाफ महागठबंधन बनाने की पहल की। लालू ने ही नीतीश को यह समझाने की कोशिश की कि अब वह मुख्यमंत्री बहुत रह लिए, उन्हें तो प्रधानमंत्री होना चाहिए और इसके लिए महागठबंधन ही एकमात्र रास्ता है। नीतीश ने इसके लिए खूब मेहनत की, ममता बनर्जी से लेकर सोनिया गांधी, शरद पवार, अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल तक से मिले। सबको जोड़ा और इंडिया गठबंधन अब चुनाव में भाजपा को टक्कर देने के लिए तैयार है। आखिरकार 19 दिसंबर की इंडिया गठबंधन की बैठक के दौरान जब बतौर पीएम मल्लिकार्जुन खरगे का नाम प्रस्तावित हुआ तब ये सवाल उठने लगे कि अब नीतीश क्या करेंगे। उनकी गठबंधन में क्या भूमिका होगी, क्या वे गठबंधन के संयोजक बनेंगे या फिर एक बार फिर एनडीए का रुख करेंगे। इस आशंका को 29 दिसंबर को जेडीयू कार्यकारिणी की बैठक के बाद हुई केसी त्यागी की प्रेस कांफ्रेंस ने और हवा दी, जब उन्होंने यह कह दिया कि राजनीति में न तो कोई दोस्त होता है, न दुश्मन। साथ ही उन्होंने निमंत्रण मिलने पर अयोध्या के प्राण प्रतिष्ठा समारोह में भी जाने की बात कह दी।

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हालांकि कार्यकारिणी की बैठक में मोदी सरकार के खिलाफ सख्त भाषा में प्रस्ताव भी पारित हुए, विपक्षी सांसदों के निलंबन पर भी मोदी सरकार के रवैये की तीखी आलोचना की गई, साथ ही नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन के साथ सीट शेयरिंग के लिए अधिकृत किया गया। इसके बावजूद ये अफवाहें उड़ती रहीं कि नीतीश फिर पलटी मार सकते हैं, जबकि इंडिया गठबंधन के किसी भी घटक दल के किसी भी नेता ने कभी ये बात नहीं की औऱ न ही कोई प्रतिक्रिया दी। लेकिन नीतीश को केन्द्रीय भूमिका में लाकर बिहार के मुख्यमंत्री का ताज तेजस्वी को पहनाने की पटकथा काफी पहले से लिखी जा रही थी और यह तभी संभव था जब नीतीश की भूमिका पार्टी में और गठबंधन में और बढ़ाई जाए। हालांकि जिस तरह तेजस्वी यादव के खिलाफ ईडी के सम्मन लगातार आ रहे हैं, उससे यह तो संकेत मिल ही रहे हैं कि केन्द्र की गहरी नजर बिहार पर है और अगर तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश होती है तो वह अपनी कार्रवाइयां और तेज कर सकती है।

अगर बिहार विधानसभा में विधायकों की मौजूदा स्थिति पर गौर करें तब साफ हो जाएगा कि तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए कुल 243 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 122 विधायकों की जरूरत है। आरजेडी के 79, कांग्रेस के 19, भाकपा माले के 12, भाकपा और माकपा के 4 विधायकों को मिला लें तो कुल संख्या 114 ही होती है। यानी 8 विधायकों की और जरूरत होगी। अगर एक निर्दलीय और एआईएमआईएम के एक विधायकों को जोड़ लें तब भी यह संख्या 116 ही होती है। जाहिर है, ऐसे में जेडीयू के बगैर ये संभव नहीं हो पाएगा। लालू यादव फिलहाल इसी कोशिश में हैं। और इसके लिए वह इंडिया गठबंधन की मजबूती के नए आयाम तलाशने में लगे हैं।

दरअसल 19 दिसंबर को दिल्ली से लौटते वक्त लालू यादव केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह की मुलाकात और झटका मटन खिलाने के सियासी बयान के बाद से ही यह कहानी शुरु हुई। तब से ही लगातार गिरिराज सिंह ऐसी भविष्यवाणियां कर रहे हैं। हालांकि इससे पहले तेजस्वी यादव भी साफ कर चुके हैं कि विमान में गिरिराज की बगल वाली सीट पर वह खुद मौजूद थे। तेजस्वी ने यह भी खुलासा किया था कि गिरिराज सिंह खुद अपने केन्द्रीय नेतृत्व से दुखी हैं और अपना टिकट कट जाने की आशंका से डरे हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी औऱ अमित शाह जिस तरह की राजनीति करते हैं, उससे सभी वरिष्ठ नेता परेशान हैं और पार्टी में उनकी कोई हैसियत नहीं है।

पार्टी अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद से नीतीश कुमार भी खासे सक्रिय हैं। उन्होंने यह साफ कर दिया है कि उनके और ललन सिंह के बीच कोई विवाद नहीं है और ललन सिंह लोकसभा चुनाव लड़ेंगे। अब जेडीयू का विस्तार करना है और इसके लिए वह झारखंड से अपनी यात्रा भी शुरु करने वाले हैं। हालांकि जेडीयू कार्यकारिणी की बैठक में कांग्रेस को यह संदेश देने की भी कोशिश की गई कि गठबंधन में बड़ा भाई होने के नाते उसे बड़ा दिल दिखाना चाहिए और ज्यादा सीटें सहयोगियों के लिए छोड़नी चाहिए। खरगे के प्रधानमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रस्ताव लाने पर भी फिलहाल जेडीयू ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

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